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** “हॉस्पिटल से श्मशान तक भीड़ का देश: कैसे बनेगा भारत विश्व की ग्रोथ इंजन?”

हॉस्पिटल से श्मशान तक भीड़ का देश: क्या सच में बन पाएगा भारत विश्व की ग्रोथ इंजन?

अरे भाई, भारत की बढ़ती आबादी पर बहस तो हर चाय की दुकान पर होती है। पर ये UN के ताज़ा आंकड़े देखकर लगता है – अब बात गंभीर हो गई है। साल 2027 तक हम चीन को पीछे छोड़ देंगे जनसंख्या में। गर्व की बात? शायद नहीं। असल में तो ये एक बड़ी चुनौती है जिससे हम रोज़ टकरा रहे हैं। अस्पतालों में बेड नहीं, स्कूलों में सीटें कम, और श्मशान घाटों पर लाइनें लंबी – ये सब इसी का नतीजा है ना?

पुरानी समस्या, नई मुसीबतें

याद है वो “हम दो, हमारे दो” का ज़माना? 70s में हमने जनसंख्या रोकने की कोशिश की थी। लेकिन देखा जाए तो वो सब बस दिखावा रह गया। आज भी हमारी जनसंख्या 1% से ज़्यादा रफ़्तार से बढ़ रही है – अमेरिका-यूरोप से दोगुनी! और भैया, गाँव से शहरों की ओर पलायन ने तो समस्या को और बढ़ा दिया है। मुंबई की slums, दिल्ली का traffic, बेंगलुरु का pollution – ये सब किसी से छुपा तो नहीं है।

युवाओं की ताकत या समस्या?

एक तरफ़ तो ये खुशी की बात है कि 2023 तक हम दुनिया के सबसे युवा देश बन जाएंगे – 65% आबादी 35 से कम उम्र की! पर सच कहूँ? मेरे मन में डर भी है। सरकार Skill India और नई education policy लेकर आई है, पर क्या ये काफ़ी है? सोचिए, हर साल 1 करोड़ युवा नौकरी की तलाश में बाज़ार में आते हैं। क्या हम उन्हें quality education और अच्छी jobs दे पाएंगे? नहीं तो ये ताकत बवंडर बन जाएगी।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?

सरकार तो demographic dividend की बात करती है। लेकिन economists की चेतावनी सुनिए – अगर अभी सही policy measures नहीं लिए गए, तो ये जनसंख्या बम फटने वाला है! कुछ लोग कहते हैं better health facilities और education से समस्या सुलझेगी। वहीं UP जैसे राज्य population control laws की मांग कर रहे हैं। पर सच तो ये है कि राष्ट्रीय स्तर पर कोई consensus ही नहीं बन पा रहा।

आगे का रास्ता?

मेरा मानना है कि अभी भी वक्त है। हमारी young population अगर properly trained हो और उन्हें सही opportunities मिलें, तो यही भीड़ हमारी ताकत बन सकती है। पर इसके लिए:

  • Family planning programs को सच में implement करना होगा
  • गाँव और शहर के बीच का gap कम करना होगा
  • Resources का सही बंटवारा करना होगा

और हाँ, awareness campaigns तो चलानी ही होंगी।

अंत में बस इतना – जनसंख्या ना तो अभिशाप है, ना वरदान। ये तो हम पर निर्भर करता है कि हम इसे कैसे handle करते हैं। मौका है हमारे हाथ में – बस सही कदम उठाने की देर है। सरकार और जनता मिलकर काम करें, तो ये चुनौती हमारी सबसे बड़ी ताकत बन सकती है। क्या आपको नहीं लगता?

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Source: NDTV Khabar – Latest | Secondary News Source: Pulsivic.com

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