डाबर बनाम पतंजलि: ये टूथपेस्ट वाली जंग किसकी इमेज खराब करेगी?
अरे भाई, भारत के FMCG मार्केट में तो मजा आ गया! दो बड़े दावेदार – डाबर और पतंजलि – कोर्ट-कचहरी के चक्कर में फंसे हुए हैं। सारा मामला है पतंजलि के “दन्त कान्ति रेड” टूथपेस्ट की पैकेजिंग को लेकर। डाबर का कहना है कि ये तो उनके “रेड” टूथपेस्ट की सटीक कॉपी है। और सच कहूं तो, पैकेट देखकर मुझे भी कन्फ्यूजन हुआ था! कोर्ट ने तो मध्यस्थता (mediation) की कोशिश भी की, लेकिन बात नहीं बनी। अब अगली सुनवाई… अरे भई साल 2025 में! इतना लंबा वक्त? तब तक तो शायद नया टूथपेस्ट ही आ जाए!
पूरा झगड़ा किस बात का है?
डाबर की बात सुनो तो लगता है सच में नाइंसाफी हुई है। उनका “रेड” टूथपेस्ट तो 1949 से मार्केट में है – हमारे दादा-परदादा भी इस्तेमाल करते थे! उनका कहना है कि लाल-सफेद पैकेजिंग, फॉन्ट स्टाइल – सब कुछ इतना मिलता-जुलता है कि ग्राहक धोखा खा जाते हैं। और सच कहूं तो ये सिर्फ पैकेजिंग की बात नहीं, बल्कि उनकी बौद्धिक संपदा (intellectual property) का सवाल है।
वहीं पतंजलि की तरफ से जवाब आया है – “अरे ये तो बड़े ब्रांड्स वाली रणनीति है! स्वदेशी कंपनियों को डराने का तरीका!” उनका कहना है कि उनकी पैकेजिंग में आयुर्वेदिक प्रतीक और हिंदी टाइपोग्राफी तो है ही। और सही भी तो कह रहे हैं – “रेड” जैसा सामान्य शब्द पर कोई एकाधिकार थोड़े ही हो सकता है? ये तो वैसा ही है जैसे कोई कहे कि “मिठाई” शब्द सिर्फ हलवाई की दुकान के लिए इस्तेमाल हो सकता है!
कोर्ट ने क्या किया?
दिल्ली हाईकोर्ट ने तो दोनों को समझाने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी। जज साहब ने मामले को “काफी जटिल” बताया और अगली तारीख… हैरान कर देने वाली बात सुनो – दिसंबर 2025! अभी के लिए पतंजलि अपना टूथपेस्ट बेच तो सकती है, हालांकि डाबर ने रोक लगाने की मांग की थी। मतलब अभी तक ये लड़ाई जारी रहेगी!
दोनों तरफ से क्या-क्या बोला गया?
डाबर के MD साहब ने तो भावुक अपील कर डाली: “हमारा ‘रेड’ ब्रांड 80 साल से भारतीयों के दिलों में बसा है!” सच कहूं तो ये बात तो है – मेरी दादी आज भी सिर्फ यही टूथपेस्ट इस्तेमाल करती हैं। उनका कहना है कि वो ग्राहकों के हितों की रक्षा कर रहे हैं। लेकिन साथ ही वो दूसरे कानूनी विकल्पों की भी बात कर रहे हैं।
वहीं बाबा रामदेव ने तो ट्वीट करके सीधे “ब्रांड इम्पीरियलिज्म” का आरोप लगा दिया! उनका कहना है कि जब भी कोई स्वदेशी ब्रांड आगे बढ़ता है, बड़ी कंपनियां उसे कानूनी झंझटों में उलझा देती हैं। पर साथ ही उन्होंने कानून का पालन करने की बात भी कही है। एक तरह से देखें तो दोनों ही अपनी-अपनी रोटी सेक रहे हैं!
आगे क्या होगा?
ये केस तो कई मायनों में ऐतिहासिक हो सकता है। अगर डाबर जीत गया तो ट्रेड ड्रेस कॉपीराइट (trade dress copyright) के मामलों में एक मिसाल कायम होगी। वहीं अगर पतंजलि की बाजी मारी तो छोटे ब्रांड्स के लिए ये बड़ी राहत की बात होगी।
एक्सपर्ट्स की मानें तो इसका असर दोनों कंपनियों की बाजार हिस्सेदारी पर पड़ेगा ही। डाबर के लिए तो ये उनकी विरासत की लड़ाई है, वहीं पतंजलि के लिए स्वदेशी इमेज बचाने का सवाल।
असल में ये सिर्फ टूथपेस्ट की लड़ाई नहीं है। ये तो ब्रांडिंग, कॉपीराइट और कंज्यूमर साइकोलॉजी का पूरा गणित है! जैसे-जैसे केस आगे बढ़ेगा, FMCG सेक्टर के लिए ये एक महत्वपूर्ण केस स्टडी बन जाएगा। फिलहाल तो हमें यही कहना पड़ेगा – “कर लो दांत साफ, बस विवाद से बचो!”
यह भी पढ़ें:
- Jagjivan Ram 1971 War Shambhavi Controversy Truth
- Israel Iran War Avic Chengdu Share Price Rise Hormuz Strait Close
- Aoc Nyc District Market Of Sweethearts Controversy
डाबर vs पतंजलि दंत कान्ति: जो आप जानना चाहते हैं (और कुछ जो आप नहीं जानते!)
1. डाबर और पतंजलि की यह लड़ाई असल में है किस बात की?
देखिए, मामला तो टूथपेस्ट का है – Dant Kanti को लेकर। पर असल में ये बड़ी कंपनियों की वही पुरानी खींचतान है। डाबर को लगा कि पतंजलि ने अपने प्रोडक्ट के बारे में कुछ ऐसे दावे किए जो सही नहीं थे, और इससे उनकी ब्रांड इमेज को ठेस पहुंची। अब कोर्ट में यही साबित होना बाकी है। सच कहूं तो, हम जैसे आम लोगों के लिए तो बस यह समझना ज़रूरी है कि किसका टूथपेस्ट हमारे दांतों के लिए बेहतर है!
2. क्या पतंजलि का दंत कान्ति वाकई ‘केमिकल-फ्री’ है? सच्चाई क्या है?
अब यहां बात दिलचस्प हो जाती है। पतंजलि तो कसम खाकर कहते हैं कि उनका टूथपेस्ट शुद्ध आयुर्वेदिक है – एकदम केमिकल-फ्री। पर कुछ लैब्स और एक्सपर्ट्स की रिपोर्ट्स कुछ और ही कहती हैं। मेरा मानना? जब तक कोर्ट में फैसला नहीं हो जाता, हम सिर्फ अनुमान ही लगा सकते हैं। एक तरफ तो आयुर्वेद पर भरोसा है, दूसरी तरफ साइंस की बात भी तो सुननी पड़ेगी ना?
3. विवाद से बाज़ार पर क्या असर पड़ा? किसकी चली और किसका छक्का?
शुरुआत में तो पतंजलि को थोड़ा झटका लगा। लेकिन भई, उनके भक्तों (मतलब ग्राहकों) का तो जवाब नहीं! आयुर्वेद में विश्वास रखने वालों ने उनका साथ नहीं छोड़ा। और डाबर? उन्हें भी कुछ नुकसान हुआ – लोग अब उन्हें ‘बड़ी कॉरपोरेट कंपनी’ की नज़र से देखने लगे हैं। पर सच तो यह है कि दोनों ही अभी बाज़ार में टिके हुए हैं। क्योंकि भारतीय बाज़ार में तो हर किसी के अपने-अपने फैन्स होते हैं ना?
4. क्या डाबर का टूथपेस्ट भी आयुर्वेदिक है? या सिर्फ पतंजलि का दावा सही है?
यहां बात थोड़ी पेचीदा हो जाती है। डाबर का Red टूथपेस्ट तो आयुर्वेदिक तत्वों से बना है, इसमें कोई शक नहीं। पर…
Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com