रुपया एशिया की सबसे कमजोर मुद्राओं में शामिल: ट्रंप के टैरिफ झटके से दबाव
ये तो आपने भी नोटिस किया होगा – भारतीय रुपया इन दिनों बिल्कुल लुढ़कता हुआ नज़र आ रहा है। एशिया की सबसे कमजोर करेंसीज़ में शुमार हो चुका है हमारा प्यारा रुपया। और दिक्कत ये है कि ये सिलसिला पूरे साल चल सकता है। क्यों? अरे भई, ट्रंप साहब के नए टैरिफ और हमारी घरेलू अर्थव्यवस्था की हालत तो देखिए! असल में, ये दोनों मिलकर रुपये को दबोचे हुए हैं। नतीजा? इकोनॉमिक रिकवरी धीमी पड़ रही है और विदेशी निवेशकों का भरोसा भी डगमगा रहा है।
पृष्ठभूमि: आर्थिक मंदी और टैरिफ का प्रभाव
अब थोड़ा पीछे चलते हैं। पिछले कुछ महीने से हमारी इकोनॉमी क्या संकेत दे रही थी? एक तरफ़ तो निर्यात, इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन और कंज्यूमर डिमांड – सब लुढ़क रहे हैं। ऊपर से ट्रंप जी का ‘अमेरिका फर्स्ट’ वाला राग! भारत समेत कई देशों पर टैरिफ की मार पड़ी है। नतीजा? हमारे निर्यातकों की हालत खस्ता। और जैसे कमज़ोरी काफी नहीं थी, क्रूड ऑयल के दाम उछल-कूद कर रहे हैं। विदेशी निवेशक? वो तो ‘वेट एंड वॉच’ मोड में हैं। इन सबका असर? रुपया लगातार गिरावट पर। सच कहूँ तो, स्थिति काफी गंभीर है।
मुख्य अपडेट: रुपये की गिरावट और RBI का हस्तक्षेप
ताज़ा हालात और भी डरावने हैं। रुपया अब 83 प्रति डॉलर के पार जा चुका है – जो एक बड़ा साइकोलॉजिकल लेवल है। FPI यानी विदेशी निवेश? वो भी पिछले कुछ महीनों से लगातार नीचे। ऐसे में RBI ने हाथ आगे बढ़ाया है। मार्केट में इंटरवेन किया, रुपये को थोड़ा सहारा दिया। लेकिन ये तो वैसा ही है जैसे बुखार में पैरासिटामॉल लेना – अस्थायी आराम। असली इलाज? वो तो लॉन्ग-टर्म पॉलिसीज़ से ही आएगा।
प्रतिक्रियाएं: विशेषज्ञों और सरकार का रुख
इकोनॉमिस्ट अजय श्रीवास्तव साफ़ कहते हैं – “ये टैरिफ और ग्लोबल अनसर्टेन्टी का खेल है। सरकार को एक्सपोर्ट बढ़ाने और मेक इन इंडिया पर फोकस करना होगा।” वहीं फाइनेंस मिनिस्ट्री के एक बाबू (माफ कीजिए, अधिकारी) कहते हैं कि “हम स्थिति को कंट्रोल करने के लिए कदम उठा रहे हैं।” पर सच्चाई ये है कि विदेशी निवेशक अभी रिस्क नहीं लेना चाहते। वो ग्लोबल सिचुएशन को देख रहे हैं – और यही रुपये की कमज़ोरी का एक और कारण बन रहा है।
भविष्य की संभावनाएं: क्या होगा आगे?
अब सवाल ये है कि आगे क्या? अगर टैरिफ और मंदी का दबाव यूँ ही बना रहा, तो रुपया और भी गिरेगा। और फिर? महंगाई का भूत सर उठाएगा। ऐसे में RBI और सरकार को और सख़्त कदम उठाने होंगे। एक्सपर्ट्स की राय? एक्सपोर्ट बढ़ाओ, FDI को आकर्षित करो, और सबसे ज़रूरी – इम्पोर्ट डिपेंडेंसी कम करो। मतलब, ‘आत्मनिर्भर भारत’ को सिर्फ नारा न बनने दो।
निष्कर्ष: रुपये की ये हालत दरअसल हमारी बड़ी इकोनॉमिक चुनौतियों का आईना है। इसमें सुधार के लिए सरकार और RBI को मिलकर काम करना होगा। सही पॉलिसीज़, लॉन्ग-टर्म प्लानिंग – बस यही रास्ता है रुपये को स्थिर करने और इकोनॉमी को पटरी पर लाने का। वैसे, आपको क्या लगता है? क्या हम इस संकट से उबर पाएंगे?
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Source: Livemint – Markets | Secondary News Source: Pulsivic.com