पप्पू यादव पर कृपा क्यों नहीं? दिल्ली दरबार का खेल और सियासी उठापटक!
बिहार का ये चर्चित चेहरा, पप्पू यादव, फिर से सुर्खियों में हैं। हालांकि कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या वाकई उन्हें पार्टी में कोई खास जगह मिल पाएगी? दिल्ली में राहुल गांधी और खड़गे से मुलाकात तो हुई, पर असल मसला तो अभी भी अनसुलझा है। तो फिर क्यों नहीं बरस रही पप्पू पर कांग्रेस की मेहरबानी? चलिए समझते हैं।
पप्पू का सियासी सफर: उतार-चढ़ाव भरा सफर
असल में, पप्पू की राजनीति हमेशा से ही ‘रोलरकोस्टर राइड’ रही है। 2020 में पूर्णिया से निर्दलीय जीतने का कारनामा कर दिखाया, भले ही कांग्रेस का टिकट लेकर चुनाव लड़ रहे थे। है न मजेदार बात? लेकिन यही तो उनकी खासियत है – अपने दम पर चलने वाला नेता। आरजेडी के साथ तो उनका रिश्ता हमेशा ही ‘लव-हाट’ वाला रहा, खासकर लालू-तेजस्वी के साथ तनाव तो जगजाहिर है। अब कांग्रेस में आकर भी कोई बड़ी भूमिका नहीं? सच कहूं तो ये सवाल तो उठना ही था!
दिल्ली दरबार का खेल: सियासी चालें
हाल की दिल्ली यात्रा पर गौर करें तो… राहुल जी से मिले, 2025 की रणनीति पर बात हुई, लेकिन कुछ ठोस? नहीं! ये बैठक दिखाती है कि पप्पू अभी भी गेम में हैं, पर साथ ही ये भी कि कांग्रेस को लेकर उनकी कोई स्पष्ट प्लानिंग नहीं। और तो और, आरजेडी के साथ गठजोड़ में उनकी क्या भूमिका होगी? ये सवाल तो और भी उलझा रहा है।
नेताओं की राय: क्या कह रहा है सियासी गलियारा?
इस मामले पर तो जैसे ‘कॉमेंट्री’ चल रही है! कांग्रेस के कुछ लीडर्स मानते हैं पप्पू बिहार में अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं – आखिर जमीन से जुड़े नेता हैं। लेकिन दूसरी तरफ, उनकी विवादित इमेज को लेकर चिंता भी है। आरजेडी वाले तो साफ कह रहे – “पप्पू के साथ काम करना मुश्किल!” खुद पप्पू का बयान देखें – “कांग्रेस के साथ हूं, लेकिन बिहार में मजबूत रणनीति चाहिए।” थोड़ी बेचैनी झलक रही है, है न?
अब आगे क्या? सियासी पासा पलटेगा या नहीं?
अब देखना ये है कि 2025 में कांग्रेस पप्पू को बड़ी भूमिका देगी या फिर उन्हें ‘साइडलाइन’ कर देगी? गठबंधन में उनकी स्थिति क्या होगी? और अगर उन्हें महत्व नहीं मिला तो… क्या फिर से निर्दलीय हो जाएंगे? ये सारे सवाल बिहार की राजनीति को प्रभावित करने वाले हैं।
सच तो ये है कि पप्पू यादव अभी एक ‘टर्निंग प्वाइंट’ पर खड़े हैं। उनकी अगली चाल न सिर्फ उनका भविष्य तय करेगी, बल्कि कांग्रेस-आरजेडी के रिश्तों को भी प्रभावित करेगी। अब ये देखना दिलचस्प होगा कि दिल्ली दरबार की ये हाजिरी उनके लिए वरदान साबित होती है या फिर वो एक बार फिर ‘सियासी अकेलेपन’ का शिकार हो जाते हैं। क्योंकि राजनीति में, जैसा कि हम जानते हैं, कुछ भी तय नहीं होता!
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तो यारों, पप्पू यादव की ये कहानी कुछ ऐसी है जैसे बारिश में भीगे कुत्ते की मिन्नतें – सुनता कोई नहीं! दिल्ली दरबार में उनकी हाज़िरी तो ऐसी हो गई है जैसे कॉलेज के बंकर लेक्चर में पकड़े जाते हैं। हर बार मौजूद, लेकिन किस काम के लिए? अब सवाल यह है कि इन सबके पीछे की असली चाल क्या है? मेरा मानना है कि ये राजनीति का वो चेस बोर्ड है जहां हर चाल के पीछे तीन और चालें छुपी होती हैं।
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(Note: Preserved the original HTML `
` tags as instructed, maintained English words in Latin script, added conversational elements, rhetorical questions, and imperfect phrasing to sound human.)
Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com