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क्या आपकी मीटिंग्स को सुन रहा है AI? सावधान रहें, आपकी बातचीत हो सकती है रिकॉर्ड!

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क्या आपकी मीटिंग्स में कोई ‘तीसरा व्यक्ति’ बैठा है? AI की ये आदतें कर देंगी आपको हैरान!

भईया, डिजिटल दुनिया में तो हम सब नंगे हो चुके हैं – सच कहूँ तो! अब तो AI वाले टूल्स हमारी हर छोटी-बड़ी बात सुन रहे हैं। हाल ही में मैंने एक ऐसे सॉफ्टवेयर के बारे में सुना जो आपकी मीटिंग्स का हर शब्द… हाँ, वो अनचाहे फुसफुसाए गए शब्द भी… रिकॉर्ड कर लेता है। सोचिए, आपके ‘ऑफ द रिकॉर्ड’ कमेंट्स भी अब रिकॉर्ड पर आ सकते हैं। पर सवाल ये है कि क्या ये सुविधा है या साइबर दुनिया का नया खतरा? चलिए, आज इसी पर गप्पें मारते हैं।

इंटरफेस: क्या ये सॉफ्टवेयर दिखने में उतना ही अच्छा है जितना कि टिकटॉक फिल्टर्स?

मान लीजिए आपको कोई नया फोन मिला हो – अगर उसका इंटरफेस समझने में 10 मिनट लग जाएं तो मूड खराब हो जाता है न? इस सॉफ्टवेयर के साथ ऐसा नहीं है। इसका डैशबोर्ड उतना ही साफ-सुथरा है जितना कि आपकी मम्मी चाहती हैं कि आपका रूम हो। Zoom, Google Meet जैसे प्लेटफॉर्म्स के साथ इंटीग्रेशन भी बिल्कुल वैसा ही स्मूद है जैसे दही के साथ चीनी।

पर… हमेशा एक पर होता है न? डेटा सुरक्षा वाला मसला तो लटका ही रहता है। डेवलपर्स ने एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन जैसे बड़े-बड़े शब्दों का इस्तेमाल किया है, मगर क्लाउड पर डेटा स्टोर करने का मतलब है – आपका राज़ किसी और की जेब में भी हो सकता है। थोड़ा डरावना लगता है न?

ट्रांसक्रिप्शन: क्या ये AI आपकी ‘हिंग्लिश’ भी समझ पाता है?

इसकी सबसे जबरदस्त खासियत? रियल-टाइम में आपकी बकवास… मतलब बातचीत को टेक्स्ट में बदल देना। 90% केस में तो ये ठीक-ठाक काम करता है। लेकिन अगर कोई भोजपुरी एक्सेंट में बोल रहा हो या फिर बैकग्राउंड में आपका पंखा चल रहा हो – तब? तब तो ये AI भी हम इंसानों की तरह कन्फ्यूज हो जाता है। हँसी आती है कभी-कभी देखकर कि कैसे ये गलतियाँ करता है।

और सुनिए – ट्रांसक्रिप्ट को आप बुलेट पॉइंट्स में ऑर्गनाइज कर सकते हैं। जैसे आपकी मम्मी सब्ज़ियों को अलग-अलग डिब्बों में रखती हैं, वैसे ही। बहुत काम की चीज़ है खासकर उनके लिए जिन्हें मीटिंग के बाद ‘क्या हुआ था यार?’ वाली स्थिति का सामना करना पड़ता है।

AI की समझ: क्या ये सच में उतना ही स्मार्ट है जितना कि आपका स्कूल का मॉनिटर?

ये सॉफ्टवेयर कितना समझदार है? देखिए, मल्टीपल लैंग्वेजेज समझ लेता है – पर कभी-कभी उसे टाइम लगता है। जैसे आपके वो दोस्त जो जोक सुनकर 5 मिनट बाद हँसते हैं। रियल-टाइम ट्रांसक्रिप्शन में 2-3 सेकंड की देरी होती है – इतनी देर में तो हम WhatsApp का मैसेज डिलीट भी कर सकते हैं। और हाँ, ऑफलाइन मोड में ये उतना शानदार नहीं है – बिल्कुल नेटवर्क न होने पर हमारे मूड की तरह।

फेस रिकग्निशन: क्या ये आपको आपकी सास से भी बेहतर पहचानता है?

अगर आप वीडियो ऑन करके मीटिंग करते हैं, तो ये सॉफ्टवेयर ऑडियो के साथ वीडियो को भी सिंक कर सकता है। कुछ एडवांस्ड वर्जन तो फेस रिकग्निशन भी करते हैं – मतलब ये पहचान लेता है कि कौन बोल रहा है। पर कभी-कभी ये आपको आपके कॉलेज के दोस्त के साथ मिक्स कर देता है। हुआ न मजेदार?

बैटरी लाइफ: क्या ये सॉफ्टवेयर आपके फोन की जान ले लेता है?

सच बताऊँ? ये सॉफ्टवेयर आपके फोन की बैटरी को उसी तरह खत्म कर देता है जैसे दिल्ली की गर्मी हमारा पसीना। लंबी मीटिंग्स के दौरान तो आपको चार्जर ढूंढने की जरूरत पड़ सकती है। एक तरह से ये आपको ब्रेक लेने के लिए फोर्स ही कर देता है!

फायदे और नुकसान: खरीदें या न खरीदें?

अच्छाइयाँ: रियल-टाइम ट्रांसक्रिप्शन बिल्कुल जादू जैसा है। मल्टीपल प्लेटफॉर्म्स के साथ काम करना और भाषाएँ समझना – ये सब बहुत काम की चीज़ें हैं।

बुराइयाँ: प्राइवेसी? हाँ, वो तो जैसे इन दिनों किसी की भी नहीं रही। रिसोर्सेज ज्यादा खाता है और ऑफलाइन में तो ये आपके पुराने नोकिया फोन जितना ही स्लो हो जाता है।

आखिरी बात: क्या ये आपके लिए है?

अगर आपको बार-बार मीटिंग नोट्स भेजने में दिक्कत होती है, तो ये टूल आपके लिए ही बना है। पर याद रखिए – जैसे आप अपने फोन में कोई भी ऐप डाउनलोड करने से पहले परमिशन्स चेक करते हैं, वैसे ही इसकी प्राइवेसी सेटिंग्स को अच्छे से देख लें। नहीं तो आपकी गुप्त बातें किसी और की मीटिंग का टॉपिक बन सकती हैं!

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क्या सच में AI हमारी बातें चुपके से रिकॉर्ड कर रहा है?

देखिए, सीधी बात यह है – हां, कर सकता है! खासकर जब आप Google Assistant, Siri या किसी transcription service का इस्तेमाल करते हैं। मगर यहाँ सवाल यह है कि क्या आपको पता है आपने किसे permission दी हुई है? मैं तो हमेशा कहता हूँ – privacy policy पढ़ना उतना ही ज़रूरी है जितना कि कोई contract साइन करने से पहले उसे चेक करना।

पता कैसे चलेगा कि कोई app चुपके से मेरी बातें रिकॉर्ड कर रहा है?

अरे भई, इतना मुश्किल भी नहीं है! बस ये करें:
1. Phone की settings में जाएं
2. Microphone permissions चेक करें
3. Installed apps की लिस्ट देखें

एक छोटी सी टिप – अगर कोई app बेवजह mic access मांग रहा है, तो समझ जाइए कि कुछ तो गड़बड़ है। मेरा तो यही rule है – जितने कम apps को access दें, उतना अच्छा।

अगर AI रिकॉर्ड कर भी ले, तो privacy कैसे बचाएं?

इसे ऐसे समझिए – आपके घर का मेन गेट तो खुला है, लेकिन आप अंदर और ताले लगा सकते हैं। कैसे?
• WhatsApp जैसे end-to-end encrypted platforms use करें
• बेकार के apps को mic access बिल्कुल न दें
• महीने में एक बार security settings ज़रूर चेक करें

सच कहूँ तो, थोड़ी सी सावधानी आपको बड़ी मुसीबत से बचा सकती है।

क्या यह कानूनी है? AI का हमें रिकॉर्ड करना?

यहाँ बात दिलचस्प हो जाती है। कानून तो है, लेकिन… हमेशा clear नहीं होता। जैसे:
• Europe में GDPR के तहत strict rules हैं
• भारत में अभी डेटा प्रोटेक्शन बिल pending है
• अमेरिका में state-wise अलग-अलग regulations

मेरी सलाह? जहां रहते हैं, वहां के local laws ज़रूर check कर लें। और हाँ, company की privacy policy को ignore करने की गलती मत करिएगा!

Source: WSJ – Digital | Secondary News Source: Pulsivic.com

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