मॉस्को में मोदी-पुतिन मुलाकात: डोभाल के साथ XI से बातचीत, ट्रंप का गुस्सा… फायदा किसका?
देखिए, मोदी जी की यह रूस यात्रा कोई साधारण दौरा नहीं है। असल में, यह भारत की वैश्विक राजनीति में बढ़ती दखलंदाजी को दिखाता है। मॉस्को में पुतिन के साथ हुई बैठक तो और भी दिलचस्प हो गई जब ट्रंप ने अचानक भारतीय सामानों पर 25% अतिरिक्त टैरिफ का ऐलान कर दिया। अरे भई, यह तो ऐसा हुआ जैसे चाय पीते-पीते अचानक नींबू निचोड़ दिया हो! और इसी बीच अजित डोभाल जी रूस-चीन के साथ ऊर्जा और रक्षा सहयोग पर गंभीरता से बात कर रहे थे। साफ दिख रहा है कि भारत अब बहुत स्मार्ट तरीके से अपने हित साध रहा है – न एक तरफ झुककर, न दूसरी तरफ।
पीछे की कहानी: भारत की चालबाज़ कूटनीति
भारत और रूस? यह तो पुराना जोड़ी है जैसे दोस्ती में दमदार और दहाड़ते हुए। S-400 डील तो बस एक उदाहरण है। लेकिन सच तो यह है कि यह रिश्ता सिर्फ हथियारों और तेल तक सीमित नहीं। वहीं दूसरी ओर चीन के साथ तनातनी… गलवान घाटी वाली बात याद है न? हालांकि अब लगता है बर्फ़ पिघलने का वक्त आ गया है। और फिर वही ट्रंप साहब – अचानक भारतीय स्टील और दवाओं पर टैरिफ लगाकर बैठ गए। सच कहूं तो यह मामला भारत-अमेरिका रिश्तों के लिए बिल्कुल अच्छा संकेत नहीं है।
मॉस्को में क्या-क्या हुआ?
मोदी और पुतिन की बैठक में तो जैसे सारे ज्वलंत मुद्दे आ गए – व्यापार हो या रक्षा, यूक्रेन संकट हो या ऊर्जा सुरक्षा। एक तरफ तो यह साफ है कि दोनों देश आपसी निवेश बढ़ाना चाहते हैं। वहीं डोभाल जी ने रूस-चीन के साथ सैन्य और ऊर्जा सहयोग को नई ऊंचाई पर ले जाने की बात की। मतलब साफ है – पश्चिम पर निर्भरता कम करने का समय आ गया है। लेकिन ट्रंप के इस टैरिफ ने तो जैसे पूरे खेल को ही पलट दिया। अब देखना यह है कि यह चाल किसके खिलाफ जाती है?
कौन क्या बोला?
भारत सरकार ने तो अभी तक बड़ी संयत प्रतिक्रिया दी है। एक अधिकारी ने बस इतना कहा, “अमेरिका के साथ बातचीत जारी है।” सीधी सी बात है न? वहीं रूसी मीडिया इसे अपनी एशियाई पकड़ मजबूत करने वाला कदम बता रही है। और अमेरिकी विश्लेषक? वे तो यही कह रहे हैं कि ट्रंप का यह कदम शायद 2024 के चुनावों को ध्यान में रखकर उठाया गया है। राजनीति है भाई, सब अपना-अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं।
आगे क्या?
अगर भारत, रूस और चीन की यह तिकड़ी मजबूत होती है तो अमेरिका के लिए मुश्किल हो सकती है। पर सच तो यह है कि ट्रंप के इन टैरिफों के बीच भारत को अमेरिका के साथ भी रिश्ते सुधारने होंगे। और हां, अगर मोदी जी की शी जिनपिंग से बात हो जाए तो LAC पर तनाव कम हो सकता है। एकदम ज़बरदस्त। सच में।
अंत में बात यह है कि भारत को इस जटिल राजनीतिक चौपड़ में बेहद सावधानी से चलना होगा। रूस-चीन के साथ दोस्ती जरूरी है, लेकिन अमेरिका के साथ व्यापार भी तो चलाना है। अगर हमारे नेताओं ने सही चालें चलीं, तो भारत न सिर्फ अपना फायदा साधेगा, बल्कि वैश्विक मंच पर अपनी आवाज़ और मजबूत करेगा। वैसे भी, अब तो हमारा देश वह नहीं रहा जो किसी के इशारे पर नाचे। है न?
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Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com