F-35 नहीं, रूस ही क्यों? भारत का अमेरिका को मज़बूत जवाब!
अब ये तो हो गया ना दिलचस्प! भारत ने हाल में एक ऐसा फैसला लिया है जिसने पूरे इंटरनेशनल डिफेंस मार्केट को हिला कर रख दिया। सीधे शब्दों में कहें तो – अमेरिका के चर्चित F-35 स्टील्थ जेट्स की जगह भारत ने रूस के साथ अपनी पुरानी दोस्ती को और गहरा करने का रास्ता चुना है। है ना मज़ेदार बात? असल में, ये फैसला हमारी ‘Strategic Autonomy’ को दिखाता है – जहां हम किसी एक सुपरपावर के चंगुल में फंसने की बजाय अपने हिसाब से चलते हैं।
पीछे का सच: क्यों बदल रहे हैं भारत के डिफेंस इक्वेशन?
देखिए, पिछले 20 सालों में भारत ने अपनी डिफेंस पॉलिसी को लेकर काफी स्मार्ट मूव्स किए हैं। अमेरिका से Apache हेलिकॉप्टर, C-17 ग्लोबमास्टर जैसे बड़े-बड़े डील्स हुए। फ्रांस के साथ Rafale जैसी मेगा डील… इजराइल के साथ मिसाइल टेक्नोलॉजी में सहयोग। लेकिन यहां मजा तब आता है जब आपको पता चलता है कि इतने सारे विकल्पों के बावजूद, रूस हमारा सबसे पक्का साथी बना हुआ है!
सोचिए – S-400 डील हो या फिर हमारे Su-30MKI फ्लीट का अपग्रेड, रूसी हथियार हमारी सेना की ‘बैकबोन’ हैं। शायद यही वजह है कि F-35 को ना कहकर हमने रूस के Su-57 स्टील्थ जेट में दिलचस्पी दिखाई। थोड़ा सा ‘ओल्ड इज़ गोल्ड’ वाला केस है, है ना?
आगे क्या? नए डील्स की संभावनाएं
अंदरूनी सूत्रों की मानें तो भारत और रूस अभी कई बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं। BrahMos मिसाइल की कामयाबी के बाद अब और भी एडवांस्ड सिस्टम्स पर काम चल रहा है। नौसेना के लिए नई सबमरीन्स, एयरफोर्स के लिए नए जेनरेशन के फाइटर जेट्स… बातें तो बहुत हो रही हैं!
अमेरिका ने निराशा ज़रूर जताई है, पर उनका स्टेटमेंट काफी डिप्लोमेटिक था – “हम भारत के साथ रिलेशन को लेकर कमिटेड हैं…” वगैरह-वगैरह। मतलब साफ है – नाराज़गी है, पर बातचीत का रास्ता खुला रखा है।
बड़ी तस्वीर: भारत की गेम प्लान
एक्सपर्ट्स की मानें तो ये कोई साधारण हथियार खरीदने या न खरीदने का मामला नहीं है। ये तो एक बड़ी स्ट्रैटेजिक चाल है! रूस को प्राथमिकता देकर भारत साफ संदेश दे रहा है – “हम किसी के दबाव में नहीं चलते।”
आने वाले समय में और भी दिलचस्प डेवलपमेंट्स देखने को मिल सकते हैं। अमेरिका शायद अपने MQ-9B ड्रोन्स के साथ फिर से पेश आए। पर एक बात तो तय है – अब भारत पूरी तरह ‘Make in India‘ और ‘स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी’ के रास्ते पर चल पड़ा है। और हां, ये रास्ता कोई आसान नहीं होगा, पर शायद इसी में हमारी असली ताकत छुपी है। क्या कहते हैं आप?
देखा जाए तो भारत ने फिर से वही कर दिखाया जिसमें उसे महारत हासिल है – अपने फैसले खुद लेना। F-35 जैसे चमकदार ऑफर को ठुकराकर रूस के साथ अपनी ‘जिगरी दोस्ती’ को तरजीह देना… ये कोई छोटी बात थोड़े ही है! असल में, यह फैसला सिर्फ एक खरीदारी का मामला नहीं, बल्कि एक बड़ा संदेश है। क्या संदेश? वो ये कि भारत अब किसी के दबाव में नहीं झुकता।
हालांकि, कुछ लोग सवाल उठा सकते हैं – “F-35 मिल रहा था, तो ना क्यों?” लेकिन इसे ऐसे समझिए: क्या आप 50 साल के भरोसेमंद दोस्त को छोड़ देंगे सिर्फ इसलिए कि कोई नया आकर चमकदार गिफ्ट दे रहा है? बिल्कुल नहीं, है ना?
रूस के साथ हमारे रक्षा संबंधों की बात करें तो ये सिर्फ हथियारों की सप्लाई से कहीं आगे की चीज़ है। ये विश्वास का रिश्ता है, जो कई दशकों और कई संकटों की आंच में तपकर बना है। और सच कहूं तो, आज के इस दौर में जहां हर कोई ‘फेयर-वेदर फ्रेंड’ बनता है, ऐसा साथ मिलना… एकदम ज़बरदस्त। सच में।
अब सवाल यह है कि आगे क्या? तो जवाब साफ है – भारत अपने राष्ट्रीय हितों को सबसे ऊपर रखेगा। चाहे वो पश्चिम हो या पूर्व, कोई भी हमें अपने फैसले थोप नहीं सकता। और यही तो है असली ‘स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी’ का मतलब!
F-35 vs रूसी दोस्ती: जब भारत-अमेरिका रिश्तों पर सवाल उठते हैं
भारत ने F-35 को ‘ना’ क्यों कहा? असल वजह क्या है?
देखिए, यहां बात सिर्फ़ एक fighter jet की नहीं है। असल में, भारत के लिए यह एक strategic choice था। एक तरफ तो हमारा रूस के साथ पुराना रिश्ता है – वो भी defense जैसे sensitive मामले में। और दूसरी तरफ, ‘मेक इन इंडिया’ का सपना। सच कहूं तो रूसी हथियारों की technology और उनकी cost-effectiveness भी एक बड़ा factor है। क्योंकि अमेरिकी equipment, वैसे तो top-class है, लेकिन उनकी कीमत और conditions… खैर, आप समझ ही रहे होंगे!
क्या यह फैसला भारत-अमेरिका दोस्ती पर पानी फेर देगा?
अरे नहीं भई! ऐसा बिल्कुल नहीं है। सच तो यह है कि आज भारत और अमेरिका का रिश्ता इतना mature हो चुका है कि एक डील न होने से कुछ नहीं बिगड़ता। हां, F-35 का deal नहीं हुआ, लेकिन क्या आपने देखा कि defense से लेकर technology तक, trade से लेकर space cooperation तक – दोनों देश कितने projects पर साथ काम कर रहे हैं? यही तो असली partnership है न!
रूस के साथ यह ‘जिगरी दोस्ती’ वाली बात क्या है?
असल में यह कोई नारेबाज़ी नहीं है। सोवियत यूनियन के ज़माने से चली आ रही यह दोस्ती सच में ख़ास है। सोचिए – जब कोई देश आपको S-400 जैसी missile technology दे दे, UN में हमेशा साथ खड़ा रहे, तो यह रिश्ता सिर्फ़ business से कहीं आगे की बात है। पर यह भी समझना ज़रूरी है कि आज की दुनिया में हमें ‘या तो-या तो’ वाली सोच से बाहर निकलना होगा।
तो क्या F-35 का कोई विकल्प है भारत के पास?
बिल्कुल है! और क्या पता, हमारा अपना solution और भी बेहतर निकले। AMCA project तो चल ही रहा है – हमारा खुद का fifth-gen fighter jet। या फिर रूस के साथ joint venture हो सकता है। फ्रांस भी तो है न? Rafale की success के बाद वो नए deals के लिए बेताब हैं। सच कहूं तो options की कोई कमी नहीं है। बस सही choice करने की देर है!
एक बात और – यह सब सुनकर क्या आपको नहीं लगता कि भारत अब defense में self-reliant होने की दिशा में सही कदम उठा रहा है? मुझे तो लगता है।
Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com