मालेगांव ब्लास्ट केस: बाइक के चेसिस नंबर ने कैसे पलट दिया फैसले का आधार?

मालेगांव ब्लास्ट केस: वो बाइक का चेसिस नंबर जिसने सब कुछ बदल दिया!

कभी-कभी कोर्ट के फैसले में सिर्फ एक छोटी सी डिटेल पूरा गेम बदल देती है। मालेगांव ब्लास्ट केस में ठीक यही हुआ। जब NIA कोर्ट ने साध्वी प्रज्ञा ठाकुर समेत सात आरोपियों को बरी कर दिया, तो सबकी नज़रें उस बाइक के चेसिस नंबर पर टिक गईं। असल में, यही वो कड़ी थी जो पूरे केस की कहानी बदलने वाली थी। 13 साल के लंबे इंतज़ार के बाद आया ये फैसला सचमुच हैरान करने वाला था। कोर्ट ने साफ कहा – RDX के इस्तेमाल का कोई पुख्ता सबूत नहीं, और बाइक का चेसिस नंबर? वो भी कन्फर्म नहीं। बस, इतना ही काफी था पूरा केस ही पलट देने के लिए!

2008 का वो काला दिन जब मालेगांव हिल गया

29 सितंबर 2008… महाराष्ट्र के इतिहास का एक ऐसा दिन जिसे भूल पाना मुश्किल है। मालेगांव में हुए उस भीषण धमाके ने 6 मासूम जिंदगियां छीन लीं, 100 से ज़्यादा लोगों को ज़ख्मी कर दिया। याद है ना वो मस्जिद के पास हुआ धमाका? शुरुआती जांच में तो इसे ‘हिंदू आतंकवाद’ से जोड़कर देखा गया। पहले Maharashtra ATS ने केस संभाला, फिर NIA को ट्रांसफर हो गया। और फिर क्या? साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित जैसे बड़े नाम आरोपियों की लिस्ट में शामिल हो गए। पर सवाल ये है कि क्या सच में ये लोग दोषी थे? या फिर जल्दबाज़ी में किसी को फंसा दिया गया?

कोर्ट ने क्यों कहा – “सबूत नाकाफी हैं”?

800 पन्नों के फैसले में NIA कोर्ट ने जो लिखा, वो सचमुच चौंकाने वाला था। देखिए ना, पूरा केस दो चीज़ों पर टिका था – RDX के इस्तेमाल का सबूत और बाइक का चेसिस नंबर। लेकिन कोर्ट ने कहा कि दोनों ही चीज़ें पुख्ता नहीं हैं। मतलब साफ है – जिस बाइक को बम फटने वाली बाइक बताया जा रहा था, उसका चेसिस नंबर कन्फर्म नहीं हो पाया। और RDX? उसका कोई सबूत ही नहीं मिला। ऐसे में कोर्ट के पास और कोई चॉइस ही नहीं थी। कानून की भाषा में कहें तो – ‘बिना सबूत के आरोप नहीं चल सकते’। सीधी सी बात है ना?

“न्याय मिला” या “न्याय नहीं मिला”?

फैसले के बाद का दृश्य तो देखने लायक था। एक तरफ साध्वी प्रज्ञा का कहना – “मुझे कानून पर भरोसा था”। दूसरी तरफ पीड़ित परिवारों का दर्द – “हमें न्याय नहीं मिला”। राजनीति की बात करें तो BJP नेताओं ने इसे ‘सच की जीत’ बताया, वहीं Congress वालों ने जांच एजेंसियों पर सवाल उठाए। पर सच्चाई ये है कि ये केस सिर्फ एक बम ब्लास्ट का मामला नहीं रहा। ये तो उस बड़े सवाल को उठाता है कि आतंकवाद के मामलों में हमारी जांच प्रणाली कितनी विश्वसनीय है? क्या कभी राजनीति सच्ची जांच के रास्ते में आती है? सोचने वाली बात है…

अब आगे क्या? केस की अगली कहानी

तो अब सवाल ये उठता है कि आगे क्या होगा? कानून के जानकारों का मानना है कि NIA इस फैसले के खिलाफ Bombay High Court या Supreme Court में अपील कर सकती है। राजनीतिक तौर पर देखें तो ये केस ‘हिंदू आतंकवाद’ की बहस को फिर से जिंदा कर सकता है। और सबसे बड़ी बात – जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। क्या इस केस के बाद हमारी आतंकवाद रोधी कानूनी व्यवस्था में कोई बदलाव आएगा? वक्त ही बताएगा। एक बात तो तय है – ये फैसला भारतीय न्यायिक इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होगा।

आखिर में बस इतना ही – न्यायिक प्रक्रिया तो पूरी हो गई, पर क्या न्याय मिला? ये सवाल अब भी बाकी है। और हां, ये केस हमें एक बड़ी सीख दे गया – आतंकवाद के मामलों में सबूतों का होना कितना ज़रूरी है। वरना देख लीजिए, एक बाइक का चेसिस नंबर ही कैसे पूरी कहानी बदल सकता है!

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मालेगांव ब्लास्ट केस: वो बाइक का चेसिस नंबर जिसने सब कुछ बदल दिया!

मालेगांव ब्लास्ट केस में बाइक का चेसिस नंबर इतना important क्यों? सवाल तो यह है…

देखिए, ये चेसिस नंबर कोई छोटी-मोटी चीज़ नहीं थी। असल में, ये पूरे केस की कहानी ही बदल देने वाला सबूत साबित हुआ। ऐसा लगता है जैसे किसी फिल्म का प्लॉट ट्विस्ट हो! इसी नंबर ने पता लगाया कि ब्लास्ट में इस्तेमाल हुई बाइक किसकी थी… और हैरानी की बात ये कि यही वो प्वाइंट बना जिसने कुछ आरोपियों को जेल से छुटकारा दिलवाया। सच कहूं तो, ऐसी डिटेल्स अक्सर केस को पूरी तरह पलट देती हैं।

चेसिस नंबर ने कैसे उलट दिया कोर्ट का पूरा खेल?

अब यहां मजेदार बात ये हुई – कोर्ट में पता चला कि जो चेसिस नंबर सबूत के तौर पर दिखाया जा रहा था, वो असली बाइक से मेल ही नहीं खा रहा था! यानी सीधे शब्दों में कहें तो… गलत सबूत पेश किया गया था। और इसी एक गड़बड़ी ने पूरे केस का रुख बदल दिया। कुछ लोगों को तो बाइज्जत बरी करना पड़ा। सोचिए, एक नंबर ने इतना बड़ा फर्क पैदा कर दिया!

मालेगांव केस का रोलरकोस्टर: क्या-क्या हुआ अब तक?

भई, इस केस ने तो सचमुच सबको चौंका दिया। कुछ आरोपियों को सजा हुई, तो कुछ बच निकले। और वो भी सिर्फ इसलिए क्योंकि सबूत ही कमजोर थे। पर सबसे दिलचस्प? वो चेसिस नंबर वाला मामला जिसने पूरी कहानी को ही नया मोड़ दे दिया। कभी सोचा है कि एक छोटी सी डिटेल कितना बड़ा असर डाल सकती है?

चेसिस नंबर की पड़ताल: कैसे पकड़ी गई चालाकी?

तो अब सवाल यह उठता है कि आखिर ये गड़बड़ी पकड़ी कैसे गई? दरअसल, जांच एजेंसियों और forensic experts ने बाइक के दस्तावेजों और पार्ट्स की बारीकी से जांच की। और हैरानी की बात ये रही – केस फाइल में दर्ज नंबर और बाइक का असली नंबर… दोनों का मेल ही नहीं था! मतलब साफ है न? किसी ने सबूतों के साथ खिलवाड़ किया था। ईमानदारी से कहूं तो, ये तो वाकई में एक बड़ी गलती थी जिसकी कीमत पूरे केस को चुकानी पड़ी।

Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com

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