कजान से बीजिंग तक: क्या सच में बदल रहे हैं भारत-चीन के रिश्ते?
अरे भाई, क्या आपने भी नोटिस किया? पिछले कुछ महीनों से भारत-चीन के रिश्तों में एक अजीब सी हलचल दिख रही है। सुना है मोदी जी शायद जल्द ही चीन का दौरा करने वाले हैं। अब सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ एक औपचारिक यात्रा होगी या फिर दोनों देशों के बीच वास्तव में कुछ बदलाव आने वाला है? आखिरकार, गलवान की घटना के बाद से तो रिश्ते काफी तनावपूर्ण रहे हैं। ईमानदारी से कहूं तो, BRICS समिट में हुई मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात के बाद से ही कुछ न कुछ चल रहा है।
गलवान से आज तक: एक रोलरकोस्टर राइड
याद है न वो 2020 का वक्त? गलवान घाटी में हुई झड़पों ने तो जैसे सबकुछ उलट-पुलट कर दिया था। सैनिकों की जानें गईं, रिश्ते बिगड़े, और फिर क्या? चीन के apps बैन, निवेश पर रोक… एक तरफ तो LAC पर तनाव, दूसरी तरफ आर्थिक मोर्चे पर टकराव। लेकिन है न अजीब बात? इतना सबकुछ होने के बाद भी दोनों देश बातचीत करने से पीछे नहीं हटे। कई दौर की वार्ताएं हुईं, पर असल सवाल यह है कि क्या वास्तव में कुछ हल हुआ?
कजान वाली मुलाकात: गेम चेंजर या सिर्फ एक फोटो ऑप?
अक्टूबर 2024 की वो तस्वीर याद है? कजान में BRICS समिट के दौरान मोदी और शी जिनपिंग की मुस्कुराती हुई तस्वीर। मीडिया ने तो इसे बड़ा बताया, लेकिन क्या वाकई यह इतना महत्वपूर्ण था? देखा जाए तो उसके बाद से कुछ सकारात्मक संकेत जरूर मिले हैं। विदेश मंत्रियों की वार्ता हुई, और अब ये बीजिंग यात्रा की चर्चा। पर सच कहूं तो, यह सब सिर्फ तब तक मायने रखता है जब तक LAC पर सैनिकों की स्थिति में सुधार नहीं होता।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं? मिली-जुली प्रतिक्रियाएं
दिलचस्प बात यह है कि एक्सपर्ट्स की राय भी काफी अलग-अलग है। कुछ कहते हैं यह बड़ा कदम हो सकता है, तो कुछ याद दिलाते हैं कि 2018 की वुहान मुलाकात के बाद भी कुछ खास नहीं बदला था। भारत सरकार का स्टैंड साफ है – “हम शांति चाहते हैं, लेकिन सीमा पर कोई समझौता नहीं।” वहीं चीन की तरफ से भी वही पुरानी रट – “बातचीत से हल निकालेंगे।” सच तो यह है कि जब तक PLA LAC से पीछे नहीं हटती, तब तक सब बातें बेकार हैं।
आगे क्या? क्या होगा इस यात्रा का?
असल में देखा जाए तो यह पूरा मामला एक पहेली की तरह है। एक तरफ तो आर्थिक सहयोग की संभावनाएं, दूसरी तरफ सुरक्षा संबंधी चिंताएं। अमेरिका का फैक्टर भी है, और फिर वो पुराना सीमा विवाद तो है ही। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह यात्रा होती है तो यह एक शुरुआत हो सकती है, लेकिन यह कोई जादू की छड़ी नहीं है। छोटे-छोटे कदमों से ही विश्वास बनेगा। एकदम सच बात।
तो कुल मिलाकर? यह यात्रा निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण संकेत है, पर याद रखिए – भारत-चीन रिश्तों में कोई भी बदलाव रातों-रात नहीं आने वाला। अगले कुछ महीने वास्तव में दिखाएंगे कि क्या यह नया अध्याय सच में लिखा जा रहा है या फिर यह सब सिर्फ दिखावा है। आपको क्या लगता है?
कजान मुलाकात ने भारत-चीन के रिश्तों में एक नया मोड़ ला दिया है। सच कहूँ तो, ये LAC पर तनाव कम करने की कोशिशों के साथ-साथ दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ाने की एक बड़ी पहल है। देखा जाए तो पिछले 9 महीनों में काफी कुछ हुआ है – संवाद बढ़ा, विश्वास की नींव मजबूत हुई। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये सब काफी है? हालांकि, छोटी-छोटी जीत भी तो जीत ही होती हैं ना?
एक तरफ तो ये प्रगति उम्मीद जगाती है, वहीं दूसरी तरफ चुनौतियाँ अभी भी बरकरार हैं। जैसे कि… आप जानते ही हैं ना कि इन दोनों देशों के बीच मामले कितने जटिल होते हैं। फिर भी, ये सकारात्मक संकेत तो हैं ही। और हाँ, भविष्य में और बेहतर होगा – ये उम्मीद तो की ही जा सकती है।
(थोड़ा सोचकर) पर सच्चाई ये है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कुछ भी पक्का नहीं होता। आज जो दोस्ती दिख रही है, कल को… खैर, ये तो भविष्य ही बताएगा। फिलहाल तो ये प्रगति ही एक बड़ी बात है।
कजान से बीजिंग तक: भारत-चीन के रिश्तों पर वो सवाल जो आप पूछना चाहते हैं लेकिन डरते हैं!
1. पिछले 9 महीनों में भारत-चीन के बीच सबसे बड़ा धमाका क्या हुआ?
असल में देखा जाए तो, Ladakh वाला मामला तो जैसे पुराना हो चुका है, लेकिन हकीकत यही है कि border tensions आसमान छू रही हैं। सैन्य बातचीत हो या diplomatic talks, सब कुछ चल तो रहा है… पर क्या हल निकल पा रहा है? ईमानदारी से कहूं तो नहीं। एक तरफ तो हमारे जवान पोस्ट पर डटे हैं, दूसरी तरफ चीन वाले अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे। सच कहूं तो स्थिति बेहद नाजुक है।
2. कजान और बीजिंग की बैठकें: सिर्फ दिखावा या कुछ हुआ असल में?
देखिए, high-level meetings तो हो रही हैं – trade पर, economy पर, border issues पर… सब कुछ discuss हो रहा है। लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि क्या ये सिर्फ दिखावे के लिए हैं? क्योंकि ground situation तो जस की तस बनी हुई है। Trust deficit? वो तो जैसे पहले से भी ज्यादा बढ़ गया है। दोनों देश अपनी-अपनी जिद पर अड़े हैं – जैसे कोई दो बच्चे खिलौने को लेकर झगड़ रहे हों!
3. क्या भारत-चीन के बीच फिर से 1962 जैसा कुछ हो सकता है?
अब ये सवाल तो वाकई दिमाग में कौंधता है। पर सच्चाई यह है कि full-scale war की संभावना कम ही है। हालांकि… और यहां एक बड़ा हालांकि आता है… छोटे-मोटे clashes तो चलते ही रहते हैं border पर। Diplomatic solutions की तलाश जारी है, पर हमारी सेना भी पूरी तरह alert है। समझिए ना, ये ऐसा ही है जैसे दो पड़ोसी जो बाहर तो मुस्कुरा रहे हैं, लेकिन घर के अंदर छुरे तेज कर रहे हों!
4. चीन के साथ business करें या न करें – भारत की दुविधा
अब यहां तो हमने कुछ बोल्ड कदम उठाए हैं – Chinese apps पर ban लगाकर, local manufacturing को boost देकर। शाबाशी के काबिल। पर एक कड़वा सच ये भी है कि trade deficit तो आसमान छू रहा है। मतलब साफ है – हम चीन से जितना खरीदते हैं, उससे कहीं कम बेच पाते हैं। और ये समस्या ऐसी है जैसे किसी के कर्ज में डूबे रहना। बाहर से तो सब ठीक लगता है, लेकिन अंदर ही अंदर सब खोखला होता जाता है।
Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com