JNU में वेज-नॉनवेज को लेकर हंगामा! क्या है पूरा माजरा?
अरे भई, JNU का मामला है ना, वहीं जहाँ हमेशा कुछ न कुछ चलता रहता है। इस बार बवाल है मेस के खाने को लेकर। सोचो, Vegetarian और Non-Vegetarian खाने को अलग-अलग जगह पर परोसने का प्रस्ताव आया था। सीधा-सादा सा मामला लगता है न? लेकिन ऐसा हुआ कि पूरा कैंपस ही गरमा गया! JNUSU ने तो इसे “भेदभाव” तक कह डाला। इतना हंगामा हुआ कि प्रशासन को नोटिस वापस लेना पड़ा। पर अब भी चाय की दुकान से लेकर लाइब्रेरी तक यही चर्चा है।
असल में हुआ क्या? समझते हैं…
देखिए, JNU में पहले से वेज-नॉनवेज अलग counters पर मिलता था – ये तो ठीक था। मगर सब एक ही डाइनिंग हॉल में गप्पें मारते हुए खाते थे। अचानक 15 जनवरी को प्रशासन ने नया नोटिस चिपका दिया – अलग टेबल्स की बात! मतलब? वेज वालों की अपनी मंडली, नॉन-वेज वालों की अपनी। JNUSU को ये बात बिल्कुल नहीं भाई। उन्होंने तुरंत कहा – “ये कैसा बंटवारा?” सच कहूँ तो, मुझे भी ये आइडिया थोड़ा अजीब लगा।
कैसे भड़की आग? पूरा किस्सा
भाई, नोटिस आते ही ऐसा लगा जैसे कैंपस में बवाल मच गया! JNUSU ने तो सीधे “असंवैधानिक” का लेबल चिपका दिया। Social media पर #NoFoodSegregation ट्रेंड होने लगा। Professors भी पीछे नहीं रहे – किसी ने इसे “बेतुका” कहा, तो किसी ने “समय की बर्बादी”। इतना प्रेशर बना कि प्रशासन को 2 दिन के अंदर ही नोटिस वापस खींचना पड़ा। असल में? जनता की ताकत देखिए!
कौन क्या बोला? सुनिए ज़रा
JNUSU प्रेजिडेंट आइसा घोष ने तो सीधे कह दिया – “JNU की ताकत ही उसकी diversity है। ऐसे फैसले social fabric को कमज़ोर करते हैं।” वहीं Political Science के प्रोफेसर अरुण कुमार जी ने इसे “बेवकूफी” तक कह डाला। और छात्र नेता राहुल का सवाल तो सुनिए – “15 साल से साथ खा रहे हैं, अचानक आज क्या हो गया?” सच पूछो तो, ये सवाल सही भी है!
आगे क्या? अभी तो शुरुआत है
हालांकि नोटिस वापस ले लिया गया, लेकिन प्रशासन की तरफ से कोई नई गाइडलाइन नहीं आई है। छात्र संघ तो clarification मांग रहा है। मेरी निजी राय? ऐसे sensitive मुद्दों पर बिना discussion के फैसले लेना… ये तो बिल्कुल ही गलत बात है। कम से कम teachers और students से तो बात करनी चाहिए थी न?
सबक क्या है? गंभीर सवाल
ये सिर्फ खाने की बात नहीं है दोस्तों। ये तो JNU के मूल चरित्र पर सवाल है। जहाँ दशकों से हर विचार, हर संस्कृति के लोग साथ रहते आए हैं, वहाँ अचानक ऐसे नियम? थोड़ा अजीब लगता है न? अब देखना ये है कि प्रशासन आगे ऐसे मसलों को कैसे handle करता है। मेरा मानना है कि dialogue और discussion से ही समाधान निकलेगा। वैसे भी, ये JNU है – यहाँ बहस तो होगी ही!
JNU Veg-Nonveg Food Controversy – वो सवाल जो हर किसी के मन में हैं
JNU में Veg और Nonveg खाने को लेकर नए नियम क्या हैं? और क्या ये सच में ज़रूरी थे?
देखिए, JNU ने हाल ही में मेस के लिए कुछ नए guidelines पेश किए हैं। अब Veg और Nonveg खाने के लिए अलग-अलग counters होंगे। साथ ही, दोनों तरह के खाने को एक साथ गर्म करने पर भी रोक लगा दी गई है। मतलब साफ है – अब दाल और चिकन एक ही चूल्हे पर नहीं पकेंगे। पर सवाल यह है कि क्या ये नियम वाकई practical हैं, या फिर सिर्फ symbolic gesture है?
इस पूरे विवाद की जड़ क्या है? समझने की कोशिश करते हैं
असल में बात यह है कि कुछ students और political groups इसे बिल्कुल unnecessary मान रहे हैं। उनका कहना है कि इससे campus में divide बढ़ेगा। वहीं दूसरी तरफ, कुछ लोगों को लगता है कि यह सही कदम है – religious sentiments का ख्याल रखना ज़रूरी है ना? पर क्या हमें सच में इतने strict rules की ज़रूरत है? मेरा मानना है कि यहां balance बनाने की ज़रूरत थी।
क्या JNU में पहले भी Veg-Nonveg को लेकर कोई rules थे? या ये नया drama है?
नहीं, ये कोई नई बात नहीं है। JNU में पहले भी कुछ guidelines थे, लेकिन उतने strict नहीं। पहले तो एक ही counter से आपको दोनों तरह का खाना मिल जाता था – चाहे Veg हो या Nonveg। अब नए नियमों ने चीज़ों को थोड़ा complicated बना दिया है। सच कहूं तो, क्या पहले वाला system इतना बुरा था?
Students के लिए इसका मतलब क्या है? असल impact क्या होगा?
अब students को अलग-अलग counters पर जाना पड़ेगा – जिसका मतलब है extra time और effort। और हां, इससे campus culture पर भी असर पड़ सकता है। क्या हम unintentionally ही students के बीच एक तरह की दीवार खड़ी कर रहे हैं? मुझे लगता है इस policy के long-term effects पर गंभीरता से सोचने की ज़रूरत है।
एक बात और – क्या हमें हर चीज़ को इतना serious लेना चाहिए? कभी-कभी थोड़ा flexibility भी अच्छा होता है। सोचिएगा ज़रूर।
Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com