14,000 किलोमीटर दूर एक सड़क बनी, और भारत खुश क्यों? जयशंकर ने क्या संकेत दिए?
अजीब लगता है न? एक छोटा सा देश गुयाना, जो दक्षिण अमेरिका में है, वहाँ बनी सड़क से भारत को क्या लेना-देना? लेकिन असल में यह कोई आम सड़क नहीं है। देखा जाए तो यह भारत की विदेश नीति की एक साफ़-सुथरी चाल है। जब विदेश मंत्री जयशंकर ने इस ईस्ट कोस्ट-ईस्ट बैंक रोड लिंकेज के उद्घाटन पर वीडियो संदेश भेजा, तो उनके शब्दों में कुछ खास था। उन्होंने इसे “दोस्ती का प्रतीक” बताया, पर क्या सच में यह सिर्फ दोस्ती की बात है? शायद नहीं।
गुयाना: छोटा देश, बड़ा मामला
सुनने में थोड़ा अजीब लगेगा, पर गुयाना भारत के लिए काफी अहम है। वजह? वहाँ रहने वाले भारतीय मूल के लोग। 19वीं सदी में जब अंग्रेज़ों ने यहाँ मजदूरों को लाया था, तब से यह रिश्ता चला आ रहा है। अब सवाल यह है कि सिर्फ भावनात्मक जुड़ाव से क्या होता? तो जवाब है – infrastructure! भारत ने इस सड़क के लिए पैसे दिए हैं, जो गुयाना के विकास में मदद करेगी। सीधे शब्दों में कहें तो – हमने दोस्ती निभाई, और साथ ही अपनी जगह भी बनाई।
“खून के बंधन” वाली बात क्या है?
जयशंकर ने जानबूझकर यह शब्द इस्तेमाल किया। समझने वाली बात यह है कि भारत उन देशों को खास महत्व दे रहा है जहाँ भारतीय मूल के लोग हैं। यह सड़क सिर्फ कंक्रीट और सीमेंट नहीं है – यह एक संदेश है। गुयाना के पूर्वी तट को जोड़ने वाली यह सड़क आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देगी। और हाँ, भारत ने इसे Line of Credit (LoC) के तहत फंड किया है – जो दिखाता है कि हम सिर्फ बातें नहीं, काम भी करते हैं।
चीन का खेल और भारत की चाल
अब थोड़ा मज़ेदार हिस्सा। गुयाना सरकार ने भारत को धन्यवाद दिया है, पर क्या आप जानते हैं कि चीन भी इसी इलाके में सक्रिय है? कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत यहाँ चीन के प्रभाव को कम करने की कोशिश कर रहा है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की बात तो ठीक है, पर राजनीति भी तो अपनी जगह है न? सच कहूँ तो यह एक smart move है – दोस्ती भी, फायदा भी।
आगे क्या होगा?
यह सड़क सिर्फ शुरुआत है। भविष्य में भारत और कैरिबियन देशों के साथ और projects आ सकते हैं। Trade, infrastructure, diplomacy – सब कुछ एक साथ। चीन के साथ healthy competition को देखते हुए, भारत अपनी soft power बढ़ा रहा है। जयशंकर का “खून के बंधन” वाला संदेश साफ़ संकेत देता है – हम अपने लोगों को नहीं भूलते, चाहे वे कितनी भी दूर क्यों न हों। और हाँ, इसके साथ ही अपना प्रभाव भी बढ़ाते हैं। एक तीर से दो निशाने, है न?
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1. ये चाबहार पोर्ट वाली सड़क आखिर है कहाँ, और भारत को इससे क्या फायदा?
देखिए, ईरान के दक्षिण में बसा चाबहार पोर्ट… जिसे लेकर भारत की दिलचस्पी कोई नई बात नहीं। असल में, ये हमारे लिए उतना ही जरूरी है जितना किसी बिजनेस टाइकून के लिए उसका नया ऑफिस! क्यों? क्योंकि ये हमें Afghanistan और Central Asia तक पहुँचने का एक वैकल्पिक रास्ता देता है – बिना Pakistan के उलझे हुए रिश्तों में फंसे। सीधा-साधा फायदा।
2. जयशंकर ने इस इवेंट में क्या ‘बिना बोले’ कह दिया?
अब यहाँ थोड़ा पॉलिटिकल चाय पीते हैं! जयशंकर जी ने तो बस फॉर्मल बातें कीं, लेकिन उनकी मौजूदगी ही एक मैसेज थी। समझिए न – भारत अब वो देश नहीं जो सिर्फ react करे। हम proactively अपने strategic partners के साथ मिलकर चीन के BRI को टक्कर दे रहे हैं। गेम चेंजर, है न?
3. इस प्रोजेक्ट से हमारी जेब पर क्या असर पड़ेगा?
अरे भाई, सीधी बात – पैसा! चाबहार के जरिए हमारे exporters को Central Asia और Europe तक सामान पहुँचाने में आधा खर्चा और आधा समय लगेगा। सोचिए… जब trade routes छोटे होंगे, तो profits बड़े होंगे। और जब exports बढ़ेंगे, तो economy का ग्राफ भी तो ऊपर जाएगा न? एक तीर से दो निशाने वाली बात।
4. क्या ये सब चीन को जवाब देने का तरीका है?
ईमानदारी से कहूँ? हाँ… पर पूरी तरह नहीं। देखिए, चीन ने Gwadar Port में पैसा लगाया, जो कि चाबहार से बस 80km दूर है। अब हमने अपना move चला है। ये कोई direct war तो नहीं, लेकिन geopolitical chess का एक smart move जरूर है। एक तरफ तो connectivity बढ़ रही है, दूसरी तरफ हम चीन के monopoly को चुनौती दे रहे हैं। दिलचस्प है न?
फिलहाल तो… wait and watch वाली स्थिति। लेकिन एक बात clear है – भारत अब खेल के नियम बदल रहा है। सच कहूँ तो, मजा आ रहा है!
Source: Navbharat Times – Default | Secondary News Source: Pulsivic.com