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NDA सहयोगी दलों ने बिहार वोटर लिस्ट पर उठाए सवाल, चुनाव आयोग की जल्दबाजी को लेकर हुआ विवाद

बिहार वोटर लिस्ट विवाद: NDA के साथी भी बोले – “चुनाव आयोग, थोड़ा तो सोचो!”

अरे भई, बिहार की राजनीति में फिर से हलचल मच गई है। और इस बार का मुद्दा है वोटर लिस्ट। सच कहूं तो, ये मामला उतना ही पुराना है जितना कि लालू-नीतीश की दोस्ती-दुश्मनी। लेकिन इस बार तो NDA के अपने ही साथी दल आयोग पर भड़क गए हैं। जेडीयू के प्रवक्ता नीरज कुमार तो सीधे-सीधे बोले – “भाई, बूथ एजेंट नियुक्त करने का टाइम तो दो! ऐसे अचानक लिस्ट थोप दी, जैसे कोई एक्सप्रेस ट्रेन का टिकट कटवा रहा हो।”

आखिर है क्या पूरा माजरा?

देखिए, वोटर लिस्ट अपडेट होती है हर साल। रूटीन का काम है। पर इस बार… हालात कुछ ऐसे बने कि सबके होश उड़ गए। चुनाव आयोग ने नए नाम जोड़े हैं, जिस पर विपक्ष का तो पहले से ही सिर दर्द था। लेकिन असली मसला ये है कि क्या सच में सभी नाम वैध हैं? क्योंकि अगर ऐसा नहीं है तो… समझदार लोग समझ जाएंगे कि आगे क्या हो सकता है।

राजनीति का पारा चढ़ा

अब तो NDA के साथी भी मैदान में कूद पड़े हैं। जेडीयू और भाजपा वाले कह रहे हैं – “हमें भी शिकायतें मिल रही हैं।” वहीं आयोग का कहना है कि सब कुछ नियमों के मुताबिक हुआ है। मजे की बात ये कि RJD और कांग्रेस तो सीधे सरकार पर आरोप लगा रहे हैं। उनका कहना है – “ये सब दबाव में किया जा रहा है।” सच्चाई चाहे जो हो, पर बात तो गर्म हो गई है न?

नीरज कुमार का तो कहना ही था – “15 दिन का टाइम तो मिलना चाहिए था न भाई!” वहीं RJD के एक नेता ने तो बिना लाग-लपेट के कह दिया – “साफ-साफ हेराफेरी चल रही है।” अब ये सुनकर तो कोई भी सोचने पर मजबूर हो जाएगा कि आखिर सच क्या है?

अब आगे क्या?

अब सबकी नजरें आयोग पर टिकी हैं। क्या वो शिकायतों की जांच करेगा? क्या लिस्ट दोबारा चेक होगी? और सबसे बड़ा सवाल – क्या ये मुद्दा अगले चुनावों में बड़ा राजनीतिक हथियार बन जाएगा? क्योंकि बिहार में तो… ये सब देखने को मिलता रहता है।

एक बात तो तय है – ये विवाद सिर्फ वोटर लिस्ट तक सीमित नहीं है। ये तो लोकतंत्र के उस बुनियादी ढांचे पर सवाल है जिस पर हम सबका भरोसा टिका है। अब देखना ये है कि आयोग इस गंभीर मामले को कैसे संभालता है। क्योंकि अंत में, जनता का विश्वास ही तो सबसे बड़ी चीज है। है न?

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Bihar में NDA के साथी दलों ने voter list को लेकर जो सवाल उठाए हैं, और Election Commission की जल्दबाजी… ये मामला सिर्फ़ एक राजनीतिक विवाद नहीं है। असल में, यह सीधे-सीधे हमारे लोकतंत्र की जड़ों से जुड़ा हुआ है। अब सवाल यह है कि Election Commission आगे क्या कदम उठाएगी? क्योंकि देखा जाए तो यहाँ पारदर्शिता और विश्वास दोनों दाँव पर लगे हुए हैं।

और हाँ, एक बात और। हम जैसे आम voters के लिए यह सिर्फ़ खबरों में एक और मुद्दा नहीं है। सच कहूँ तो, यह हमारे voting rights का सवाल है। थोड़ा सचेत रहिए, थोड़ा जागरूक। क्योंकि democracy में हमारी आवाज़ ही हमारी ताकत है। है न?

(Note: Used conversational connectors like “असल में”, “सच कहूँ तो”, rhetorical questions, and fragmented emphasis like “है न?” to humanize. Preserved English terms in original form.)

Source: Navbharat Times – Default | Secondary News Source: Pulsivic.com

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