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“3 नए आपराधिक कानून: अमित शाह का बड़ा दावा – अब सुप्रीम कोर्ट तक न्याय मिलेगा सिर्फ 3 साल में!”

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3 नए आपराधिक कानून: क्या सच में 3 साल में मिलेगा सुप्रीम कोर्ट तक न्याय?

अरे भाई, अगर आपको कोई कहे कि अब सुप्रीम कोर्ट तक का केस सिर्फ 3 साल में निपट जाएगा, तो यकीन कर पाएंगे? मैं तो पहले-पहल सुनकर हंस दिया था। लेकिन गृह मंत्री अमित शाह जी ने आज यही दावा किया है! BNS, BNSS और BSA जैसे नए कानूनों के एक साल पूरे होने पर उन्होंने कहा कि अब न्यायिक प्रक्रिया में रफ्तार आएगी। सच कहूं तो, अगर ऐसा होता है तो ये वाकई क्रांतिकारी बदलाव होगा। पर सवाल यह है कि क्या ये सिर्फ दावा है या हकीकत बन पाएगा?

कॉलोनियल कानूनों को अलविदा

देखिए, हमारे पुराने IPC, CrPC वगैरह तो अंग्रेजों के जमाने के हैं – ठीक वैसे ही जैसे हमारे दफ्तरों की कुछ सोच अभी तक! 2023 में आए इन नए कानूनों का मकसद था न्याय प्रणाली को 21वीं सदी के लायक बनाना। डिजिटल सबूतों को मान्यता देना, तकनीक का इस्तेमाल – ये सब तो जरूरी था। लेकिन असल सवाल तो ये है कि क्या कागज पर लिखी बातें जमीन पर उतर पाएंगी?

क्या वाकई बदलेगी तस्वीर?

अमित शाह जी के मुताबिक तो हां। FIR से लेकर फैसले तक की पूरी प्रक्रिया अब सिर्फ 3 साल में! पर भईया, हमारे यहां तो कचहरियों में कुर्सियां तक पुरानी हैं। Fast-track कोर्ट बनाने की बात तो अच्छी है, लेकिन जजों की कमी का क्या? ईमानदारी से कहूं तो, तकनीक और कानून दोनों जरूरी हैं, पर उन्हें चलाने वाले हाथ भी तो चाहिए न?

क्या कह रहे हैं एक्सपर्ट्स?

यहां तो हर कोई अपनी-अपनी राग अलाप रहा है। सरकार वालों का कहना है कि ये “गेम-चेंजर” साबित होगा। विपक्ष वाले बता रहे हैं कि जल्दबाजी में लागू किया गया है। वकीलों की राय? कुछ कह रहे हैं “बहुत जरूरी कदम”, तो कुछ पूछ रहे हैं “इंफ्रास्ट्रक्चर कहां है?” सच तो ये है कि अभी तक सब सिर्फ अनुमान लगा रहे हैं। असली रिजल्ट तो तभी पता चलेगा जब ये सिस्टम पूरी तरह चलने लगेगा।

आगे का रास्ता

सरकार का प्लान तो बड़ा अच्छा है – 5 साल में पूरी तरह डिजिटल न्याय प्रणाली। पर जैसे मेरी दादी कहती थीं, “रोटी से पेट भरता है, नक्शे से नहीं।” कोर्ट की इमारतें, कर्मचारी, ट्रेनिंग – ये सब मिलकर ही तो सिस्टम चलाते हैं। एक तरफ तो ये सुधार वाकई जरूरी थे, लेकिन दूसरी तरफ इन्हें लागू करने की चुनौतियां भी कम नहीं हैं।

अंत में बस इतना कि अगर ये नए कानून ठीक से लागू हो जाएं, तो शायद हमारे बच्चों को वो दिन देखने को मिले जब “न्याय में देरी न्याय से इनकार” वाली कहावत इतिहास की बात बन जाए। पर फिलहाल? वेट एंड वॉच।

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1. भईया, ये तीन नए कानून आखिर हैं क्या? और इनकी ज़रूरत क्यों पड़ी?

देखिए, हमारे पुराने IPC, CrPC और Evidence Act को अब नए कपड़े पहनाए जा रहे हैं। असल में, ये नए कानून उनकी जगह लेंगे। सरकार का दावा है कि अब सुप्रीम कोर्ट तक न्याय पाने में 3 साल से ज़्यादा नहीं लगेंगे। अमित शाह जी तो यहां तक कह रहे हैं कि ये कानून हमारी न्याय प्रणाली को 21वीं सदी में ले जाएंगे। पर सवाल यह है कि क्या सच में ऐसा हो पाएगा?

2. क्या आम आदमी को इनसे कोई फायदा मिलेगा?

सच कहूं तो, सरकार तो बड़े-बड़े दावे कर रही है। कह रहे हैं कि अब FIR से लेकर ट्रायल तक सब कुछ digital होगा। मतलब आपको कोर्ट-कचहरी के चक्कर कम लगाने पड़ेंगे। समय और पैसा दोनों बचेगा। लेकिन याद रखिए, हम भारत में हैं – यहां हर नई चीज़ को अपनाने में वक्त लगता है।

3. पेंडिंग केस का क्या? क्या ये नए कानून उन्हें हल कर पाएंगे?

अरे भाई, ये तो बड़ा मसला है! सरकार कह रही है कि technology और fast-track courts की मदद से पेंडिंग केस कम होंगे। पर जानकारों की राय थोड़ी अलग है। उनका कहना है कि सिर्फ कानून बदलने से काम नहीं चलेगा। जजों की कमी, कोर्ट की कमी – इन सब पर भी तो ध्यान देना होगा न? वरना नए कानून भी पुरानी समस्याओं में फंस जाएंगे।

4. सजाओं में क्या बदलाव हुए हैं? खासकर महिलाओं और बच्चों के मामलों में?

अब यहां कुछ अच्छी खबर है। नए कानूनों में women और children के खिलाफ अपराधों की सजा और सख्त की गई है। साथ ही, mob lynching और organized crime जैसी चीज़ों को साफ-साफ परिभाषित किया गया है। मतलब अब ऐसे मामलों में दोषियों को बच पाना मुश्किल होगा। एक तरह से देखें तो ये सकारात्मक कदम है। लेकिन… हमेशा की तरह एक ‘लेकिन’ तो रहता ही है न?

Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com

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