मालेगांव ब्लास्ट केस: अब नया ट्विस्ट, जमीयत उलेमा-ए-हिंद हाईकोर्ट पहुंची
क्या आपको याद है वो मालेगांव ब्लास्ट केस? जिसमें साध्वी प्रज्ञा समेत सात आरोपियों को जून में बरी कर दिया गया था? अब इस मामले में नया मोड़ आया है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख करने का फैसला किया है। और ये कोई आम अपील नहीं होगी – संगठन ने साफ किया है कि अगस्त के पहले हफ्ते तक वो आधिकारिक तौर पर अपील दाखिल करेगा। सच कहूं तो, ये खबर उन परिवारों के लिए राहत की एक किरण लेकर आई है जो पिछले 16 साल से इंसाफ का इंतज़ार कर रहे हैं।
2008 का वो दर्दनाक दिन: जब मालेगांव हिल गया था
29 सितंबर 2008… महाराष्ट्र का मालेगांव… वो सीरियल ब्लास्ट जिसने न सिर्फ शहर बल्कि पूरे देश को झकझोर दिया था। 6 मासूम जानें गईं, 100 से ज़्यादा लोग घायल हुए। आज भी याद करते हैं तो रूह कांप जाती है। एनआईए ने जांच में कुछ हिंदू अतिवादी संगठनों को निशाने पर लिया था, जिनमें साध्वी प्रज्ञा भी शामिल थीं। लेकिन इस साल जून में विशेष कोर्ट ने सबूतों की ‘कमी’ का हवाला देकर सभी को बरी कर दिया। है न हैरान कर देने वाला फैसला?
जमीयत उलेमा-ए-हिंद की चाल: क्या ये बदलेगा गेम?
अब जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने बाज़ी पलट दी है। ये संगठन तो पहले से ही इस केस में सक्रिय था। उनका कहना है कि निचली अदालत का फैसला “पीड़ितों के साथ अन्याय” था। उनके प्रवक्ता ने मीडिया से बात करते हुए कहा – “देखिए, हमें लगता है सबूतों को सही तरीके से नहीं देखा गया। हम पीड़ित परिवारों के साथ हैं और हाईकोर्ट में नया केस लड़ेंगे।” और सच तो ये है कि कुछ पीड़ित परिवार भी इस फैसले से नाराज़ हैं। उन्हें लगता है उनके लोगों को इंसाफ नहीं मिला।
क्या कह रही है सियासत? विवादों का पिटारा खुला
इस मामले में प्रतिक्रियाएं बड़ी दिलचस्प रही हैं। एक तरफ साध्वी प्रज्ञा के वकील का कहना है कि “कोर्ट ने सही फैसला लिया”, वहीं सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक बड़े वर्ग को ये फैसला पच नहीं रहा। और तो और, राजनीतिक गलियारों में भी ये मामला गरमा गया है। आखिरकार, मालेगांव केस को लंबे समय से सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील माना जाता रहा है।
अब क्या? हाईकोर्ट की चौखट पर टिकी हैं सबकी निगाहें
अब पूरा फोकस बॉम्बे हाईकोर्ट पर है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद की अपील इस लंबे चले मामले में नया टर्निंग पॉइंट बन सकती है। कानून के जानकार कह रहे हैं कि अगर हाईकोर्ट ने इस फैसले को चुनौती दी, तो पूरा केस फिर से नए सिरे से शुरू हो सकता है। और हां, सुरक्षा एजेंसियां भी अलर्ट मोड में हैं। क्योंकि इस केस का कोई भी फैसला सामाजिक-राजनीतिक भूचाल ला सकता है।
तो ये है पूरा मामला संक्षेप में। एक तरफ तो ये केस हमारी न्याय प्रणाली की जटिलताओं को दिखाता है, वहीं दूसरी ओर ये उन परिवारों के लिए उम्मीद की किरण भी है जो दो दशक से इंसाफ की राह देख रहे हैं। और हां, इस मामले में आने वाले दिनों में और ट्विस्ट आने वाले हैं – ये तो तय है!
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मालेगांव ब्लास्ट केस… ये नाम सुनते ही कान खड़े हो जाते हैं, है न? अब जमीयत उलेमा-ए-हिंद की हाईकोर्ट याचिका ने इस मामले को फिर से हल्का कर दिया है। सच कहूं तो, ये केस पहले से ही काफी जटिल था, और अब ये नया मोड़ क्या लेकर आएगा, ये तो समय ही बताएगा।
अदालत के फैसले का इंतज़ार कर रहे लोगों की नज़रें अब और भी गड़ी हुई हैं। पर सवाल यह है कि क्या ये नया ट्विस्ट सच में केस की दिशा बदल देगा? ईमानदारी से कहूं तो, ये पूरी तरह न्यायपालिका पर निर्भर है।
एक तरफ तो हर कोई निष्पक्ष न्याय चाहता है, लेकिन दूसरी तरफ, इतने सालों बाद भी ये केस क्यों सुलझ नहीं पाया? सोचने वाली बात है। खैर, हमें उम्मीद तो रखनी ही चाहिए कि सच सामने आएगा। वरना… जनाब, इंसाफ का इंतज़ार करते-करते तो दिल थक जाता है।
Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com