मालेगांव ब्लास्ट केस: 17 साल बाद आया ऐतिहासिक फैसला, साध्वी प्रज्ञा समेत सभी बरी
सच कहूं तो, ये खबर सुनकर मुझे थोड़ा हैरानी हुई। 2008 का वो केस जिसने पूरे देश को हिला दिया था, आखिरकार आज अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंचा। एनआईए की विशेष अदालत ने साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित और बाकी 5 आरोपियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया। और ये फैसला आया है पूरे 17 साल बाद! अदालत ने साफ कहा – सबूत नहीं, तो सजा नहीं। सीधी सी बात है न?
2008 का वो काला दिन जब मालेगांव हिल गया था
6 सितंबर 2008… महाराष्ट्र के मालेगांव में हुए उस धमाके ने न सिर्फ 6 लोगों की जान ली, बल्कि 100 से ज्यादा को घायल कर दिया। याद है आपको? उस वक्त तो महाराष्ट्र ATS ने इसे ‘हिंदू आतंकवाद’ से जोड़ दिया था। लेकिन 2011 में केस NIA के पास चला गया। और फिर… ये मामला राजनीति के दलदल में फंसता चला गया। ‘हिंदू आतंकवाद’ शब्द ने तो दिल्ली से लेकर मुंबई तक सियासी तूफान खड़ा कर दिया था।
अदालत ने क्यों दिया ये फैसला? 15 बड़े कारण
अब सवाल यह है कि आखिर 17 साल बाद अदालत ने ये फैसला क्यों दिया? चलिए, बात करते हैं मुख्य वजहों की:
- सबसे बड़ी बात – सबूत ही नहीं थे! जी हां, केस टूटा सबूतों की कमी पर
- NIA ने 2016 में ही मान लिया था कि सबूत कमजोर हैं
- गवाहों के बयान? एक दूसरे से उलट! किस पर भरोसा करते?
- फोरेंसिक रिपोर्ट भी कोई खास मदद नहीं कर पाई
- साजिश का कोई सबूत नहीं मिला – ये तो बहुत बड़ी बात है
- जांच एजेंसियों ने केस को लेकर लापरवाही दिखाई
- सोचिए, इन आरोपियों ने जेल में कितने साल काटे होंगे?
- 200 गवाहों में से ज्यादातर बयान झूठे निकले
- 2016 में ही NIA ने चार्जशीट वापस ले ली थी – मतलब साफ है न?
- वकीलों ने तो सीधे कहा – “ये केस सबूतों के बिना चल ही नहीं सकता”
- कहीं राजनीतिक दखल तो नहीं था? सवाल तो उठता है
- कोई संगठन? कोई साजिश? कुछ भी साबित नहीं हुआ
- मोबाइल डेटा या टेक्निकल सबूत? नदारद!
- पीड़ित परिवारों का दर्द समझ आता है – उन्हें न्याय नहीं मिला
- आरोपियों ने अदालत को धन्यवाद दिया – पर सवाल ये कि 17 साल किसने लिए?
किसने क्या कहा? प्रतिक्रियाओं का दंगल
साध्वी प्रज्ञा का बयान तो सुर्खियों में रहा – “मैंने हमेशा कहा मैं निर्दोष हूं।” BJP ने इसे ‘सच की जीत’ बताया, वहीं कांग्रेस ने जांच पर सवाल उठाए। असल में, ये केस राजनीति से ऊपर कभी नहीं उठ पाया। पीड़ित परिवारों की बात सुनिए – “हमें न्याय नहीं मिला।” और मानवाधिकार वालों ने सही सवाल उठाया – “बिना सबूत के इतने साल जेल में रखना क्या सही था?”
एक तरफ तो ये फैसला साबित करता है कि हमारी अदालतें सबूतों के बिना किसी को दोषी नहीं ठहरातीं। लेकिन दूसरी तरफ, ये केस कई सवाल छोड़ गया है। क्या जांच एजेंसियों ने लापरवाही की? क्या राजनीति ने न्याय की प्रक्रिया को प्रभावित किया? और सबसे बड़ा सवाल – पीड़ितों को न्याय कब मिलेगा? ये बहस अभी लंबी चलने वाली है, ये तो तय है।
मालेगांव ब्लास्ट केस और साध्वी प्रज्ञा का फैसला – जानिए पूरी कहानी और उसके मायने
मालेगांव ब्लास्ट केस क्या था? और कौन थे मुख्य आरोपी?
याद है वो 2008 का वक्त? महाराष्ट्र के मालेगांव में एक बम धमाका हुआ था जिसमें 6 बेकसूर लोगों की जान चली गई। असल में, इस केस ने तब सुर्खियां बटोरीं जब साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित जैसे नाम सामने आए। कुल 7 आरोपी थे… और अब सालों बाद उन्हें बरी कर दिया गया है। क्या आप जानते हैं क्यों?
साध्वी प्रज्ञा को बरी क्यों किया गया? सच्चाई क्या है?
देखिए, कोर्ट ने बिल्कुल साफ़ शब्दों में कहा – सबूत ही नहीं थे! CBI के दावे टिक नहीं पाए। ईमानदारी से कहूं तो, benefit of doubt तो हर आरोपी का अधिकार होता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इतने सालों तक चले इस केस में सचमुच सबूत जुटाने में नाकामी रही? या फिर…?
राजनीति पर क्या पड़ेगा असर? जानिए मेरी राय
अब ये तो politically dynamite जैसा केस है ना? एक तरफ तो कुछ लोग इसे “Hindu terror” का नैरेटिव बताते रहे। दूसरी तरफ अब ruling party इसे न्याय की जीत कहेगी। Opposition? वो तो सवाल उठाएगी ही। पर सच क्या है? शायद वक्त ही बताएगा।
क्या केस अब खत्म हो गया? या और होगी कानूनी लड़ाई?
Technical तौर पर, CBI या महाराष्ट्र सरकार higher court में अपील कर सकती है। पर एक कड़वा सच – नए सबूतों के बिना अपील सिर्फ़ फॉर्मैलिटी होगी। फिलहाल तो कोई official बयान नहीं आया है। मेरा मानना? ये केस legal history में एक controversial chapter के तौर पर दर्ज हो चुका है।
क्या आपको लगता है ये फैसला सही था? कमेंट में बताइएगा ज़रूर!
Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com