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“वडा-पाव खरीदने गई थी फरहीन, मालेगांव ब्लास्ट में हुई शहीद… पीड़ितों का दर्द छलका”

वडा-पाव खरीदने गई थी फरहीन, और फिर… मालेगांव ब्लास्ट में खो दी जिंदगी

आज का दिन मालेगांव ब्लास्ट (2008) के पीड़ित परिवारों के लिए एक नए दर्द का दिन बन गया। स्पेशल NIA कोर्ट ने प्रज्ञा सिंह ठाकुर समेत छह आरोपियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया। और ये फैसला सुनते ही… वाह, क्या बताऊं… जैसे पुराने जख्म फिर से हरे हो गए। फरहीन शेख की कहानी तो दिल दहला देने वाली है – बस वडा-पाव लेने गई थी लड़की, और लौटकर कभी नहीं आई। उसके पिता लियाकत शेख का गुस्सा तो समझ आता है, जब वो कहते हैं, “ये न्याय नहीं, न्याय का मजाक है!” सच कहूं तो, उनकी आवाज सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

कहानी शुरू होती है 29 सितंबर 2008 से, जब मालेगांव में एक के बाद एक धमाके हुए। रमजान का पाक महीना था, और ज्यादातर लोग तो बस इफ्तारी का सामान लेने निकले थे। 6 लोगों की जान चली गई, 100 से ज्यादा घायल। अब यहां सबसे बड़ा सवाल ये उठता है कि… क्या सच में सबूतों की कमी थी? या फिर जांच में कोई खामी रह गई? ATS से लेकर NIA तक, सबने केस की जांच की, मगर आखिरकार सब कुछ धरे का धरा रह गया।

कोर्ट के इस फैसले ने तो जैसे मरहम पड़े घाव पर नमक छिड़क दिया है। एक तरफ तो कोर्ट का कहना है कि सबूत कमजोर थे, लेकिन दूसरी तरफ… अरे भई, इतने बड़े केस में सबूत कैसे कमजोर हो सकते हैं? फरहीन के पिता का दर्द देखिए: “मेरी बेटी बेकसूर मारी गई, और हत्यारे छूट गए?” राजनीति की बात करें तो, दिल्ली से मुंबई तक हर कोई अपनी-अपनी रोटी सेक रहा है। राहुल गांधी जी कह रहे हैं “हिंदू आतंकवाद को सफेदपोश बनाया जा रहा है”, वहीं BJP वाले खुशी से झूम रहे हैं। सच्चाई? शायद हम कभी न जान पाएं।

अब सवाल ये है कि आगे क्या? पीड़ित परिवार सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने वाले हैं। पर क्या इससे कुछ बदलेगा? ये मामला तो अब हिंदू-मुस्लिम के बीच एक और दीवार खड़ी कर देगा। और न्याय प्रणाली पर तो सवाल उठना लाजमी है – जब इतने बड़े केस में न्याय नहीं मिल पा रहा, तो आम आदमी की क्या गारंटी?

देखिए, ये कोर्ट का फैसला सिर्फ कागजों पर नहीं, दिलों पर भी चोट कर गया है। फरहीन जैसी मासूम जानें जो चली गईं, उनके परिवारों को शायद ही कभी सुकून मिल पाए। कानून की बातें तो ठीक हैं, लेकिन कभी-कभी लगता है कि न्याय सिर्फ किताबों में ही बचा है। और हम? हम तो बस खबर पढ़कर, सिर हिलाकर आगे बढ़ जाते हैं। सच कहूं तो, यही सबसे बड़ी त्रासदी है।

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फरहीन की कहानी सुनकर दिल दहल जाता है। सोचिए, बस एक वडा-पाव खाने की मासूम ख्वाहिश… और वो भी पूरी नहीं हो पाई। मालेगांव ब्लास्ट ने जिस तरह उसकी जिंदगी छीन ली, वो सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं, पूरी मानवता पर एक गहरा घाव है।

क्या हम सच में सीख पा रहे हैं?

ये वाकया हमें बार-बार याद दिलाता है कि आतंकवाद किसी भी रूप में, कभी भी, कहीं भी – मासूमों को अपना शिकार बना लेता है। असल में देखा जाए तो ये सिर्फ फरहीन ही नहीं, हम सभी की कहानी है। कल कोई और, कहीं और…

ईमानदारी से कहूं तो, ऐसी घटनाएं सुनकर गुस्सा तो आता ही है, लेकिन साथ ही एक सवाल भी उठता है – क्या हम सिर्फ शोक मनाने तक सीमित रह जाते हैं? फरहीन और अन्य पीड़ितों को सच्ची श्रद्धांजलि तो तभी होगी जब हम… [यहां वाक्य जानबूझकर अधूरा छोड़ा गया है, जैसे कि लेखक विचार में पड़ गया हो]

वडा-पाव खरीदने गई फरहीन और मालेगांव ब्लास्ट – आपके मन में उठ रहे सवालों के जवाब

1. फरहीन कौन थी? और उस दिन क्या हुआ जिसने सबको हिला दिया?

सुनिए, फरहीन कोई साधारण लड़की नहीं थी। एक 20 साल की मासूम जो बस सुबह का नाश्ता करने वडा-पाव लेने निकली थी। पर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। उसी पल वो धमाका… और एक जान चली गई। ईमानदारी से कहूं तो आज भी उस घटना को याद करके दिल दहल जाता है।

2. मालेगांव ब्लास्ट – कब हुआ और असल में क्यों हुआ?

तारीख थी [तारीख डालें]। एक सुबह जो कई परिवारों के लिए काला दिन बन गया। देखा जाए तो ये कोई साधारण अपराध नहीं था, बल्कि एक सुनियोजित आतंकी हमला। मकसद? बस डर फैलाना। लेकिन सच कहूं तो ये हमलावर भूल गए कि भारतीयों का हौसला कभी टूटता नहीं।

3. पीड़ित परिवारों को मिली मदद – क्या ये काफी था?

सरकार ने मुआवजा दिया, कुछ NGOs ने भी हाथ बढ़ाया। पर सच पूछो तो… क्या कोई रकम किसी बेटी की जान वापस ला सकती है? एक मां का दर्द कम कर सकती है? हालांकि, इतना जरूर है कि मदद मिलने से कुछ रोजी-रोटी का सहारा तो मिला।

4. क्या हम सच में सुरक्षित हैं? भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने के उपाय

अब सरकार की तरफ से तो बहुत कुछ हो रहा है – CCTV कैमरे बढ़े हैं, पुलिस की गश्त तेज हुई है। पर असल सवाल ये है कि क्या हम खुद भी सतर्क हैं? आपको कोई संदिग्ध सामान दिखे तो क्या आप पुलिस को खबर करेंगे? यही तो है असली सुरक्षा का राज। वैसे अच्छी बात ये है कि अब intelligence agencies पहले से ज्यादा सक्रिय हैं।

Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com

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