मेघालय की रहस्यमयी गुफा: शिवलिंग नहीं फिर भी क्यों उतरवाए जाते हैं टूरिस्टों के जूते?

मेघालय की वो अजीबो-गरीब गुफा: जहाँ शिवलिंग नहीं फिर भी जूते उतारने पड़ते हैं!

अजीब बात है न? मेघालय के मावसिनराम की मॉजिमबूइन गुफा इन दिनों चर्चा में है। सोचिए, एक तरफ तो ये गुफा प्राकृतिक चमत्कार है, दूसरी तरफ कुछ लोग इसे धार्मिक स्थल बता रहे हैं। हाल ही में टूरिस्टों को जूते उतारने के आदेश ने तो पूरा हंगामा खड़ा कर दिया। असल में, स्थानीय खासी आदिवासियों को ये नियम बिल्कुल पसंद नहीं आए। क्यों? क्योंकि उनके लिए ये गुफा किसी मंदिर से कम नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान है। बड़ा दिलचस्प संघर्ष है – धर्म, परंपरा और पर्यटन के बीच!

पूरा माजरा क्या है? प्राकृतिक चमत्कार या धार्मिक प्रतीक?

देखिए, मॉजिमबूइन गुफा अपने आप में एक कुदरती करिश्मा है। अंदर का नज़ारा ऐसा – जैसे किसी ने चूना पत्थर को कलाकारी से तराश दिया हो। लेकिन यहीं पर एक पेंच फंस गया। गुफा में मौजूद एक प्राकृतिक स्तंभ को कुछ लोग शिवलिंग मानने लगे। हालांकि भूवैज्ञानिक कहते हैं ये तो बस प्रकृति का खेल है। मज़े की बात ये कि स्थानीय खासी समुदाय इस गुफा को किसी धर्म से नहीं जोड़ता। उनके लिए तो ये उनकी जड़ों से जुड़ी हुई विरासत है। सच कहूँ तो, यही टकराव तो विवाद की जड़ है।

नए नियम, नए झगड़े!

अब आते हैं हाल की घटनाओं पर। कुछ धार्मिक समूहों ने अचानक गुफा के लिए नियम बना डाले – जूते उतारो, फोटो खींचना बंद करो। कारण? “पवित्रता” बनाए रखना। पर स्थानीय लोगों को ये कहाँ मंजूर होने वाला था? उनका सीधा सा कहना है – “ये हमारी संस्कृति पर हमला है।” और सच भी तो है, सदियों से ये गुफा उनकी पहचान रही है, अब अचानक इसे धार्मिक स्थल कैसे बना दिया जाए? मामला इतना बढ़ा कि मेघालय सरकार को बीच में आना पड़ा। अब जांच चल रही है।

कौन क्या कह रहा है?

इस पूरे विवाद में हर कोई अपनी-अपनी राग अलाप रहा है। स्थानीय नेताओं का कहना है – “हमारी विरासत को धर्म से न जोड़ें।” धार्मिक समूहों का पक्ष – “हम तो बस सम्मान दिखा रहे हैं।” और बेचारे टूरिस्ट? उनकी तो पूरी कन्फ्यूजन है! एक पर्यटक ने तो मुझसे कहा – “भईया, हम तो घूमने आए थे, अब समझ नहीं आ रहा किसकी सुनें?” सचमुच, अजीब स्थिति है।

आगे का रास्ता क्या हो सकता है?

अब सरकार ने हल निकालने की कोशिश शुरू की है। बातचीत चल रही है। शायद एक मध्य रास्ता निकले – गुफा को ‘साझा सांस्कृतिक स्थल’ घोषित कर दिया जाए। मतलब, सबके लिए खुला, सबका सम्मान। पर्यटन विभाग भी नए गाइडलाइन्स ला सकता है। सच तो ये है कि भारत जैसे देश में ये टकराव नया नहीं। धर्म और संस्कृति के बीच संतुलन बनाना हमेशा से चुनौती रहा है। लेकिन अगर सब मिल-बैठकर सोचें, तो हल तो निकलेगा ही। आखिरकार, ये गुफा सबकी है न?

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Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com

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