जगदीप धनखड़ ने अचानक इस्तीफा क्यों दिया? टाइमलाइन के साथ जानें पूरा सच!

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का अचानक इस्तीफा: क्या है पूरी कहानी?

21 जुलाई 2025 का दिन भारतीय राजनीति के इतिहास में दर्ज हो गया। जब उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अचानक इस्तीफा दे दिया – वो भी संसद के मानसून सत्र की शुरुआत के ठीक बाद! दिल्ली की राजनीतिक गलियारों में तो मानो बिजली गिर गई। सरकारी बयान में ‘स्वास्थ्य कारण’ बताया गया, लेकिन अरे भई… क्या सच में? राजनीति के पंडितों की नज़र में तो ये किसी बड़े टकराव की झलक है। सवाल यह है कि क्या ये सच में स्वास्थ्य का मामला था, या फिर सरकार और राष्ट्रपति भवन के बीच की खींचतान का नतीजा? चलिए, पूरी कहानी समझते हैं।

पहले थोड़ा पीछे चलते हैं…

धनखड़ साहब का राजनीतिक करियर तो एकदम फिल्मी कहानी जैसा रहा है। राज्यसभा सांसद से लेकर पश्चिम बंगाल के राज्यपाल तक का सफर, और फिर 2022 में उपराष्ट्रपति पद की कुर्सी। लेकिन पिछले कुछ महीनों से… कुछ तो चल रहा था। राजधानी के अंदरूनी सूत्र तो कह रहे थे कि सरकार और संवैधानिक पदों के बीच तनाव बढ़ रहा है। और सच कहूं तो, धनखड़ जी की public appearances भी अचानक कम हो गई थीं – जैसे कोई संकेत दे रहे हों।

क्या-क्या हुआ? एक नज़र में

असल मामला समझने के लिए घटनाओं का क्रम देखना ज़रूरी है। 15 जून को एक कार्यक्रम में धनखड़ ने सरकारी नीतियों पर सवाल उठाए – वो भी खुलकर! राजनीति के जानकारों ने इसे बड़ा संदेश माना। फिर 3 जुलाई को मीडिया में खबरें आईं कि उपराष्ट्रपति भवन और सरकार के बीच तनाव है। और फिर… धमाका! 18 जुलाई को अचानक उनके सारे कार्यक्रम कैंसिल। तीन दिन बाद – इस्तीफा। बस इतना ही नहीं, ये सब मानसून सत्र की शुरुआत के साथ हुआ। संयोग? शायद नहीं।

किसने क्या कहा?

इस्तीफे के बाद तो राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं देखने लायक थीं। सत्ता पक्ष वालों ने बड़ी सफाई से कहा – “स्वास्थ्य सर्वोपरि”। वहीं विपक्ष तो मानो बैठा ही था इस मौके का इंतज़ार करते हुए। उनका कहना – “लोकतंत्र के लिए काले दिन”। और social media? #DhankharResignation ट्रेंड कर रहा है, जहां हर कोई अपनी राय दे रहा है – कुछ सरकार के खिलाफ, तो कुछ धनखड़ के समर्थन में।

अब आगे क्या?

तो अब सवाल यह है कि अगला कदम क्या होगा? संविधान के मुताबिक तो नए उपराष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया शुरू होगी। लेकिन असल सवाल ये है कि क्या ये इस्तीफा सरकार और संवैधानिक संस्थाओं के बीच बढ़ते फासले का संकेत है? और धनखड़ साहब अब क्या करेंगे? राजनीति में वापसी? या फिर ये उनके सक्रिय राजनीतिक करियर का अंत? विपक्ष तो मानसून सत्र में इस मुद्दे को उछालने के लिए बेताब दिख रहा है।

एक बात तो तय है – ये कोई साधारण इस्तीफा नहीं है। ये तो शायद एक बड़ी राजनीतिक कहानी की शुरुआत है। जब संवैधानिक पदों और सरकार के बीच के रिश्ते पर सवाल उठते हैं, तो ये सिर्फ एक व्यक्ति का मामला नहीं रह जाता। ये तो पूरे लोकतंत्र के लिए सोचने का विषय बन जाता है। आने वाले दिन… दिलचस्प होने वाले हैं।

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जगदीप धनखड़ का इस्तीफ़ा… अब ये मामला फिर से सुर्खियों में है। सच कहूँ तो, राजनीति के गलियारों में हलचल तो होनी ही थी। Timeline पर नज़र डालें, विपक्ष के सवालों को सुनें, और फिर खुद ही समझ आता है – ये कोई साधारण फैसला नहीं। पीछे कई परतें हैं, कई पेचीदा वजहें।

अब सवाल ये है कि असली कारण क्या हो सकता है? क्या सिर्फ़ राजनीतिक दबाव? या कुछ और? खैर, ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा।

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(Note: HTML tags preserved as instructed. Conversational tone with rhetorical questions, sentence fragments like “खैर, ये तो…” and natural flow added. English words kept in original form.)

Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com

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