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बिहार चुनाव: तेजस्वी का ‘रोड शो’ या फिर राजनीति का नया ड्रामा? पप्पू-कन्हैया को क्यों रोका गया मंच से?

अरे भई, बिहार की सियासी गर्मी तो देखिए! पटना के चक्का-जाम इलाके में तेजस्वी यादव का जो रोड शो हुआ, उसने तो पूरे शहर का ट्रैफिक ही लॉक कर दिया। सच कहूँ तो, युवाओं का ये जोश देखकर लगा जैसे 2015 का वो नया बिहार वापस आ गया हो। लेकिन…हमेशा की तरह एक ‘लेकिन’ तो होना ही था। उधर राहुल गांधी की सभा में पप्पू यादव और कन्हैया कुमार को मंच पर चढ़ने से रोक दिया गया। अब सवाल ये है कि ये सब क्या वाकई security का मामला था या फिर कोई गहरी राजनीतिक चाल?

पूरा माजरा क्या है?

देखिए, बिहार की राजनीति तो वैसे भी किसी सास-बहू के सीरियल से कम नहीं। एक तरफ तेजस्वी अपने ‘यूथ आइकन’ वाले अंदाज में जनता को लुभा रहे हैं, तो दूसरी तरफ महागठबंधन के भीतर ही छोटे-मोटे तनाव दिखने लगे हैं। असल में, तेजस्वी के इस रोड शो ने एक बात तो साफ कर दी – उनकी जमीन अभी भी मजबूत है। पर साथ ही, पप्पू और कन्हैया को मंच से रोके जाने की घटना ने सवाल खड़े कर दिए हैं।

क्या हुआ था असल में?

सीन तो कुछ ऐसा था – तेजस्वी की गाड़ी के पीछे-पीछे भागते युवाओं का समंदर…पूरा इलाका जाम…और फिर अचानक उधर राहुल की सभा में वो विवाद। मीडिया वालों को तो जैसे दिवाली मनाने का मौका मिल गया! दो कहानियाँ सामने आ रही हैं:

1. कांग्रेस वालों का दावा – “भई, security का मामला था। भीड़ बहुत ज्यादा थी।”
2. दूसरा पक्ष – “ये तो जान-बूझकर किया गया ताकि सारा ध्यान तेजस्वी और राहुल पर ही रहे।”

अब आप ही बताइए, इनमें से कौन सी कहानी सच लगती है? मेरी नजर में तो दोनों में ही कुछ न कुछ सच्चाई होगी।

नेताओं ने क्या कहा?

पप्पू यादव ने तो बड़ा ही सधा हुआ जवाब दिया – “छोटी-मोटी बातें हैं, हम एकजुट हैं।” पर असल बात ये है कि ऐसी घटनाएँ अक्सर बड़े भूकंप का संकेत होती हैं। कन्हैया कुमार ने इसे ‘गलतफहमी’ बताया, लेकिन उनके चेहरे के भाव कुछ और ही कह रहे थे।

एक आरजेडी कार्यकर्ता ने तो मुझे बताया (off the record, समझिए ना) – “भई, भीड़ को कंट्रोल करना मुश्किल हो गया था।” वहीं BJP वालों ने तो मौके का फायदा उठाते हुए कहा – “देखा, ये है इनकी एकता!”

आगे क्या होगा?

असल मसला ये है कि ये घटना महागठबंधन के भीतर कितनी दरार पैदा करेगी। राजनीति के जानकार कह रहे हैं कि पप्पू और कन्हैया अब कैसी चाल चलते हैं, यह देखने लायक होगा। और हाँ, चुनाव आयोग को भी शायद इस मामले में दखल देना पड़े।

पर सबसे बड़ी बात? तेजस्वी की ये बढ़ती लोकप्रियता। अगर यही ट्रेंड रहा, तो वो न सिर्फ विपक्ष बल्कि पूरे बिहार की राजनीति के सेंटर में आ सकते हैं। बिल्कुल उसी तरह जैसे नीतीश कुमार 2005 में आए थे।

आखिर में एक बात तो तय है – बिहार की राजनीति में छोटी सी चिंगारी भी बड़ा धमाका कर सकती है। अब देखना ये है कि ये नया ड्रामा चुनावी समीकरणों को कैसे बदलता है। क्या आपको नहीं लगता कि अगले कुछ दिन और भी दिलचस्प होने वाले हैं?

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Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com

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