अमेरिका का वो दोहरा खेल: मुंह पर शांति, हाथ में हथियार!
क्या आपने नोटिस किया? अमेरिका फिर से यूक्रेन को भारी मात्रा में हथियार भेजने की तैयारी में है – जिसमें latest missile systems से लेकर बंकर तोड़ने वाले bombs तक शामिल हैं। हैरानी की बात ये है कि ये सब उसी वक्त हो रहा है जब अमेरिकी नेता UN में रूस-यूक्रेन war को खत्म करने की पटकथा लिख रहे हैं। ईमानदारी से कहूं तो, ये दोहरी नीति देखकर कोई भी सोचेगा – भईया, इन्हें आखिर चाहिए क्या? शांति या फिर लंबा चलता हुआ युद्ध जिससे arms industry को फायदा हो?
पूरा माजरा क्या है?
असल में देखा जाए तो, फरवरी 2022 से चल रहे इस जंग में अमेरिका यूक्रेन का सबसे बड़ा ‘आर्म्स डीलर’ बना हुआ है। अब तक का हिसाब लगाएं तो 66 अरब डॉलर से ज्यादा के हथियार! यानी Patriot missiles से लेकर Bradley tanks तक, Stinger missiles से लेकर drones तक – सब कुछ। अमेरिका का कहना है कि ये सब यूक्रेन को ‘बचाव’ के लिए दिया जा रहा है। लेकिन रूस का तो ये भी मानना है कि ये war को fuel देने जैसा है। सच क्या है? शायद इतिहास ही बताएगा।
एक तरफ तो बाइडेन प्रशासन शांति की गुहार लगाता है, दूसरी तरफ हथियारों की खेप भेजने में कोई कसर नहीं छोड़ता। थोड़ा अजीब नहीं लगता?
हालिया ड्रामा क्या है?
अभी कुछ दिन पहले ही Pentagon ने यूक्रेन को 2.1 अरब डॉलर का और ‘गिफ्ट पैक’ भेजने का ऐलान किया है। इसमें air defense systems, artillery shells और military training शामिल हैं। बाइडेन साहब ने इसे ‘यूक्रेन की आजादी के लिए जरूरी’ बताया है। और NATO देशों ने भी हामी भर दी है। मतलब साफ है – पश्चिमी देशों की strategy में कोई बदलाव नहीं आया है।
दुनिया क्या कह रही है?
इस पूरे मामले पर international reactions बिल्कुल mixed हैं। रूसी foreign ministry तो सीधे अमेरिका पर आरोप लगा रही है कि ये ‘war को हवा देने’ जैसा है। वहीं ज़ेलेंस्की जी अमेरिका के आभारी हैं – उनका कहना है कि ये हथियार ‘victory के लिए जरूरी’ हैं। experts भी दो खेमों में बंटे हुए हैं – कुछ कहते हैं कि ये war को लंबा खींचेगा, तो कुछ का मानना है कि रूस को रोकने का यही एकमात्र तरीका है।
आगे क्या होगा?
अमेरिका और NATO की military aid से यूक्रेन की fighting capacity तो बढ़ेगी, लेकिन क्या ये war का कोई permanent solution है? बिल्कुल नहीं। रूस इसे ‘western interference’ मानकर और aggressive हो सकता है। और अगर हथियारों की ये होड़ यूं ही चलती रही तो… situation और बिगड़ सकती है। सच पूछो तो, ये सारा घमासान एक बड़ा सवाल छोड़ जाता है – क्या हथियारों से शांति आती है? या फिर ये सिर्फ war को और भयानक बनाने का तरीका है?
क्या सोचते हैं आप?
अमेरिका का दोहरा चेहरा: मुंह पर राम, बगल में छुरी – कुछ सवाल, कुछ जवाब
1. भई साहब, अमेरिका शांति की गीता क्यों पढ़ता है, लेकिन हथियारों का व्यापार भी करता है?
असल में बात ये है कि अमेरिका की foreign policy वही पुरानी कहावत है – “दोनों हाथों में लड्डू”। एक तरफ तो वो UN में खड़े होकर world peace की बात करता है (बड़ा भारी भाषण देता है!), लेकिन दूसरी तरफ उसका arms industry… अरे भई, पूरी दुनिया को हथियार बेचने में नंबर वन है। सच कहूं तो यहां diplomacy और business का ऐसा cocktail बनता है कि पता ही नहीं चलता किसका स्वाद कब बदल जाए।
2. सुनो, क्या अमेरिका के हथियार बेचने से दुनिया में झगड़े बढ़ रहे हैं?
देखिए, experts की राय तो यही है – जैसे माचिस बेचकर आग लगने से मना करना। खासकर वो conflict zones जहां पहले से तनाव है… वहां हथियार पहुंचना तेल में आग लगाने जैसा है। और सच तो ये है कि कई बार ये हथियार गलत हाथों में – चाहे terrorists हों या फिर ऐसी governments जिनका अपना ही control नहीं – पहुंच जाते हैं। नतीजा? Violence का चक्रव्यूह जो चलता ही रहता है।
3. अच्छा, दुनिया इस double standard पर क्या बोलती है?
ईमानदारी से कहूं तो बहुत से देशों को ये बात खटकती है। UN में भी कई बार इसपर बहस हुई है, लेकिन… हां, यहां एक बड़ा ‘लेकिन’ आता है। अमेरिका की global influence और उसकी veto power के आगे बाकी देशों की क्या हस्ती? कागजी घोड़े दौड़ाने जैसा ही है।
4. सुनिए, क्या अमेरिका की सरकार और हथियार कंपनियों के बीच कोई गठजोड़ है?
अरे भाई, ये तो खुला राज है! अमेरिका में तो इसका एक पूरा नाम है – “Military-Industrial Complex”। ये कोई छोटा-मोटा lobby नहीं, बल्कि एक दैत्य है जो सीधे government policies को influence करता है। Defense budgets बढ़ाने से लेकर नई-नई wars तक… और हां, कई politicians तो इन कंपनियों से funding लेते हैं। कहने को तो democracy है, लेकिन असल में? पैसे का खेल। बिल्कुल बॉलीवुड स्टाइल!
Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com