“भूमिहारों का सबसे बड़ा दुश्मन कौन? यादव vs राजपूत – बिहार की जातिगत राजनीति का सच!”

भूमिहारों का सबसे बड़ा दुश्मन कौन? यादव या राजपूत – बिहार की जातीय राजनीति का वो खेल जो आपको समझना चाहिए!

अभी तो 2024 चल रहा है, लेकिन बिहार की सियासत में 2025 के चुनाव की गर्माहट शुरू हो चुकी है। और इस बार सबसे दिलचस्प सवाल यह है – भूमिहार समुदाय के लिए असली खतरा किसमें है? यादवों की बढ़ती ताकत में या फिर राजपूतों के साथ बढ़ते तनाव में? सच कहूं तो, ये सवाल बिहार की जातीय राजनीति की उस पहेली की तरह है जिसका जवाब हर कोई जानना चाहता है, लेकिन कोई साफ-साफ बता नहीं पाता।

पहले थोड़ा पीछे चलते हैं…

देखिए न, बिहार में भूमिहारों का इतिहास कुछ वैसा ही रहा है जैसे किसी फिल्म के ‘पावरफुल डैडी’ का रोल। ज़मीनदारी, राजनीति, प्रभाव – सब कुछ। पर ये रही मजेदार बात – पिछले कुछ सालों में इनका राजनीतिक वजन कभी BJP के पलड़े में, तो कभी JDU की तरफ झुकता रहा है। और अब तो यादव (जो मानो RJD की रीढ़ हैं), राजपूत (BJP के दमदार सपोर्टर्स) और कोइरी-कुर्मी (नितीश कुमार का कोर वोट बैंक) – तीनों ही मोर्चे पर इनके लिए चुनौती बन गए हैं। है न मजेदार गणित?

2025 का गेम: कौन किसके खिलाफ?

अब आते हैं मौजूदा हालात पर। पटना से लेकर मुजफ्फरपुर तक, यादव नेता जैसे भूमिहारों के गढ़ों पर सीधा हमला बोल रहे हैं। और भाजपा के भीतर ही राजपूत नेताओं का एक गुट भूमिहारों के खिलाफ मोर्चा खोलने लगा है। स्थिति ऐसी है जैसे किसी ने चिड़ियाघर के सारे जानवरों को एक साथ छोड़ दिया हो! BJP और JDU के बीच टिकट बंटवारे को लेकर जो तनाव है, वो तो बस चेरी ऑन द केक जैसा है।

नेताओं की ‘चाय दुकान’ वाली बातें

एक भूमिहार नेता तो बिल्कुल उस अंकल की तरह बोल रहे हैं जो पार्टी को डरा रहा है – “2025 में हमें वो सम्मान चाहिए वरना…!” वहीं RJD वाले अपनी पुरानी रट लगा रहे हैं – “पिछड़ों को एक होना होगा।” और BJP? वो तो हमेशा की तरह ‘हम सबके साथ हैं’ वाली फिल्मी डायलॉग बोल रही है। पर सच्चाई यही है कि इन सबके बीच भूमिहार समुदाय की नाराजगी 2025 में बड़ा भूचाल ला सकती है।

आगे क्या? कुछ अंदाज़ा लगाइए!

अगर भूमिहारों को लगा कि उनके साथ अन्याय हो रहा है, तो ये लोग या तो किसी और पार्टी में चले जाएंगे, या फिर ‘इंडिपेंडेंट’ होकर चुनाव लड़ेंगे। और तब बिहार की सियासत का वो खेल शुरू होगा जिसमें सबका कुछ न कुछ बिगड़ेगा जरूर। यादव-राजपूत-भूमिहार की इस तिकड़ी में अगर टकराव बढ़ा, तो सरकार बनाना उतना ही मुश्किल हो जाएगा जितना कि बिना नमक के पराठे खाना!

तो फिर क्या होगा? सच तो यह है कि 2025 में भूमिहारों के फैसले ही तय करेंगे कि बिहार की सत्ता पर किसकी पताका लहराएगी। और ये जातीय समीकरण? ये तो वो पुराना खेल है जो बिहार में हमेशा से चलता आया है… और शायद आगे भी चलता रहेगा!

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Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com

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