हिमाचल में मंडी को मिले 7 करोड़ की राहत: क्या यह काफी है?
अभी-अभी हिमाचल के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने एक बड़ा ऐलान किया है। मंडी जिले में भारी बारिश और भूस्खलन से जो तबाही हुई, उसकी मरम्मत के लिए 7 करोड़ रुपये की राहत राशि जारी की गई है। सच कहूँ तो, ये पैसा उन लोगों के लिए किसी सहारे से कम नहीं जिनके घर, सड़कें और जिंदगी पूरी तरह बिखर चुकी है।
असल में मंडी जिला हिमाचल का वो इलाका है जहाँ बारिश का मतलब सिर्फ ठंडक नहीं, बल्कि मुसीबत भी होता है। पिछले कुछ हफ्तों में तो हालात इतने खराब हो गए कि सैकड़ों घरों की हालत देखकर दिल दहल जाता है। सरकार का कहना है कि ये फंड सिर्फ मंडी की जरूरतों को ध्यान में रखकर दिया गया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या 7 करोड़ वाकई पर्याप्त हैं?
मुख्यमंत्री जी ने यह घोषणा तब की जब वो खुद मंडी के प्रभावित इलाकों में गए थे। उन्होंने कहा कि ये 7 करोड़ रुपये सड़कों की मरम्मत, घर बनाने और जरूरी सामान बाँटने में खर्च होंगे। साथ ही प्रशासन को चेतावनी भी दी – “कोई लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी!” पर क्या ये सिर्फ दिखावा है? क्योंकि हर बार आपदा आने पर ही हमें याद आता है कि infrastructure और early warning system की कितनी कमी है।
लोगों की प्रतिक्रिया? एक तरफ तो राहत मिलने की खुशी है, पर दूसरी तरफ ये डर भी कि कहीं ये पैसा भी दूसरी योजनाओं की तरह ग़ायब न हो जाए। विपक्ष तो सीधे कह रहा है – “ये सिर्फ वोट बैंक की राजनीति है!” वहीं सामाजिक कार्यकर्ताओं का सवाल है – “कब तक हम आपदा आने का इंतज़ार करते रहेंगे? दीर्घकालिक योजना कहाँ है?”
सरकार ने आपदा विभाग को और जिलों का आकलन करने को कहा है। अच्छी बात है। पर असली परीक्षा तो अब शुरू होती है – क्या ये पैसा सही हाथों तक पहुँच पाएगा? क्या अगली बारिश से पहले हम कोई सबक सीख पाएंगे? सच तो ये है कि मुख्यमंत्री का ये कदम तारीफ़ के काबिल है, लेकिन अब नतीजे देखने बाकी हैं। वैसे भी, हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य के लिए disaster management कोई विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत है। सच ना?
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मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का यह फैसला – मंडी के प्रभावित इलाकों के लिए 7 करोड़ रुपये की राहत राशि – वाकई सराहनीय है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह रकम वास्तव में उन लोगों तक पहुंचेगी जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है? हम सभी जानते हैं कि अक्सर ऐसी घोषणाएं सिर्फ खबरों तक ही सीमित रह जाती हैं।
असल में, यह कदम सरकार की संवेदनशीलता तो दिखाता है, पर साथ ही साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा करता है। क्योंकि जमीनी हकीकत यह है कि आपदा पीड़ितों को सिर्फ राहत राशि नहीं, बल्कि स्थायी समाधान चाहिए। मान लीजिए, अगर आपका घर बाढ़ में बह गया हो, तो क्या सिर्फ कुछ हजार रुपये से आपकी मुश्किलें हल हो जाएंगी? शायद नहीं।
हालांकि, इसे सकारात्मक नजरिए से भी देखा जाना चाहिए। कम से कम सरकार ने तो पहल की है न? अब देखना यह है कि यह पैसा सही हाथों में पहुंचे और इसका इस्तेमाल सही तरीके से हो। वैसे, अगर ईमानदारी से कहूं तो 7 करोड़ रुपये की राशि उतनी बड़ी भी नहीं है जितनी लगती है – जब आप इसे हजारों प्रभावित परिवारों में बांटेंगे तो शायद प्रति परिवार कुछ हजार रुपये ही मिल पाएंगे।
एक तरफ तो यह कदम सरकार की जनकल्याण की प्रतिबद्धता दिखाता है, लेकिन दूसरी तरफ यह सवाल भी पैदा करता है कि क्या यह पर्याप्त है? सच कहूं तो, पटरी पर लौटने के लिए पीड़ितों को इससे कहीं ज्यादा की जरूरत होगी। पर शुरुआत तो हुई है – और यह अच्छी बात है।
Source: Hindustan Times – India News | Secondary News Source: Pulsivic.com