एमटीए की हालत खस्ता क्यों? गवर्नर होचुल का झटका देने वाला बयान – पैसा कम पड़ा या फिर किराया बढ़ेगा?
अरे भई, न्यूयॉर्क के गवर्नर कैथी होचुल ने शुक्रवार को जो बयान दिया, उसने तो जैसे पुराने ज़ख्मों को फिर से हरा कर दिया। सच कहूँ तो, इस हफ्ते जो हालात रहे – भीषण गर्मी, फिर अचानक मूसलाधार बारिश – उसने तो एमटीए की खस्ता हालत को बिल्कुल नंगा कर दिया। और गवर्नर साहिबा ने सीधे-सीधे कह दिया कि दोष है… हाँ, बिल्कुल वही जो आप सोच रहे हैं – दशकों से subway infrastructure में “पैसा ठूंसने” की कमी! अब सवाल यह है कि जब यात्रियों को स्टेशनों पर पानी में भीगते हुए ट्रेन का इंतज़ार करना पड़े, तो किसे कोसें?
पूरा माजरा क्या है?
देखिए, एमटीए तो न्यूयॉर्क की जान है – public transportation का दिल धड़कता है यहीं से। पर पिछले कुछ सालों से ये दिल बीमार सा हो गया है। ट्रेनें लेट, भीड़ इतनी कि सांस लेना मुश्किल, और अब तो ये मौसम वाला धोखा! इस बारिश ने तो जैसे सबकी पोल खोल कर रख दी। कुछ स्टेशनों पर तो ऐसा लग रहा था जैसे नहीं, यमुना पार करके ऑफिस जाना है! है ना मजेदार बात?
गवर्नर ने क्या कहा असल में?
गवर्नर होचुल ने तो सीधे तीर मारा है – “ये समस्या कल की नहीं, दशकों की उपेक्षा का नतीजा है।” सच कहूँ तो, ये बात हम सब जानते थे, पर सुनने वाला कोई नहीं था। अब सवाल यह उठता है कि इस गड़बड़ को ठीक करने के लिए पैसा कहाँ से आएगा? क्या commuters की जेब पर और ज़ोर डाला जाएगा, या फिर government अपनी तिजोरी खोलेगी? ईमानदारी से कहूँ तो, दोनों ही विकल्प मुश्किल लगते हैं।
एमटीए वालों ने भी मान लिया है कि इस बारिश ने उनकी कमज़ोरियों को बेनक़ाब कर दिया। एक अधिकारी ने कहा भी – “हमारी व्यवस्था अभी इस कदर की मार झेलने लायक ही नहीं है।” सच बात तो यह है कि जब system ही पुराना पड़ चुका हो, तो उम्मीद कैसे करें कि वो नए ज़माने की चुनौतियों का सामना करेगा?
लोग क्या कह रहे हैं?
इस मामले पर तो हर कोई अपनी-अपनी राग अलाप रहा है। Commuters association वाले तो बिल्कुल गुस्से में हैं – “हम पहले से ही ऊँचे किराए दे रहे हैं, अब और नहीं!” वहीं राजनीतिक दलों ने तो मौके का फायदा उठाते हुए सरकार पर हमला बोल दिया। एक विपक्षी नेता ने तो सीधे कह दिया – “ये सरकार की नाकामी है, और कुछ नहीं!”
Experts की बात सुनें तो वो कह रहे हैं कि सिर्फ पैसा डालने से काम नहीं चलेगा। एक जानकार ने बिल्कुल सही कहा – “System को modernize करना होगा, न कि सिर्फ पैचवर्क करते रहना।” पर सवाल यह है कि ये सब होगा कैसे?
आगे क्या होगा?
अब तो सबकी निगाहें गवर्नर पर टिकी हैं। होचुल ने additional funding की बात तो की है, पर सवाल यह है कि ये पैसा आएगा कहाँ से? कुछ लोग कह रहे हैं taxes बढ़ेंगे, तो कुछ का मानना है कि commuters की जेब हल्की होगी। सच तो यह है कि low और middle class वालों के लिए तो ये किसी बुरे सपने से कम नहीं होगा।
एमटीए वाले कह रहे हैं कि वो infrastructure को upgrade करने की योजना बना रहे हैं। पर यार, ये काम रातोंरात थोड़े होने वाला है! एक senior official ने सही कहा – “अब तो climate change के हिसाब से system को ढालना ही होगा।” क्योंकि extreme weather तो अब न्यू नॉर्मल बन चुका है।
अगले कुछ हफ्ते बताएँगे कि आखिरकार इस गंभीर समस्या का हल क्या निकलता है। पर एक बात तो तय है – न्यूयॉर्क के public transportation को बचाने के लिए बड़े पैमाने पर काम करना होगा। वरना तो ये हालात और भी बदतर होते जाएँगे। सच में।
अब बात करते हैं MTA की सेवाओं की… सच कहूं तो हालात बेहद खराब हैं। और समस्या की जड़ कहाँ है? एक तरफ तो निवेश की कमी है, दूसरी तरफ किराया बढ़ाने की मजबूरी। गवर्नर होचुल ने सही कहा – मुद्दा गंभीर है। लेकिन सवाल यह है कि क्या किराया बढ़ाना ही एकमात्र हल है? शायद नहीं।
देखिए, यहाँ बैलेंस बनाने की जरूरत है – जनता की जेब और बेहतर सुविधाओं के बीच। MTA और सरकार को मिलकर काम करना होगा। वैसे… अभी तो बस इतना ही कह सकते हैं – आगे क्या होगा, यह तो वक्त ही बताएगा। है न?
(Note: I’ve added conversational elements, rhetorical questions, broken the flow naturally, and made it sound more like a real person thinking aloud rather than a perfectly structured AI response. The English terms (MTA) are preserved as per instructions, and the tone is casual yet informative.)
MTA की हालत पर चर्चा: क्या सच में कुछ बदलने वाला है?
आखिर क्यों इतनी बदतर है MTA की सेवा?
सच कहूं तो, यह कोई नई समस्या नहीं। असल में, दशकों से चली आ रही लापरवाही का नतीजा है यह। Infrastructure तो जैसे जर्जर हो चुका है – वो भी ऐसे जैसे हमारे दादाजी का पुराना ट्रांजिस्टर! गवर्नर होचुल ने भी माना है कि funds की कमी ने सिस्टम को पंगु बना दिया है। पर सवाल यह है कि इतने सालों में क्या वाकई कुछ नहीं किया जा सकता था?
क्या fare बढ़ाने से सुधर जाएगी हालत?
देखिए, fare बढ़ाना तो वैसा ही है जैसे छत टपक रही हो और आप बाल्टी लगा दें। कुछ राहत मिल सकती है, पर permanent solution? बिल्कुल नहीं। असली मुद्दा है long-term planning की कमी और management का खोखलापन। और हां, सरकारी-प्राइवेट partnership के बिना तो बात बनने वाली नहीं।
गवर्नर होचुल ने क्या कहा? सिर्फ बयानबाजी या कुछ ठोस?
होचुल साहब ने तो सही बात कही – decades से system को अनदेखा किया गया। पर यहां बात सिर्फ पैसे की नहीं, नीयत की भी है। Investment तो चाहिए ही, पर साथ में चाहिए ईमानदार कोशिश। वरना यही हाल रहेगा।
तो फिर समाधान क्या है? क्या कोई उम्मीद बची है?
एक तरफ तो modern technology की जरूरत है, दूसरी तरफ efficient management। पर मेरी नजर में सबसे बड़ी जरूरत है accountability की। Public-private partnerships? हां, अच्छा idea है। Government support? बिल्कुल जरूरी। पर सबसे ज्यादा जरूरत है – political will की। वरना यही हालत रहेगी। सच कहूं तो।
Source: NY Post – US News | Secondary News Source: Pulsivic.com