स्कूल फीस नियम 2024: अब पेरेंट्स की जेब पर कितना पड़ेगा भार? नए गाइडलाइंस पर एक नज़र!
दिल्ली सरकार ने आखिरकार प्राइवेट स्कूलों के फीस बढ़ाने के खेल पर लगाम कसने का फैसला कर ही लिया। ‘दिल्ली विद्यालय शिक्षा विधेयक, 2025’ के तहत अब स्कूल चाहे जितना भी मनमर्जी कर लें, फीस बढ़ाने के लिए उन्हें सरकार से पूछना होगा। सच कहूं तो, ये तो होना ही था! पिछले कुछ सालों में तो प्राइवेट स्कूलों ने मिडिल क्लास पेरेंट्स की जेब ही खाली कर दी थी।
पूरा मामला क्या है? जानिए पेरेंट्स की मुश्किलें
देखिए, दिल्ली के प्राइवेट स्कूलों का फीस का खेल कोई नया नहीं है। पिछले 10 साल में तो ये हाल हो गया था कि हर साल बिना बताए 10-15% फीस बढ़ा दी जाती थी। मानो कोई सब्जी-भाजी का भाव बता रहे हों! 2017 में कोर्ट ने थोड़ी राहत दी थी, लेकिन स्कूलों ने तो नए-नए तरीके निकाल लिए – ‘विकास शुल्क’, ‘बिल्डिंग फंड’ वगैरह-वगैरह। अब सरकार ने पूरा कानूनी ढांचा ही बना दिया है। शाबाश!
नए नियमों में क्या-क्या है? समझिए पूरा गणित
तो अब क्या होगा? सीधी बात है – फीस बढ़ाना है? पहले सरकारी कमेटी से पूछो! इस कमेटी में शिक्षा के एक्सपर्ट्स, इकोनॉमिस्ट और सरकारी अधिकारी होंगे जो ये तय करेंगे कि फीस बढ़ाना जायज़ है या नहीं। और हां, अब स्कूलों को हर पैसे का हिसाब देना होगा। कोई हेराफेरी की तो जुर्माना या फिर लाइसेंस तक जा सकता है। एकदम सख्त!
किसको क्या लगा? सभी पक्षों की राय
अब सवाल यह है कि लोग इस पर क्या सोच रहे हैं? पेरेंट्स तो खुश हैं – “अच्छा कदम है, लेकिन सरकार को इसे सही से लागू करना चाहिए।” वहीं स्कूल वालों की चिंता भी समझ आती है – “Teachers को सैलरी देनी है, Infrastructure का ख्याल रखना है, Modern facilities देनी हैं… ये सब बिना पैसे के कैसे होगा?” सरकार का जवाब साफ है – “हमें बैलेंस बनाना है। पेरेंट्स को राहत मिले, लेकिन स्कूल भी चलते रहें।”
आगे क्या होगा? भविष्य की संभावनाएं
अगर यह बिल पास हो गया तो? दिल्ली के प्राइवेट स्कूलों को अपना तरीका बदलना पड़ेगा। पेरेंट्स को राहत मिलेगी, लेकिन स्कूल वाले शायद नाराज़ भी हो जाएं। कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि इससे स्कूलों की कमाई कम होगी और शायद पढ़ाई का स्तर गिरे। पर अगर यह मॉडल काम कर गया तो? हो सकता है पूरे देश में ऐसे ही नियम लागू हो जाएं!
आखिर में बात यही है कि यह बिल दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकता है। लेकिन असली मायने तो तब होंगे जब यह जमीन पर लागू होगा। सरकार को बीच का रास्ता निकालना होगा – न पेरेंट्स का नुकसान, न स्कूलों का। बस, अब देखना यह है कि यह नुस्खा काम करता है या नहीं!
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Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com