Australia के PM और शी जिनपिंग की मुलाकात: क्या दोस्ती और दुश्मनी के बीच संतुलन बन पाएगा?
अब बात करते हैं Australia के PM एंथनी अल्बानीज़ के चीन दौरे की। छह दिनों का यह दौरा सिर्फ औपचारिकता नहीं था, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संदेश देने वाला रहा। शी जिनपिंग से हुई यह मुलाकात क्या वाकई दोनों देशों के रिश्तों में नया मोड़ ला पाएगी? असल में, यह यात्रा तो व्यापार को बढ़ावा देने के नाम पर हुई, लेकिन पृष्ठभूमि में चल रही अमेरिका-चीन की तनातनी और सुरक्षा को लेकर चिंताएं साफ झलक रही थीं।
पहले समझिए पूरा कॉन्टेक्स्ट
देखिए, Australia और चीन के रिश्ते पिछले कुछ सालों से उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं। कोविड की उत्पत्ति को लेकर सवाल उठाने की गलती Australia से हो गई थी, और चीन ने तुरंत जवाब दिया – वाइन, कोयला जैसे उत्पादों पर प्रतिबंध लगाकर। एक तरफ तो यह व्यापारिक नुकसान था, दूसरी तरफ Australia ने AUKUS जैसे समझौतों के जरिए अमेरिका के साथ गठजोड़ मजबूत किया। अब आप ही बताइए, ऐसे में अल्बानीज़ की यह यात्रा कितनी अहम हो जाती है?
मीटिंग के वो पॉइंट्स जो मायने रखते हैं
तो क्या हुआ इस मुलाकात में? पर्यटन और स्टील सेक्टर पर बातचीत हुई, यह तो अच्छी बात है। व्यापारिक रिश्तों को फिर से जिंदा करने पर सहमति भी बनी। लेकिन… हमेशा की तरह एक बड़ा ‘लेकिन’ यहाँ भी था। सुरक्षा के मुद्दे और दक्षिण चीन सागर जैसे विषयों पर कोई खास प्रगति नहीं हुई। साफ था कि दोनों ही देश अपने-अपने हितों से समझौता करने को तैयार नहीं थे।
किसने क्या कहा? प्रतिक्रियाओं का मेला
अब जरा प्रतिक्रियों पर नजर डालते हैं। Australia के विपक्ष ने तो चीन के साथ डील करते वक्त आँख-कान खुले रखने की नसीहत दी है। वहीं चीनी मीडिया इसे ‘सकारात्मक कदम’ बता रहा है। विश्लेषकों की राय? यह यात्रा 80% आर्थिक थी, 20% राजनीतिक। और वो 20% वाला हिस्सा अभी भी पूरी तरह सुलझा नहीं है।
आगे की राह: क्या उम्मीद करें?
तो अब सवाल यह है कि आगे क्या? मेरी समझ से तो व्यापारिक सौदे बढ़ेंगे जरूर, पर सुरक्षा को लेकर तनाव बना रहेगा। अगर अमेरिका और चीन के बीच तनाव और बढ़ा तो Australia के लिए दोनों के बीच संतुलन बनाना और भी मुश्किल हो जाएगा। हाँ, हाई-लेवल बातचीत जारी रहेगी, लेकिन विश्वास बनाने में वक्त लगेगा। शायद बहुत वक्त।
सच कहूँ तो, यह मुलाकात एक नई शुरुआत तो हो सकती है, मगर रास्ते में पुरानी मुश्किलें अब भी खड़ी हैं। आर्थिक सहयोग और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन बनाना… यही असली चुनौती होगी दोनों नेताओं के लिए। क्या वो इसमें कामयाब होंगे? वक्त बताएगा।
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अरे भाई, क्या बात है! अभी-अभी ऑस्ट्रेलियाई PM और चीन के शी जिनपिंग की मुलाकात हुई है, और सोशल मीडिया पर इसकी चर्चा जोरों पर है। तो सोचा क्यों न आपको इसके बारे में थोड़ा सरल तरीके से समझाया जाए?
1. आखिर इस मुलाकात में असली मसला क्या था?
देखिए, बात सीधी है। ऑस्ट्रेलिया चाहता है कि चीन के साथ उसका business चलता रहे – मतलब trade relations improve हों। लेकिन यहाँ एक पेंच है… साथ ही वो security को लेकर भी सख्त रहना चाहता है। ठीक वैसे ही जैसे आप दुकानदार से तो अच्छे रिश्ते रखें, लेकिन पैसे का हिसाब साफ रखें। मुश्किल बैलेंसिंग एक्ट है, है न?
2. क्या यह मीटिंग तनाव कम कर पाएगी?
ईमानदारी से कहूँ तो… हाँ और ना दोनों। Experts की राय है कि यह एक सही दिशा में उठाया गया कदम है। पर याद रखिए, चीन और ऑस्ट्रेलिया के बीच का विश्वास ऐसे ही नहीं जमने वाला। जैसे रिश्ते बिगड़ने में वक्त लगता है, वैसे ही सुधरने में भी। शायद कुछ और बैठकों की जरूरत पड़े।
3. Trade पर क्या असर पड़ेगा? आम आदमी के लिए इसका क्या मतलब?
अगर सब ठीक रहा तो… अच्छी खबर! टैरिफ कम हो सकते हैं, एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट बढ़ सकता है। मतलब आपके लिए चीनी सामान थोड़े सस्ते हो सकते हैं। लेकिन यहाँ एक ‘पर’ जरूर है – security issues अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। जैसे मैं कहता हूँ, दिल तो मिल गया पर दिमाग अभी भी शंका में है!
4. Indo-Pacific region के लिए इसका क्या मतलब है?
असल में यह बहुत बड़ी बात हो सकती है। अगर ये दोनों देश अपने मतभेद सुलझा लेते हैं, तो पूरे इलाके में शांति की उम्मीद बढ़ जाएगी। थोड़ा ऐसे समझ लीजिए – जब घर के बड़े लोग आपस में ठीक होते हैं, तो पूरे परिवार का माहौल अच्छा रहता है। लेकिन हालात अभी नाजुक हैं, यह न भूलें।
तो ये थी आज की स्टोरी। कैसी लगी आपको? कमेंट में जरूर बताइएगा। और हाँ, अगर कुछ पूछना हो तो बेझिझक पूछिए!
Source: Financial Times – Global Economy | Secondary News Source: Pulsivic.com