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“ब्रह्मपुत्र पर चीन का दबाव: क्या भारत को सच में है खतरा? जानिए सिंधु vs ब्रह्मपुत्र का पूरा सच!”

ब्रह्मपुत्र पर चीन का खेल: क्या हमारे पूर्वोत्तर के लिए खतरे की घंटी है? सिंधु vs ब्रह्मपुत्र की पूरी कहानी!

देखिए न, चीन फिर से अपने पुराने खेल में लग गया है। हाल में उसने ब्रह्मपुत्र नदी (जिसे तिब्बत में यारलुंग सांगपो कहते हैं) पर नए बांध बनाने की योजना फिर से शुरू कर दी है। अब सवाल यह है – क्या यह सिर्फ बिजली उत्पादन की बात है, या कोई गहरा मकसद? असल में, अगर चीन पानी का प्रवाह रोकेगा, तो हमारे अरुणाचल और असम जैसे राज्यों को सीधा नुकसान होगा। और यह मामला तब और गंभीर हो जाता है जब सिंधु जल समझौते को लेकर पाकिस्तान पहले ही हम पर दबाव बना रहा है। दो मोर्चों पर पानी की लड़ाई – सच में मुश्किल वक्त आ गया है।

पूरी कहानी समझिए: क्यों इतना अहम है ब्रह्मपुत्र और सिंधु?

ब्रह्मपुत्र सिर्फ एक नदी नहीं, हमारे पूर्वोत्तर की जान है। सोचिए, तिब्बत से निकलकर अरुणाचल, असम होते हुए बांग्लादेश तक जाती है ये नदी। किसानों की फसल से लेकर गांवों की प्यास बुझाने तक – सब इसी पर निर्भर। और अब चीन नए बांध बनाने की बात कर रहा है? हालांकि वो पहले भी कई हाइड्रोप्रोजेक्ट बना चुका है, लेकिन इस बार की योजना ज्यादा बड़ी लग रही है।

वहीं दूसरी तरफ सिंधु नदी का मामला है। 1960 के समझौते के मुताबिक, पाकिस्तान को ज्यादा पानी मिलता है, पर हमारे पास पश्चिमी नदियों (सतलज, ब्यास, रावी) पर कंट्रोल है। मजे की बात ये कि पाकिस्तान हमें दोष दे रहा है, जबकि सच्चाई कुछ और ही है। क्या आपको नहीं लगता कि ये सब एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है?

ताजा अपडेट: चीन क्या कर रहा है और हम कैसे रिएक्ट कर रहे हैं?

चीन ने तो खुलकर कह दिया है कि वो ब्रह्मपुत्र पर मेगा डैम बनाएगा। हमारी सरकार ने जवाब में पारदर्शिता और डेटा शेयरिंग की मांग की है – बिल्कुल सही कदम। पर सवाल यह है कि क्या चीन मानेगा? और हैरानी की बात ये कि पाकिस्तान अब विश्व बैंक को इस मामले में घसीट रहा है! हमने साफ कह दिया है कि हम समझौते का पूरा पालन कर रहे हैं। लेकिन सच्चाई क्या है, ये तो वक्त ही बताएगा।

एक्सपर्ट्स क्या कहते हैं? जानिए असली सच

हमारे विशेषज्ञों का मानना है कि चीन पानी को हथियार बना सकता है। पर घबराने की बात नहीं – हमारे पास भी कुछ तो जवाबी कार्रवाई के विकल्प हैं न! चीन का दावा है कि ये सिर्फ बिजली के प्रोजेक्ट हैं, पर क्या हमें यकीन करना चाहिए? वहीं पाकिस्तानी मीडिया तो हमें बदनाम करने में जुटा हुआ है। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों की राय है कि ये मामला भारत-चीन रिश्तों को एक नया मोड़ दे सकता है। सच कहूं तो, स्थिति गंभीर है।

आगे क्या? भारत के पास क्या विकल्प हैं?

हमें दो तरफ से काम करना होगा – एक तो अपना जल प्रबंधन मजबूत करना, दूसरा चीन से बातचीत जारी रखना। बड़ा सवाल ये कि क्या चीन सहयोग करेगा, या फिर अपनी जिद पर अड़ा रहेगा? और पाकिस्तान तो मानो बैकफुट पर आ गया है। देखना ये है कि क्या वो इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाएगा?

एक बात तो तय है – ब्रह्मपुत्र और सिंधु, दोनों ही हमारे लिए जीवन-मरण का सवाल हैं। थोड़ी सी लापरवाही और… समझदारी तो यही कहती है कि दोनों मोर्चों पर सतर्क रहना होगा। वैसे भी, पानी के बिना तो जीवन संभव नहीं, है न?

यह भी पढ़ें:

ब्रह्मपुत्र vs सिंधु नदी विवाद: जानिए क्या है पूरा मामला!

1. चीन ब्रह्मपुत्र नदी पर कैसे दबाव बना रहा है?

देखिए, चीन ने ब्रह्मपुत्र (या जिसे वे Tsangpo River कहते हैं) पर कई बाँध बना लिए हैं। और बस यही नहीं, अब तो पानी का रुख मोड़ने की भी बात चल रही है! सोचिए, अगर ऐसा हुआ तो भारत और बांग्लादेश के लिए पानी की किल्लत हो सकती है। बिल्कुल वैसे ही जैसे किसी की नल की सप्लाई काट दी जाए।

2. क्या भारत सिंधु नदी के पानी को लेकर चीन जैसी चाल चल सकता है?

अब यहाँ मजेदार बात यह है कि सिंधु नदी का ज्यादातर पानी तो पाकिस्तान में जाता है। लेकिन हम भी Indus Water Treaty के मुताबिक अपने हक की बात कर सकते हैं। पर सच कहूँ तो, यह कोई आसान मामला नहीं है। एक तरफ तो diplomacy है, दूसरी तरफ practical challenges। क्या करें, क्या न करें – बड़ा उलझन भरा है!

3. ब्रह्मपुत्र नदी का भारत के लिए क्या महत्व है?

अरे भाई, ब्रह्मपुत्र तो North-East की जान है! कृषि हो, बिजली हो या पीने का पानी – सब कुछ इसी नदी पर निर्भर करता है। अब अगर चीन ने ऊपर से पानी रोक लिया तो? सोचकर ही डर लगता है न? यह पूरा इकोसिस्टम ही बिगड़ सकता है। एकदम डरावना सीन!

4. क्या इस मुद्दे पर भारत और चीन के बीच कोई समझौता है?

सीधी बात – नहीं! ब्रह्मपुत्र के पानी को लेकर कोई formal treaty नहीं है। हाँ, कुछ data sharing और cooperation के agreements जरूर हुए हैं। लेकिन ये सब legally binding नहीं हैं। मतलब? मतलब यह कि चीन चाहे तो कभी भी अपना रुख बदल सकता है। थोड़ा risky लगता है न?

Source: Navbharat Times – Default | Secondary News Source: Pulsivic.com

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