“दिलों की दूरी” खत्म करने की मांग: क्या दिल्ली सुन रही है?
अरे भाई, कश्मीर का मसला तो जैसे रूठे प्रेमी की तरह है ना? जितना समझाने की कोशिश करो, उतना ही दूर होता जाता है। अभी हाल ही में PDP के मीरवाइज उमर फारूक ने फिर से केंद्र सरकार को याद दिलाया है कि “दिलों की दूरी” पाटने के लिए बंदूकें नहीं, बातचीत की ज़रूरत है। और सच कहूं तो, उनकी बात में दम तो है। क्योंकि 2019 के बाद से जो हालात बने हैं, उसमें तो यही लगता है कि अब बातचीत के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा।
पृष्ठभूमि: जब से 370 गया, तब से ये हाल
देखिए ना, कश्मीर का मामला कोई नया तो है नहीं। लेकिन 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद से जैसे पूरा खेल ही बदल गया। केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर को दो टुकड़ों में बांट दिया – एक तरफ तो उनका कहना है कि ये विकास के लिए ज़रूरी था, लेकिन दूसरी तरफ स्थानीय लोगों को लगता है कि उनकी आवाज़ दबा दी गई। और फारूक साहब तो बरसों से यही राग अलाप रहे हैं कि बिना बातचीत के यहां शांति नहीं आने वाली।
संसद में एकता… पर क्या ये काफी है?
मजे की बात ये है कि फारूक ने हाल ही में संसद में जम्मू-कश्मीर के तीनों सांसदों की एकजुटता की तारीफ भी की। अच्छी बात है ना? लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या सिर्फ़ संसद में एकजुट हो जाने से काम चल जाएगा? फारूक का तो यही मानना है कि केंद्र को सीधे लोगों से बात करनी चाहिए। और सच पूछो तो, उनकी इस बात से इनकार भी कौन कर सकता है?
रिएक्शन्स: किसने क्या कहा?
अब इस मामले में तो हर कोई अपना-अपना राग अलाप रहा है। कुछ लोग फारूक के साथ हैं तो कुछ का कहना है कि केंद्र पहले से ही काफी कुछ कर रहा है। पर स्थानीय लोग? वो तो बस यही कह रहे हैं – “हमसे पूछो तो सही!” हालांकि, अभी तक केंद्र की तरफ से कोई ठोस जवाब नहीं आया है। और यही तो समस्या है ना?
आगे क्या? इंतज़ार की घड़ी…
अब सबकी नज़रें मोदी सरकार पर हैं। क्या वो वास्तव में “दिलों की दूरी” पाटने के लिए आगे आएंगी? क्योंकि विशेषज्ञ तो यही मानते हैं कि अगर सच में शांति चाहिए तो बातचीत से बेहतर कोई रास्ता हो ही नहीं सकता। एक तरह से देखा जाए तो फारूक ने सही वक्त पर सही बात उठाई है। लेकिन अब बॉल केंद्र के कोर्ट में है। देखते हैं कौन सा शॉट मारती है सरकार!
अंत में बस इतना ही – कश्मीर का मसला कोई कंप्यूटर प्रोग्राम नहीं जिसे रीसेट कर दो और सब ठीक हो जाए। यहां तो दिल जीतने की ज़रूरत है। और वो तभी होगा जब दिल्ली कश्मीर की आवाज़ सुनने को तैयार होगी। बाकी… वक्त ही बताएगा ना?
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नई दिल्ली-जम्मू कश्मीर के बीच ‘दिलों की दूरी’ खत्म करने की मांग – जानिए सारे सवालों के जवाब
1. नई दिल्ली और जम्मू कश्मीर के बीच ये ‘दिलों की दूरी’ वाली बात क्या है?
देखिए, सवाल सिर्फ नक्शे पर लकीरें खींचने का नहीं है। असल में, दोनों जगहों के बीच एक अजीब सा भावनात्मक फासला बन गया है – जैसे कोई पुराना दोस्त जिससे बातचीत कम हो गई हो। तो अब कोशिश ये है कि इसी gap को पाटा जाए। कैसे? बेहतर connectivity तो है ही, साथ ही लोगों को एक-दूसरे की संस्कृति समझने का मौका मिले।
2. सरकार से ठीक-ठीक क्या मांग की जा रही है?
ईमानदारी से कहूं तो सिर्फ चार-पांच powerpoint presentations से काम नहीं चलेगा! मांग ये है कि सरकार:
– सच्चे मायनों में infrastructure projects पर काम करे (सिर्फ tender निकालने भर से नहीं चलेगा)
– Cultural exchanges को promote करे – जैसे कश्मीरी हस्तशिल्प की दिल्ली में exhibition हो या फिर दिल्ली के artists वहां जाएं
– Policy level पर ऐसे reforms लाए जो असल में जमीन पर दिखें
3. आम लोगों को इसका क्या फायदा होगा?
अरे भई, सीधी सी बात है न! जब connectivity बेहतर होगी तो:
• युवाओं को jobs के more opportunities मिलेंगे
• परिवहन सुधरेगा – अभी तो कभी-कभी सफर नर्क बन जाता है
• सबसे बड़ी बात – पूरे देश के साथ जुड़ाव महसूस होगा। और हां, tourism sector को तो बूस्ट मिलेगा ही। एक तरफ तो फायदे गिनाऊं, दूसरी तरफ…असल में नुकसान जैसा कुछ है ही नहीं!
4. कोई ठोस सुझाव भी हैं या सिर्फ बातें ही बातें?
नहीं यार, सिर्फ हवाई बातें नहीं हैं! कुछ concrete proposals तो देखिए:
– Road और rail connectivity पर तुरंत काम शुरू हो (अभी तो कुछ routes पर हालात बड़े खराब हैं)
– दिल्ली-जम्मू के बीच more flights – खासकर सस्ती वाली
– Local artisans और small businesses के लिए special schemes
और हां, सबसे जरूरी – इन सब पर सच में action होना चाहिए। वरना तो…आप समझ ही गए होंगे!
Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com