बिहार-यूपी में बाढ़ का कहर और किसानों की बेबसी – असली समस्या क्या है?
क्या आपने कभी सोचा है कि प्रकृति कितनी विचित्र हो सकती है? एक तरफ बिहार और यूपी के लोग छतों पर भाग रहे हैं तो दूसरी तरफ तमिलनाडु के किसान पानी की एक बूंद के लिए तरस रहे हैं। ये कोई मामूली बात नहीं है, बल्कि एक बड़े संकट की शुरुआत है। और हम? हम तो बस खबर पढ़कर आगे बढ़ जाते हैं।
एक ही देश, दो अलग हकीकत
बिहार की स्थिति तो जैसे हर साल की कहानी बन चुकी है। गंगा, घाघरा जैसी नदियाँ नहीं, बल्कि रोते हुए लोगों की कहानियाँ खतरे के निशान को पार कर चुकी हैं। और यूपी? वहाँ तो हालात इतने खराब हैं कि NDRF वाले भी थककर चूर हो रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि ये सब कुछ हमारी लापरवाही का नतीजा है।
अब दक्षिण की बात करें तो… मदुरै का वह तालाब जहाँ कभी बच्चे तैराकी करते थे, आज सूखकर दरक चुका है। किसान? उनकी हालत तो वैसी ही है जैसे बिना ऑक्सीजन के मरीज की होती है। मौसम विभाग के आँकड़े तो बस औपचारिकता हैं, असली दर्द तो वो जानते हैं जिनकी फसलें मर रही हैं।
जमीनी हकीकत क्या कहती है?
बिहार के गाँवों में आज भी लोग नावों में अपना सामान बचा रहे हैं। सीतामढ़ी से लेकर दरभंगा तक – हर जगह एक ही कहानी। सरकारी राहत शिविर? वो तो बस एक छोटी सी पट्टी है बड़े ज़ख्म पर। और यूपी सरकार का दावा कि उन्होंने सब कुछ कंट्रोल कर लिया है… हँसी आती है।
तमिलनाडु में तो हालात और भी खराब हैं। किसानों का कहना है कि सरकारी योजनाएँ कागजों तक ही सीमित हैं। “हमें अभी पानी चाहिए, न कि चुनाव के वादे” – ये शब्द एक किसान ने मुझसे कहे थे। सच कहूँ तो उनकी बात में दम है।
क्या कहते हैं जिम्मेदार लोग?
बिहार के सीएम का बयान तो हर साल का रटा-रटाया है: “हम पूरी कोशिश कर रहे हैं…” लेकिन असल सवाल यह है कि क्यों हर साल यही कोशिश दोहरानी पड़ती है? वहीं तमिलनाडु के अधिकारियों का रवैया ऐसा लगता है जैसे उन्हें पता ही नहीं कि संकट क्या है।
मौसम वैज्ञानिकों की बातें सुनकर तो लगता है कि अब तो बस शुरुआत ही हुई है। “जलवायु परिवर्तन” – ये शब्द अब कोई विज्ञान की किताब की बात नहीं रहा। ये तो हमारे घरों के आँगन में दस्तक दे चुका है।
आगे का रास्ता क्या है?
मौसम विभाग की चेतावनी के मुताबिक बिहार-यूपी को और मुसीबत झेलनी पड़ सकती है। और तमिलनाडु? वहाँ तो जैसे अभी तक कोई सुनवाई ही नहीं हुई है। सच तो यह है कि हमारी व्यवस्था में इतनी लचरता आ चुकी है कि छोटी-छोटी बारिशें भी तबाही ला देती हैं।
जल प्रबंधन की बात करने वाले तो बहुत हैं, लेकिन काम करने वाले कहाँ हैं? हमें समझना होगा कि ये कोई सामान्य मामला नहीं है। जब एक ही देश में एक साथ बाढ़ और सूखा पड़ रहा हो, तो समझ लीजिए कि प्रकृति हमें कोई संदेश दे रही है। सवाल यह है कि क्या हम सुनने को तैयार हैं?
अंत में एक बात – अगले चुनाव में वोट देते समय याद रखिएगा कि जिसने आपके इलाके की पानी की समस्या हल की, वही असली नेता है। बाकी तो सब बातें हैं… बस बातें।
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बिहार और यूपी में बाढ़ की वजह क्या है?
देखिए, असल में बात ये है कि heavy rainfall तो हर साल होता है, लेकिन इस बार नदियों का जलस्तर कुछ ज्यादा ही बढ़ गया। और हाँ, dams से अचानक पानी छोड़ने वाली बात भी सच है – जैसे किसी ने बिना बताए बाल्टी उलट दी हो! अब स्थिति ये है कि पानी कहीं जाने को जगह ही नहीं बची।
बाढ़ से किसानों की फसलों को कितना नुकसान हुआ है?
ईमानदारी से कहूँ तो आँकड़े डरावने हैं। कुछ इलाकों में तो स्थिति ये है कि 50% से ज्यादा फसलें पानी में डूब चुकी हैं। खासकर धान और गन्ने की फसल तो जैसे पूरी तबाह। और सब्जियाँ? उनकी तो बात ही मत कीजिए – वो तो पानी में बहने के बाद सड़ने लगती हैं। एकदम दुखद स्थिति।
सरकार ने किसानों के लिए क्या relief measures announce किए हैं?
सुनिए, सरकार ने financial aid का ऐलान तो किया है, लेकिन ये पैसा कब तक और कैसे पहुँचेगा, ये अलग सवाल है। seeds और fertilizers की बात भी की जा रही है, पर हम सब जानते हैं न कि अक्सर ये सहायता ground level तक पहुँचते-पहुँचते काफी देर हो चुकी होती है। crop insurance की बात अच्छी लगी, लेकिन कागजी कार्रवाई में ही कितना समय लग जाता है!
आने वाले दिनों में और बारिश की संभावना है क्या?
मौसम विभाग वालों का कहना है कि अब heavy rainfall की उम्मीद कम है। लेकिन याद रखिए, नदियों का पानी उतरने में time तो लगेगा ही – ऐसे ही तो नहीं चला जाएगा न! मेरा सुझाव? किसान भाइयों को अभी भी सतर्क रहना चाहिए। क्योंकि मौसम के साथ कभी भरोसा नहीं किया जा सकता, है न?
Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com