नाग पंचमी पर सांपों को दूध पिलाना पुण्य या पाप? राजनाथ सिंह ने क्यों दी ये चेतावनी?

नाग पंचमी पर सांपों को दूध पिलाना: पुण्य या पाप? और राजनाथ सिंह की चेतावनी क्यों है मायने रखती है?

अरे भाई, क्या आपने सुना रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का वो बयान? जिसने एक तीर से दो निशाने लगा दिए – देश की सुरक्षा और हमारी सदियों पुरानी परंपराओं पर सवाल! उन्होंने कहा कि आतंकवादियों ने भारत को “soft state” समझ लिया था… और सच कहूं तो ये बात काफी हद तक सही भी लगती है। लेकिन हैरानी की बात तो ये है कि इसी बहस के बीच नाग पंचमी पर सांपों को दूध पिलाने की प्रथा भी चर्चा में आ गई। क्या सच में ये हमारी आस्था का प्रतीक है, या फिर जानवरों के साथ की जाने वाली एक और बेरहमी?

जब परंपरा और विज्ञान आमने-सामने हो जाएं…

देखिए, नाग पंचमी तो हम सब बचपन से मनाते आए हैं। सांपों को दूध पिलाना, उनकी पूजा करना – ये सब तो हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है। लेकिन अब एक सवाल ज़हन में आता है: क्या हम जो कर रहे हैं, वो सच में सही है? वन्यजीव experts तो यही कहते हैं कि सांपों का शरीर दूध पचाने के लिए बना ही नहीं होता। मतलब साफ है – हम जिसे पुण्य समझकर कर रहे हैं, वो असल में उनके लिए जानलेवा साबित हो सकता है।

और फिर राजनाथ सिंह का वो बयान… उन्होंने सही कहा न कि पहले आतंकवादियों को “low cost, high return” वाला समीकरण मिल जाता था? पर यहां सवाल ये उठता है कि क्या सांस्कृतिक परंपराओं और वैज्ञानिक सोच के बीच संतुलन बिठाने का वक्त आ गया है?

लोग क्या कह रहे हैं? एक मजेदार विरोधाभास!

अब इस मामले में तो हर कोई अपनी-अपनी राग अलाप रहा है। वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. अजय देशमुख जैसे लोग तो साफ कह रहे हैं – “ये प्रथा खतरनाक है, बंद होनी चाहिए।” वहीं दूसरी तरफ धार्मिक गुरुओं का कहना है कि “सदियों पुरानी परंपरा है, आस्था का मामला है।”

और राजनीति? वो तो हर मौके पर अपना स्वांग रच ही लेती है। विश्लेषक रमेश तिवारी जी ने तो राजनाथ सिंह के बयान को पूरा सपोर्ट कर दिया। सच कहूं तो ये पूरा मामला उस पुरानी कहावत की तरह लगता है – “हर चिड़िया के अपने-अपने पंख होते हैं।”

आगे की राह: टकराव या समझौता?

तो अब सवाल ये है कि आगे क्या? एक तरफ तो परंपरा है जिसे बदलना मुश्किल लगता है, दूसरी तरफ विज्ञान है जो साफ-साफ चेतावनी दे रहा है। और हां, सुरक्षा का मामला तो अलग ही है।

शायद सरकार को नए guidelines लाने चाहिए। पर क्या लोग मानेंगे? ये तो वक्त ही बताएगा। एक बात तो तय है – अगर हमें प्रगति करनी है तो blind faith और तर्क के बीच संतुलन बिठाना ही होगा।

आखिर में एक सवाल आपसे – क्या आपको लगता है कि परंपराओं को बदलते वक्त के साथ ढालना चाहिए? या फिर उन्हें वैसे ही कायम रखना चाहिए? कमेंट में जरूर बताइएगा!

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Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com

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