भारत अड़ गया! 9 जुलाई की डेडलाइन से पहले ट्रंप के पास क्या हैं विकल्प?
परिचय
भारत और अमेरिका के बीच चल रही यह ट्रेड डील अचानक गंभीर रुकावट में फंस गई है। 9 जुलाई की डेडलाइन सिर पर मंडरा रही है, मगर दोनों देशों के बीच कोई सुलह नजर नहीं आ रही। असल में, पूरा झगड़ा ऑटो पार्ट्स, स्टील और कृषि उत्पादों पर लगने वाले import duty को लेकर है। भारत अपने किसानों और PDS सिस्टम को बचाने पर अड़ा है, वहीं अमेरिका अपने उद्योगों के फायदे के लिए छूट मांग रहा है। देखा जाए तो यह छोटी सी लड़ाई बड़े ट्रेड वॉर में बदल सकती है।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का वर्तमान हाल
समझौते में अटकाव के मुख्य कारण
दिल्ली का मानना है कि अमेरिका की डिमांड्स सीधे हमारी ग्रामीण इकोनॉमी और खाद्य सुरक्षा पर वार करेंगी। ऑटो पार्ट्स और स्टील पर अमेरिका का टैरिफ हमारे एक्सपोर्ट को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। वहीं, कृषि उत्पादों पर duty कम करने का सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि इससे हमारे किसानों और PDS पर भारी दबाव पड़ेगा।
9 जुलाई की डेडलाइन क्यों महत्वपूर्ण है?
यह तारीख इसलिए खास है क्योंकि इसके बाद अमेरिका भारत पर नए प्रतिबंध लगा सकता है। Experts की मानें तो अगर डील नहीं हुई, तो दोनों देशों के रिश्तों में खटास आ सकती है। भारत के लिए यह बड़ी मुश्किल होगी, क्योंकि अमेरिका हमारा सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है।
भारत की स्थिति: क्यों अड़े हैं हम?
ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा का मुद्दा
भारत सरकार साफ कह रही है – कृषि उत्पादों पर शुल्क घटाने का मतलब हमारी खाद्य सुरक्षा से खिलवाड़ करना है। MGNREGA जैसी योजनाएं और किसानों को मिलने वाली सब्सिडी भी खतरे में पड़ सकती है। यही वजह है कि भारत अमेरिका के सामने झुकने को तैयार नहीं।
संतुलित डील की मांग
दिल्ली की मांग साफ है – कोई भी समझौता एकतरफा नहीं होना चाहिए। भारत नहीं चाहता कि अमेरिका सारे फायदे ले जाए। दोनों देशों के बीच निष्पक्ष व्यापार ही हमारी प्राथमिकता है। इसीलिए हम अपनी बात पर अटल हैं।
अमेरिका के पास क्या विकल्प हैं?
ट्रंप प्रशासन की संभावित रणनीतियाँ
अमेरिका के सामने मूलतः दो ही रास्ते हैं – या तो वह टैरिफ में छूट देकर समझौता करे, या फिर भारत पर नए प्रतिबंध लगाए। अगर ट्रंप ने दूसरा विकल्प चुना, तो दोनों देशों के बीच ट्रेड वॉर छिड़ सकता है। हालांकि कुछ Experts का मानना है कि अमेरिकी उद्योगों के दबाव में ट्रंप झुक भी सकते हैं।
अमेरिकी उद्योगों पर प्रभाव
अगर भारत से ऑटो पार्ट्स और स्टील का एक्सपोर्ट कम हुआ, तो अमेरिकी कंपनियों को भारी नुकसान होगा। ठीक इसी तरह, कृषि उत्पादों का निर्यात घटने से अमेरिकी किसानों की जेब पर असर पड़ेगा। साफ है कि ट्रंप को अपने कदम सोच-समझकर उठाने होंगे।
आगे की राह: क्या हो सकता है समाधान?
मध्यमार्ग की संभावनाएँ
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि दोनों देश एक middle ground पर आ सकते हैं, जहां भारत कुछ शुल्क कम कर दे और अमेरिका भी अपनी मांगों में थोड़ी ढील दे। इससे win-win स्थिति बन सकती है। पर अभी तक ऐसी कोई पहल नहीं दिख रही।
डेडलाइन के बाद के परिदृश्य
अगर 9 जुलाई तक कोई समझौता नहीं हुआ, तो भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव बढ़ेगा। भारत EU और रूस जैसे देशों के साथ नए ट्रेड डील कर सकता है। वहीं अमेरिका को भी अपने एक्सपोर्ट के लिए नए मार्केट तलाशने होंगे।
निष्कर्ष
भारत ने अपना पक्ष साफ कर दिया है – किसान और ग्रामीण इकोनॉमी हमारी प्राथमिकता है। अमेरिका के लिए यह बड़ी चुनौती है, क्योंकि भारत एक विशाल मार्केट है। 9 जुलाई के बाद क्या होगा, यह देखना दिलचस्प होगा। आपको क्या लगता है? क्या भारत को अमेरिका के सामने झुक जाना चाहिए, या हम सही रास्ते पर हैं? कमेंट में अपनी राय जरूर बताएं।
Source: Navbharat Times – Default | Secondary News Source: Pulsivic.com