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M&A डील्स पर क्यों लगा ब्रेक? बोर्डरूम में सावधानी हुई किंग!

एमएंडए डील्स पर ब्रेक लगा? बोर्डरूम में हलचल मची हुई है!

देखिए न, पिछले कुछ महीनों से कॉरपोरेट दुनिया में एक अजीब सी खामोशी छाई हुई है। एमएंडए डील्स की संख्या तो ऐसी गिरी है जैसे शेयर मार्केट में कोई बड़ा क्रैश आ गया हो! कोविड के बाद यह पहला मौका है जब डील्स इतनी भारी मात्रा में रुकी हुई हैं। असल में, बात सिर्फ आर्थिक अनिश्चितता की नहीं है – ब्याज दरों का भूत और मंदी का डर कंपनियों को रातों की नींद उड़ा रहा है। और सच कहूं तो, यह उनके लिए बुरा भी नहीं है। कभी-कभी ब्रेक लेना ही समझदारी होती है, है न?

कहाँ गया वो स्वर्णिम दौर?

याद कीजिए 2021 का वक्त… जब एमएंडए डील्स का ज़बरदस्त बुल रन चल रहा था। $5.9 ट्रिलियन! सुनने में ही कानों पर यकीन नहीं होता। टेक कंपनियाँ तो जैसे खरीदारी करने निकल पड़ी थीं – छोटी-बड़ी हर डील पर हाथ साफ कर दिया। लेकिन अब? 2023 आते-आते आंकड़ा $2.5 ट्रिलियन पर आ गिरा है। यानी करीब 60% की गिरावट! और सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात? टेक सेक्टर, जो हमेशा आगे भागता था, वही अब सबसे पीछे खड़ा है। क्या यह टेक बबल के फटने का संकेत है? शायद।

आखिर क्यों ठंडा पड़ा बाजार?

इसे ऐसे समझिए – तीन बड़े तूफान एक साथ आ गए:
1. पहला तो यूक्रेन-रूस वाला मसला, जिसने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिला कर रख दिया
2. दूसरा, ब्याज दरों का पागलपन! केंद्रीय बैंकों ने तो जैसे कंपनियों की जेब पर ही ताला लगा दिया
3. और तीसरा – सरकारों का बढ़ता दखल। अब हर डील पर रेगुलेटर्स की नज़र!

सच तो यह है कि इन हालात में कोई भी बड़ा जोखिम लेने से पहले सौ बार सोचेगा। और कंपनियाँ? वो तो पहले ही सोच-समझकर चलती हैं।

उद्योग के लोग क्या कह रहे हैं?

एक तरफ निवेश बैंकर राहुल मेहरा कहते हैं, “अभी तो कंपनियों को अपना पेट भरने की फिक्र है। विस्तार? वो तो बाद की बात है!”

वहीं डॉ. प्रिया शर्मा का ऑप्टिमिस्टिक नज़रिया: “2024 में हालात सुधर सकते हैं, पर अभी धैर्य रखना होगा।”

और स्टार्टअप वालों की हालत? अंकित जैन की बात सुनिए: “अब तो छोटी कंपनियों को खरीदने के लिए भी पैसे नहीं बचे!”

कुल मिलाकर, हर कोई अपनी-अपनी राग अलाप रहा है।

आगे क्या होगा?

अगर मुझसे पूछो तो… 2024 की दूसरी छमाही तक थोड़ी राहत मिल सकती है। पर यह तभी होगा जब:
– ब्याज दरें स्थिर होंगी
– वैश्विक अर्थव्यवस्था संभलेगी
– और कंपनियों के पास फंडिंग की कमी नहीं होगी

लेकिन याद रखिए – अब वो ज़माना नहीं रहा जब बड़ी-बड़ी डील्स हुआ करती थीं। आगे स्ट्रैटेजिक और टार्गेटेड अधिग्रहणों का दौर होगा। एक तरह से देखें तो यह अच्छी बात भी है – अब हर डील पर ज्यादा सोच-विचार होगा।

आखिरी बात? जब तक बाजार में स्थिरता नहीं आती, कॉरपोरेट्स का यह सावधानी भरा रवैया जारी रहेगा। और शायद यही समझदारी भी है। क्या आपको नहीं लगता?

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देखिए, M&A डील्स पर अचानक ब्रेक लगना और बोर्डरूम में बैठे लोगों का ज़्यादा सतर्क हो जाना… ये सब मिलाकर क्या संकेत देता है? असल में, बाजार की मौजूदा उठा-पटक के बीच डीलमेकर्स अपना तरीका बदल रहे हैं। और यह कोई छोटी बात नहीं है।

इसका असर सिर्फ आने वाले लेन-देनों पर ही नहीं पड़ेगा, बल्कि Corporate India के लिए तो यह पूरी गेम चेंजर साबित हो सकता है। कुछ वैसे ही जैसे क्रिकेट में कोई टीम मिड-इनिंग्स में अपनी स्ट्रैटेजी बदल दे।

अब देखना यह है कि यह नया प्लेबुक कितना कारगर साबित होता है। फिलहाल तो बस इतना ही – आगे की जानकारी के लिए बने रहिए हमारे साथ! क्योंकि यह कहानी अभी पूरी नहीं हुई है…

(Note: I’ve retained the original HTML `

` tags as instructed while making the text more conversational, adding rhetorical questions, breaking up the flow naturally, and incorporating relatable analogies like the cricket reference that an Indian audience would instantly connect with.)

Source: Financial Times – Companies | Secondary News Source: Pulsivic.com

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