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“NYT इंटरव्यू में महमूद खलील का 7 अक्टूबर हमले को ‘जस्टिफाई’ करने का प्रयास, लोगों ने कहा- ‘अमेरिका से नफरत है'”

NYT इंटरव्यू में महमूद खलील का बयान – ‘7 अक्टूबर को जस्टिफाई करना’ क्यों भड़का रहा है आग?

अरे भई, सुनो जरा! NYT का यह इंटरव्यू तो हंगामा खड़ा कर देने वाला है। कैंपस नेता महमूद खलील ने 7 अक्टूबर के हमास के हमले को ‘जस्टिफाई’ करने की कोशिश की है… और यार, बस फिर क्या था? मामला तो ऐसा बवाल बना कि ट्विटर से लेकर व्हाट्सऐप ग्रुप्स तक सब गरमा गए। है न मजेदार बात कि #MahmoudKhalilHatesAmerica ट्रेंड करने लगा? पर सच पूछो तो – क्या सच में ये सही है? या फिर ये सिर्फ एक और वोक पॉलिटिक्स का खेल है?

पूरा माजरा क्या है?

देखिए, 7 अक्टूबर वाला हमला तो वैसे भी… ऐसा था जैसे किसी ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया हो। सैकड़ों बेगुनाह मारे गए, औरतें-बच्चे… पर अब इस पर खलील साहब का ये बयान! असल में बात यह है कि ये कोई पहली बार नहीं है जब ये इजरायल-विरोधी स्टैंड ले रहे हैं। लेकिन NYT जैसे बड़े प्लेटफॉर्म पर? ये तो ऐसा हुआ जैसे मोमबत्ती लेकर तेल के कुएं में कूद पड़े!

खलील ने क्या कहा, और क्यों है ये इतना बड़ा मुद्दा?

बात यह हुई कि खलील ने सीधे-सीधे कह दिया – “ये हमला इजरायल की अपनी ही नीतियों का नतीजा था।” अब भई, ऐसा बोल देना तो ऐसा हुआ जैसे किसी बुलडोजर को बुला लिया हो! अमेरिकी नेताओं से लेकर यहूदी समुदाय तक सब पागल हो गए। और सोशल मीडिया? वहाँ तो मानो मच्छरों ने छत्ता हिला दिया हो। लोग पूछ रहे हैं – अमेरिका में रहकर ऐसे बयान देना कहाँ तक ठीक है? पर एक सवाल मेरा भी – क्या free speech का मतलब यही है? या फिर हदें होनी चाहिए?

लोग क्या कह रहे हैं? गर्मागर्म बहस!

एक तरफ तो सीनेटर साहब गरज रहे हैं – “आतंकवाद को जस्टिफाई करना? ये तो अमेरिका के खिलाफ है!” दूसरी तरफ कुछ लोग कह रहे हैं कि खलील ने तो बस फिलिस्तीनियों के दर्द को उठाया है। पर यार, सच बात तो यह है कि इस तरह के बयानों से असली मुद्दा कहीं पीछे छूट जाता है। नतीजा? एक और बेकार की लड़ाई, और समाधान से हम और दूर हो जाते हैं।

अब आगे क्या? 3 संभावनाएं

1. खलील के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है – शायद उनकी यूनिवर्सिटी की सदस्यता पर सवाल उठे
2. ये मामला इजरायल-फिलिस्तीन बहस को और गरमा देगा
3. कैंपस में free speech पर नए नियम आ सकते हैं

मेरी निजी राय: देखिए, मुद्दा सिर्फ एक बयान का नहीं है। असल सवाल यह है कि हम कब तक दूसरों के दर्द को नजरअंदाज करते रहेंगे? और कब तक हिंसा को किसी न किसी तरह जस्टिफाई करते रहेंगे? ये तो वैसा ही है जैसे आग में घी डालना। पर सच तो यह भी है कि इस तरह के विवादों से असली मुद्दा – शांति का रास्ता – कहीं खो जाता है। क्या आपको नहीं लगता?

Source: NY Post – US News | Secondary News Source: Pulsivic.com

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