भारत सीरिया की एचटीएस सरकार से हाथ क्यों मिला रहा है? असली वजह जानकर हैरान रह जाएंगे!
अरे भाई, क्या आपने सुना? पिछले हफ्ते भारत सरकार का एक बड़ा अफसर सीरिया गया था – और हैरानी की बात ये कि उसने वहाँ की एचटीएस सरकार के नेताओं से मुलाकात की! सच कहूँ तो ये कोई छोटी-मोटी बात नहीं है। ये तो वाकई में बड़ी खबर है, क्योंकि एचटीएस के सत्ता में आने के बाद ये भारत की तरफ से पहली बड़ी पहल है। अब सवाल ये उठता है कि आखिर भारत को अचानक एचटीएस से बात करने की क्या ज़रूरत पड़ गई? और इसके पीछे की असली गेम प्लान क्या है?
पहले समझिए पूरा मामला: एचटीएस कौन और भारत का क्या रिश्ता?
देखिए, एचटीएस वाला मामला थोड़ा पेचीदा है। ये गुट सीरिया में ताकतवर तो हो गया है, लेकिन दुनिया की नज़रों में इनकी छवि बहुत अच्छी नहीं है। कई देश इन्हें आतंकी संगठन मानते हैं। अब भारत की बात करें तो हमेशा से सीरिया के साथ हमारे रिश्ते अच्छे रहे हैं – लेकिन एचटीएस के आने के बाद थोड़ा ठंडा पड़ गया था। पर अब लगता है कि दिल्ली वालों ने नई सोच बना ली है। शायद ये क्षेत्र में शांति के लिए है, या फिर अपने फायदे के लिए… कौन जाने!
क्या हुआ इस मीटिंग में? जानिए पूरी डिटेल
तो सुनिए, हमारे अफसर ने एचटीएस वालों के साथ क्या-क्या बातें कीं। सुरक्षा, आतंकवाद जैसे गंभीर मुद्दों पर चर्चा हुई। और एक अच्छी बात – भारत ने सीरिया को मदद बढ़ाने का वादा किया है। पर असल में जो बड़ी बात है वो ये कि ये पहली बार है जब भारत सीधे एचटीएस से बात कर रहा है। थोड़ा रिस्की मूव है, है ना?
लोग क्या कह रहे हैं? विशेषज्ञों से लेकर आम जनता तक
सरकार तो अपनी ही रट लगाए हुई है – “क्षेत्रीय स्थिरता, आपसी हित” वगैरह-वगैरह। लेकिन असली मज़ा तो विशेषज्ञों की राय में है। कुछ कह रहे हैं कि भारत मिडिल ईस्ट में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है, तो कुछ का मानना है कि ये एचटीएस को मान्यता देने की पहली सीढ़ी हो सकती है। और अमेरिका-यूरोप वाले? वो चुप्पी साधे बैठे हैं, पर शर्तिया उनकी नज़र इस पर ज़रूर है!
अब आगे क्या? क्या होगा अगला मूव?
अगर ये प्लान सफल रहा तो… वाह! भारत और सीरिया के बीच नए डील्स, सुरक्षा समझौते – सब कुछ हो सकता है। लेकिन याद रखिए, पश्चिमी देशों की प्रतिक्रिया इस पूरे खेल को पलट सकती है। और सबसे दिलचस्प बात? ये कदम भारत को मिडिल ईस्ट में एक बड़ा प्लेयर बना सकता है। गेम चेंजर हो सकता है ये!
तो क्या सोचते हैं आप?
सच कहूँ तो ये एक साहसिक कदम है। एक तरफ तो ये भारत की सूझ-बूझ दिखाता है, पर दूसरी तरफ रिस्क भी कम नहीं है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इमेज का बहुत महत्व होता है। अब देखना ये है कि ये चाल चलेगी या उल्टी पड़ जाएगी। आपको क्या लगता है? कमेंट में ज़रूर बताइएगा!
एक बात तो तय है – अगले कुछ महीनों में ये मामला गरमा सकता है। तब तक के लिए… स्टे ट्यून्ड! 😉
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क्या वाकई भारत को सीरिया के साथ दोस्ती की ज़रूरत है?
असल में बात ये है कि Middle East में हमारी मौजूदगी को लेकर एक बड़ा game चल रहा है। Syria के साथ रिश्ते बढ़ाना सिर्फ एक diplomatic move नहीं, बल्कि एक strategic जरूरत है। वैसे भी, जब पूरा देश reconstruction mode में हो, तो क्या हमें वहां अपनी छाप नहीं छोड़नी चाहिए?
HTS सरकार – क्या है ये पूरा खेल?
देखिए, HTS (Hay’at Tahrir al-Sham) को लेकर confusion है। पर हमारी सरकार का लक्ष्य साफ है – official government के साथ काम करना। मतलब साफ है न? Stability लानी है, न कि किसी और मुसीबत में पड़ना है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्या ये विवादित नहीं होगा?
सच कहूं तो कुछ देशों को खटकेगा ज़रूर। लेकिन सोचिए – जब हम humanitarian aid दे रहे हैं, development projects में हाथ बंटा रहे हैं, तो आलोचना का क्या basis रह जाता है? थोड़ा तो credit मिलना चाहिए न!
आगे की राह क्या है?
अगर trade, diplomacy और security cooperation इसी तरह बढ़ता रहा, तो future में ये रिश्ता और गहरा हो सकता है। Middle East में हमारी आवाज़ की अहमियत तो बढ़ेगी ही। पर याद रखिए – international politics में कोई permanent दोस्त नहीं होता, सिर्फ permanent interests होते हैं। है न?
Source: NDTV Khabar – Latest | Secondary News Source: Pulsivic.com