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केरल के शख्स को नौकरी के बहाने रूस-यूक्रेन युद्ध में झोंका, 7 महीने से शव नहीं मिला

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केरल के एक शख्स की कहानी जो रूस-यूक्रेन युद्ध में ‘नौकरी’ के नाम पर फंस गया

आज एक ऐसी खबर सामने आई है जो दिल दहला देने वाली है। केरल का एक युवक, बिनिल, जिसे recruitment agency के चक्कर में फंसाकर रूस-यूक्रेन युद्ध में झोंक दिया गया। और सबसे दर्दनाक? सात महीने बाद भी उसका शव तक वापस नहीं आ पाया है। परिवार रोज सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहा है, लेकिन जवाब वही पुराना – “प्रक्रिया चल रही है।” सच कहूं तो, यह सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि हमारे सिस्टम पर एक बड़ा सवालिया निशान है।

जब नौकरी का सपना मौत का जाल बन गया

बिनिल की कहानी उन सैकड़ों भारतीयों की तरह है जो बेहतर जिंदगी की तलाश में विदेशों का रुख करते हैं। एक सामान्य परिवार से ताल्लुक रखने वाले बिनिल को security guard की नौकरी का लालच दिखाया गया। अच्छी salary, बढ़िया facilities – कौन नहीं फंसता ऐसे ऑफर में? लेकिन असलियत कुछ और ही थी। पता चला तो बहुत देर हो चुकी थी – उन्हें तो युद्ध में लड़ने के लिए भेज दिया गया था। और अब? परिवार के पास मृतक का शव तक नहीं है। ईमानदारी से कहूं तो, ये वो कहानी है जो हर उस भारतीय को सोचने पर मजबूर कर देती है जो विदेश में नौकरी के सपने देखता है।

सरकारी फाइलों में फंसा एक जिंदगी का सवाल

यहां सबसे हैरान करने वाली बात ये है कि परिवार ने हर संभव कोशिश की – विदेश मंत्रालय से लेकर स्थानीय नेताओं तक। लेकिन जवाब? “Administrative hurdles” का झमेला। केरल सरकार ने केंद्र से मदद मांगी, लेकिन अभी तक स्थिति वही की वही है। एक तरफ तो हम ‘विश्वगुरु’ बनने की बात करते हैं, दूसरी तरफ अपने ही नागरिकों के शव तक वापस नहीं ला पाते। क्या यही है हमारी सरकारी व्यवस्था की हकीकत?

समाज की प्रतिक्रिया: गुस्सा, निराशा और सवाल

बिनिल के परिवार का दर्द सुनकर किसका दिल नहीं दहल जाएगा? “हमारा बेटा युद्ध में मारा गया, लेकिन हम उसे अंतिम विदा तक नहीं दे पा रहे,” ये शब्द सुनकर तो लगता है जैसे सिस्टम पूरी तरह फेल हो चुका है। स्थानीय नेताओं ने भी इस मामले को गंभीरता से उठाया है, लेकिन क्या सिर्फ बयानबाजी से काम चलेगा? मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि ये मामला सिर्फ एक शव वापसी का नहीं, बल्कि पूरे प्रवासी मजदूर सिस्टम की कमजोरियों का है।

आगे का रास्ता: सवाल ज्यादा, जवाब कम

अब सवाल यह है कि क्या diplomatic talks से बिनिल का शव वापस आ पाएगा? और बड़ा सवाल – क्या ऐसी fraud agencies के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई होगी? सच तो ये है कि अभी तक सरकार की तरफ से कोई clear policy नजर नहीं आ रही। बिनिल का मामला तो सामने आ गया, लेकिन कितने और बिनिल इसी सिस्टम का शिकार हो रहे होंगे? सोचकर ही डर लगता है।

अंत में बस इतना ही – ये केस सिर्फ एक शव वापसी का मामला नहीं है। ये हमारी सरकारी प्रक्रियाओं की धीमी गति, प्रवासी मजदूरों की सुरक्षा और नीतियों की कमजोरियों का आईना है। क्या हमारे नीति निर्माता इससे सबक लेंगे? वक्त ही बताएगा। लेकिन फिलहाल, एक परिवार अपने बेटे के अंतिम संस्कार का इंतजार कर रहा है – सात महीने से।

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1. कैसे फंस गया ये केरल का लड़का Russia-Ukraine War में?

देखिए, कहानी तो वही पुरानी है – नौकरी के चक्कर में फंसे। पर ये केस थोड़ा अजीब है। इस बेचारे को बताया गया कि Russia में army के लिए security guard की नौकरी मिलेगी। सुनने में तो ठीक लगता है न? लेकिन असलियत… उसे direct यूक्रेन के war zone में धकेल दिया गया। सोचिए, किसी दिन आप सामान्य नौकरी के लिए जाएं और खुद को war के बीच पाएं!

2. शव तक नहीं मिला – 7 महीने बाद भी?

हां, ये सच है और डरावना भी। सात महीने हो गए, पर अभी तक उसका dead body तक नहीं मिला। परिवार की हालत का अंदाजा लगा सकते हैं – वो तो बस भारत सरकार से गुहार लगा रहे हैं। सच कहूं तो, ऐसे मामलों में सरकारी प्रक्रिया कितनी धीमी चलती है वो हम सब जानते हैं।

3. सरकार ने क्या किया? कुछ हुआ या नहीं?

सुनिए, MEA (Ministry of External Affairs) वाले कह रहे हैं कि वो Russia के साथ बातचीत कर रहे हैं। लेकिन… यहां एक बड़ा ‘लेकिन’ है। अभी तक कुछ ठोस नतीजा नहीं निकला। सवाल यह है कि कब तक निकलेगा? क्योंकि एक परिवार का बेटा तो गया ही, उनकी उम्मीदें अभी भी जिंदा हैं।

4. ऐसे झांसे में न फंसें – ये टिप्स जरूर याद रखें

अरे भाई, आजकल तो हर कोई foreign जॉब का झांसा दे रहा है। मेरा सुझाव? तीन बातें गांठ बांध लो:
1. किसी भी foreign job offer को खुद verify करो – Google कर लो, पूछताछ कर लो
2. सरकारी एजेंसियों के through ही जाओ, नहीं तो बाद में पछताओगे
3. और सबसे जरूरी – war zone वाले देशों में जॉब? बिल्कुल नहीं! सच में, जान है तो जहान है।

एक extra tip – Indian Embassy से जरूर contact कर लेना। थोड़ी सी सावधानी बाद में पछताने से तो बेहतर है न?

Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com

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