पहलगाम नरसंहार का सच: अमित शाह ने संसद में खोली गुनहगारों की पोल, जानें हर बड़ी बात

पहलगाम नरसंहार का सच: अमित शाह ने संसद में खोली गुनहगारों की पोल

क्या आपको याद है वो 2017 का वह दर्दनाक दिन? जब कश्मीर की खूबसूरत वादियों में अमरनाथ यात्रियों के खून से पहलगाम की धरती लाल हो गई थी। और अब, सालों बाद, गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में एक ऐसा खुलासा किया जिसने सबको चौंका दिया। “ऑपरेशन सिंदूर” – ये दो शब्द शायद आज तक आपने नहीं सुने होंगे, लेकिन यही वो गुप्त मिशन था जिसने उन आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया जिन्होंने निर्दोष यात्रियों की हत्या की थी। सच कहूं तो, ये सिर्फ एक ऑपरेशन नहीं, बल्कि भारतीय सुरक्षा बलों की जबरदस्त सफलता की कहानी है। और हाँ, ये साबित करता है कि आतंकवाद के खिलाफ हमारी ‘जीरो टॉलरेंस’ पॉलिसी सिर्फ एक नारा नहीं है।

एक दर्दनाक अध्याय: पहलगाम नरसंहार

कश्मीर का इतिहास बहुत कुछ झेल चुका है, लेकिन 2017 की वो घटना अलग ही थी। लश्कर-ए-तैयबा और हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकियों ने सिर्फ इसलिए सात निर्दोष यात्रियों को मार डाला क्योंकि वो अमरनाथ यात्रा पर थे। है ना हैवानियत की हद? असल में देखा जाए तो इनका मकसद साफ था – डर फैलाना, धार्मिक उन्माद भड़काना। लेकिन ये लोग भूल गए कि भारत की सुरक्षा एजेंसियां उन्हें छोड़ने वाली नहीं हैं। और फिर शुरू हुआ एक चुपचाप चलने वाला ऑपरेशन, जिसके बारे में आज तक किसी को पता नहीं था।

ऑपरेशन सिंदूर: छुपी हुई सफलता की कहानी

अब सवाल यह उठता है – आखिर ये ऑपरेशन सिंदूर था क्या? दरअसल, ये वो मिशन था जिसके बारे में न तो मीडिया को पता था, न ही आम जनता को। इंटेलिजेंस ब्यूरो, CRPF के कमांडो और स्थानीय पुलिस की मिली-जुली टीम ने इसे अंजाम दिया। अमित शाह ने संसद में जो बताया, वो सुनकर लगता है जैसे कोई सस्पेंस थ्रिलर सुन रहे हों – सभी आरोपी या तो ‘एनकाउंटर’ में ढेर हो गए या फिर जेल की हवा खा रहे हैं। और यहाँ सबसे जरूरी बात? ये साफ संदेश गया कि भारत की सीमाओं में आतंकवाद के लिए कोई जगह नहीं है। एकदम साफ।

राजनीतिक भूचाल और सामाजिक प्रतिध्वनियाँ

जाहिर है, ऐसे बड़े खुलासे के बाद राजनीति गर्माने वाली ही थी। प्रधानमंत्री मोदी ने तो तुरंत ट्वीट कर दिया कि “देश की सुरक्षा हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है।” लेकिन विपक्ष? उन्हें हर चीज में राजनीति दिखती है। कुछ नेताओं ने ऑपरेशन के टाइमिंग पर सवाल उठा दिए, मानो आतंकवाद से निपटने का भी कोई ‘सही समय’ होता है! पर सबसे मार्मिक थीं पीड़ित परिवारों की आवाज़ें – जिन्होंने न्याय पाकर राहत तो जताई, लेकिन साथ ही मांग की कि आतंकवाद के खिलाफ और सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। और सच कहूं तो, उनकी ये मांग बिल्कुल जायज है।

भविष्य की राह: सुरक्षा से लेकर कूटनीति तक

तो अब आगे क्या? सूत्रों की मानें तो कश्मीर घाटी में और भी बड़े ऑपरेशन्स की तैयारी चल रही है। राजनीतिक विश्लेषक कह रहे हैं कि ये सरकार के लिए एक बड़ी छवि निर्माण की घटना साबित होगी। और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर? पाकिस्तान के लिए मुश्किलें बढ़ने वाली हैं, खासकर FATF जैसे मंचों पर। एक तरफ तो ये ऑपरेशन एक न्यायिक समापन है, लेकिन दूसरी तरफ ये भविष्य के लिए एक चेतावनी भी है – भारत अब चुपचाप मगर मजबूती से जवाब देगा। पहलगाम के शहीदों को मिला ये न्याय, शायद आने वाले समय के लिए एक मिसाल बन जाए।

अंत में बस इतना कि… ये सिर्फ एक ऑपरेशन की कहानी नहीं है। ये उस नए भारत की कहानी है जो आतंकवाद को माफ नहीं करेगा। जहां सुरक्षा बल चुपचाप काम करेंगे, लेकिन नतीजा हमेशा निर्णायक होगा। और हाँ, ये उन सात निर्दोष जिंदगियों को सच्ची श्रद्धांजलि भी है। सच में।

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अमित शाह का वो संसदीय बयान… सुनकर ऐसा लगा जैसे पहलगाम की उस काली रात फिर से आँखों के सामने घूम गई। सच कहूँ तो, ये सिर्फ एक नरसंहार नहीं था – ये तो हमारी सुरक्षा व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान था। और हाँ, इसने उन देशद्रोहियों की असली मंशा भी बेपर्दा कर दी, है न?

अब सोचने वाली बात ये है कि हम इससे क्या सीखें? मेरा मानना है कि सच को समझना तो पहला कदम है, लेकिन असली मुश्किल काम है आतंकवाद के खिलाफ डटकर खड़े रहना। ये कोई फिल्मी डायलॉग नहीं, बल्कि हकीकत है जिससे हर भारतीय को रूबरू होना पड़ेगा।

इस लेख में हम जानेंगे…

पहलगाम नरसंहार – वो सवाल जो अक्सर दिमाग में आते हैं

पहलगाम नरसंहार क्या था और कब हुआ था?

देखिए, ये वो घटना है जिसे भूल पाना मुश्किल है। 20 जून 2000 की वो काली रात जब कश्मीर के पहलगाम में Lashkar-e-Taiba के आतंकियों ने 35 मासूम तीर्थयात्रियों को मौत के घाट उतार दिया। सच कहूं तो, उस वक्त पूरे देश का दिल दहल गया था। आज भी याद करके रूह कांप जाती है।

अमित शाह ने संसद में इस मामले पर क्या रखी बातें?

असल में बात ये है कि गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में जो कहा, वो काफी चौंकाने वाला था। उन्होंने साफ-साफ कहा कि उस वक्त की कांग्रेस सरकार ने मामले को ठीक से हैंडल ही नहीं किया। और तो और, सच्चाई को दबाने की कोशिश हुई। है ना हैरान कर देने वाली बात?

इस मामले में कौन-कौन लोग शामिल थे?

सुनिए, इसमें तो Lashkar-e-Taiba के कई बड़े आतंकी शामिल थे – अबू उमर, अबू अकरम जैसे नाम सामने आए। पर ये तो बस टॉप लेवल के नाम हैं। स्थानीय स्तर पर भी कुछ लोग इनकी मदद कर रहे थे, जिन्हें बाद में पकड़ा गया। लेकिन सच तो ये है कि कई लोग अभी भी फरार हैं।

क्या किसी को सजा मिली इस मामले में?

तो देखिए, कुछ आरोपियों को तो सजा हुई है, ये सच है। लेकिन असली सवाल ये है कि क्या सभी दोषियों को सजा मिल पाई? अमित शाह जी ने हाल ही में संकेत दिया है कि मोदी सरकार इस मामले को फिर से खोलने पर विचार कर रही है। अगर ऐसा हुआ तो शायद न्याय की एक नई उम्मीद जगेगी। वैसे भी, इतने बड़े मामले में देरी से ही सही, पर न्याय तो मिलना ही चाहिए। सही कहा ना?

Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com

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