जैसलमेर स्कूल हादसा: जब सिस्टम की फेलियर ने एक बच्चे की जान ले ली
राजस्थान का जैसलमेर… जहां सुनहरे किले और रेगिस्तान की खूबसूरती के बीच एक ऐसी दर्दनाक घटना ने सबका ध्यान खींचा है। पूनमनगर गांव के एक सरकारी स्कूल में छत गिरी, और एक मासूम बच्चे की जान चली गई। सच कहूं तो ये कोई नई बात नहीं – झालवाड़ हादसे के बाद भी क्या कुछ बदला था? शायद सिर्फ फाइलों की स्टैक बढ़ी होगी।
विधायक साहब के गांव की कहानी: जहां सिस्टम फेल होता है
अब इसे क्या कहें – विडंबना या त्रासदी? ये पूनमनगर कोई आम गांव नहीं, बल्कि BJP विधायक छोटू सिंह भाटी का पैतृक गांव है। हैरानी की बात ये है कि स्कूल की दीवारों से प्लास्टर गिरता रहा, शिक्षकों ने रिपोर्ट्स भेजीं, लेकिन किसी ने सुना तक नहीं। ग्रामीणों का सवाल सही है – अगर विधायक के अपने गांव का यह हाल है, तो बाकी जगहों पर students किस हाल में पढ़ रहे होंगे? सच पूछो तो ये सवाल नहीं, सिस्टम पर एक बड़ा थप्पड़ है।
प्रशासन की ‘मैनेजमेंट’ और गांव वालों का गुस्सा
हादसे के बाद प्रशासन ने अपना रटा-रटाया तरीका अपनाया – मुआवजे का ऐलान, नए भवन का वादा। लेकिन क्या यही काफी है? ग्रामीणों का गुस्सा समझ आता है। विधायक ने शोक जताया, लेकिन जैसा कि हमारे नेता अक्सर करते हैं – बस फॉर्मेलिटी पूरी कर दी। एक ग्रामीण भाई ने सही कहा – “यहां तो विधायक का गांव है फिर भी… बाकी जगहों का अंदाज़ा लगा लो।” सच कहूं तो ये वाक्य पूरे सिस्टम पर सवाल खड़ा कर देता है।
राजनीति का पुराना खेल: ब्लेम गेम शुरू
अब जैसा कि होता आया है – शिक्षा विभाग ने जांच का ढोंग रचाया, विपक्ष (खासकर Congress) सरकार पर बरस पड़ा। शिक्षा मंत्रालय वालों ने ‘कड़ी कार्रवाई’ का बयान जारी किया। पर सच तो ये है कि ये सब एक सर्कस है – जब तक हमारी प्राथमिकताएं नहीं बदलेंगी, ऐसे हादसे होते रहेंगे।
आगे का रास्ता: सिर्फ वादों से काम नहीं चलेगा
सरकार ने अब सभी स्कूलों की जांच का ऐलान किया है। अच्छी बात है, लेकिन क्या ये सिर्फ कागजी खानापूर्ति होगी? ग्रामीणों ने साफ कर दिया है – अब वो मूक दर्शक नहीं रहेंगे। ये हादसा सिर्फ एक बच्चे की जान नहीं ले गया, बल्कि हमारी सामूहिक विफलता को भी उजागर कर गया। सवाल ये है कि क्या हम सच में सबक लेंगे, या फिर अगले हादसे का इंतज़ार करेंगे?
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जैसलमेर का वो हादसा… सुनकर ही दिल दहल जाता है। क्या हमारे बच्चों की सुरक्षा सिर्फ़ कागज़ों तक ही सीमित है? ग्रामीणों का गुस्सा तो समझ आता है – आखिर किसी का बच्चा होता तो वो भी यही करते। लेकिन सवाल ये है कि क्या गुस्से से कुछ हल होगा?
असल में, ये मामला तो पूरे सिस्टम की फेलियर की कहानी है। जिम्मेदार अधिकारी अगर अपना काम ठीक से करते, तो शायद आज ये दिन न देखना पड़ता। और अब? अब तो बस एक ही रास्ता है – accountability. हर उस शख्स को जवाबदेह ठहराया जाए जिसकी लापरवाही ने इन मासूमों के भविष्य से खिलवाड़ किया।
पर सच कहूं तो… सजा देना ही काफी नहीं है। हमें तो अपने स्कूलों की हालत सुधारने पर फोकस करना होगा। वरना ये कहानी बार-बार दोहराई जाएगी। और इस बारे में और भी बहुत कुछ कहना बाकी है…
Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com
