** “कचहरी: डॉक्टर-हॉस्पिटल का ‘लूट-तंत्र’! बीमारी को बनाया मुनाफे का धंधा, जानिए बचने के उपाय”

कचहरी: डॉक्टर-हॉस्पिटल का ‘लूट-तंत्र’! बीमारी को बनाया मुनाफे का धंधा, जानिए बचने के उपाय

भई, आजकल तो हालात ऐसे हो गए हैं कि बीमार पड़ना भी एक luxury बन गया है! अस्पताल और डॉक्टरों की दुकानें चल रही हैं, जहाँ मरीज को customer समझा जाता है। MRI, CT Scan का झंझट, branded दवाओं का प्रेशर… ये सब देखकर तो लगता है कि अब सेहत से ज्यादा profit पर फोकस है। और सबसे दिक्कत की बात? फार्मा कंपनियों और डॉक्टरों की वो गुप्त साठ-गांठ जो हमें सस्ती generic दवाओं से दूर रखती है। आज हम इसी medical scam की पोल खोलेंगे – और साथ ही बताएँगे कि आप इस चक्रव्यूह से कैसे निकल सकते हैं।

कैसे पहचानें इस “मेडिकल स्कैम” को?

अरे भाई, ये लोग तो इतने चालाक हो गए हैं कि पता ही नहीं चलता कब हमें फँसा लिया। पर ध्यान दें तो red flags दिखने लगते हैं:

पहली बात – unnecessary tests का तांता। साधारण सर्दी में भी MRI? सच में? ये तो ऐसा हुआ कि पंक्चर ठीक करने के लिए कार का इंजन ही बदल दिया जाए! दूसरा बड़ा संकेत – branded medicines का जबरदस्ती थोपा जाना। जब डॉक्टर साहब generic alternatives का नाम लेने से ही कतराने लगें, तो समझ जाइए कि कमीशन का खेल चल रहा है। और हाँ, वो मशहूर referral तरीका – जहाँ आपको खास diagnostic centers ही भेजा जाता है। क्या संयोग है ना?

कैसे बचें इस “मेडिकल माफिया” से?

तो अब सवाल यह उठता है कि इस फंदे से कैसे बचा जाए? थोड़ी सी सावधानी और समझदारी से:

सबसे पहले तो second opinion लेना सीखिए। एक ही डॉक्टर को भगवान मान बैठना खतरनाक हो सकता है। दूसरा – generic medicines के बारे में जानिए। सीधा सवाल पूछिए – “डॉक्टर साहब, क्या इसी दवा का कोई सस्ता वर्जन मिल सकता है?” तीसरा – थोड़ा online research करने में क्या हर्ज है? Govt. health portals पर authentic information मिल ही जाती है। और हाँ, medical bills को ignore मत कीजिए। हर charge को क्रॉस-चेक कीजिए। Overcharging हो तो consumer forum तक लड़ाई लड़िए।

स्वस्थ रहने के लिए आहार सुझाव

देखिए, prevention is better than cure वाली कहावत तो सच में सोने जैसी है। थोड़ी सी डाइट में सुधार करके आप अस्पतालों के चक्कर से बच सकते हैं:

खाएं: ताज़ी सब्जियाँ और फल (जैसे कि पालक, संतरा – vitamin bombs होते हैं), दाल-चावल (हमारी दादी-नानी का सुपरफूड), और हल्दी वाला दूध (natural healer तो है ही)। न खाएं: packaged junk (जिसमें preservatives की भरमार हो), बहुत ज्यादा तेल-मसाले वाला (heart का दुश्मन), और cold drinks तो बिल्कुल नहीं (ये तो धीमा जहर है)।

डॉक्टर को कब दिखाएं?

ईमानदारी से कहूँ तो, कभी-कभी डॉक्टर के पास जाना ही पड़ता है। पर कब? ये समझना जरूरी है:

जब symptoms बार-बार आएँ (जैसे लगातार बुखार या दर्द), unnecessary surgery की सलाह मिले (यहाँ तो second opinion लेना ही चाहिए), medicines से side effects होने लगें (चक्कर आना या skin पर rash), और medical bills में गड़बड़ी नजर आए (कहीं overcharging तो नहीं?)। याद रखिए, एक जागरूक मरीज ही इस system को बदल सकता है। थोड़ी सी सतर्कता और हम सब मिलकर इस profit-driven माहौल को चुनौती दे सकते हैं।

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Source: NDTV Khabar – Latest | Secondary News Source: Pulsivic.com

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