PM मोदी को मिला बड़ा मौका, या फिर एक चुनौती? शिवसेना के संजय निरुपम ने भारत-चीन रिश्तों पर क्या कहा, जानिए
अच्छा, तो भारत और चीन के बीच फिर से कुछ दिलचस्प होने वाला है? शिवसेना के नेता संजय निरुपम ने आज एक ऐसा बयान दिया है जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। उन्होंने PM मोदी के संभावित चीन दौरे को लेकर कहा कि ये एक “सुनहरा मौका” हो सकता है। सीमा विवाद से लेकर trade तक के मुद्दों को सुलझाने का। लेकिन सच कहूं तो, ये इतना आसान भी नहीं होगा। खासकर तब, जब गलवान जैसी घटनाएं अभी भी हमारी यादों से मिटी नहीं हैं।
क्या सच में बदल सकते हैं हालात? पहले समझिए पूरा कॉन्टेक्स्ट
देखिए, भारत और चीन का रिश्ता तो वैसे भी कभी सरल नहीं रहा। 2020 की गलवान घटना ने तो जैसे पूरी तस्वीर ही बदल दी। उसके बाद से डोकलाम, trade imbalance – न जाने कितने मुद्दे जुड़ते चले गए। हालांकि, ये भी सच है कि पिछले कुछ महीनों में दोनों तरफ से बातचीत की कोशिशें हुई हैं। पर सवाल ये है कि क्या सच में कोई ठोस नतीजा निकल पाएगा? संजय निरुपम जी ने तो अपनी बात रख दी, अब देखना है दिल्ली और बीजिंग क्या फैसला करते हैं।
निरुपम ने क्या सुझाव दिया? राजनीति से ज्यादा राजनयिक समाधान पर जोर
असल में बात ये है कि शिवसेना नेता ने तीन बड़े मुद्दों पर focus किया – सीमा सुरक्षा, trade balance और regional cooperation। उनका कहना है कि “अब पुराने tensions को भूलकर future की तरफ देखने का वक्त आ गया है।” एक तरह से confidence-building measures की बात की है। लेकिन यहां सवाल ये उठता है कि क्या चीन भी ऐसा ही सोचता है? क्योंकि बिना दोनों तरफ के सहयोग के, ये सब बातें सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह जाएंगी।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं: किसने क्या कहा?
अब तो मजा देखिए – एक ही पार्टी के भीतर अलग-अलग राय! कुछ नेता निरुपम के साथ हैं, तो कुछ चीन के मामले में और सतर्कता चाहते हैं। कांग्रेस वाले तो सीधे सरकार से पूछ रहे हैं – “भईया, क्या कोई clear policy है भी आपके पास?” Foreign policy experts की राय थोड़ी balanced है। उनका मानना है कि अगर ये दौरा होता है तो नई शुरुआत हो सकती है, पर चीन से concrete action की उम्मीद भी जताई है। समझदारी की बात है।
अब आगे क्या? संभावनाएं हैं, पर चुनौतियां भी कम नहीं
सच बताऊं तो अभी तक तो PM मोदी के चीन दौरे की कोई official confirmation नहीं हुई है। लेकिन analysts की मानें तो अगर ये visit होता है, तो Asia-Pacific region के strategic balance से लेकर हमारे trade deficit तक – हर मुद्दे पर गंभीर चर्चा होगी। और हां, border infrastructure का मसला तो रहेगा ही। फिलहाल तो सभी की नजरें दोनों देशों के foreign ministries पर टिकी हैं।
तो दोस्तों, निष्कर्ष ये कि संजय निरुपम के इस बयान ने एक नई बहस तो छेड़ दी है। पर असली सवाल ये है कि क्या ये diplomatic initiative सफल हो पाएगी? क्या चीन के साथ हमारे तनाव कम होंगे? या फिर ये सब सिर्फ दिखावा रह जाएगा? वक्त ही बताएगा। फिलहाल तो हमें wait and watch की पॉलिसी पर ही चलना होगा। क्या कहते हैं आप?
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PM मोदी का चीन दौरा… अब यह तो वक्त ही बताएगा कि क्या यह भारत-चीन के बीच वाकई में एक नया रिश्ता बनाएगा। लेकिन संजय निरुपम जैसे नेताओं के सकारात्मक बयानों से एक बात तो साफ है – दोनों तरफ से कोशिश जारी है। सच कहूँ तो, ये दोनों देश एक-दूसरे के बिना रह भी नहीं सकते, चाहे जितने मतभेद हों। बिल्कुल वैसे ही जैसे पड़ोसी – लड़ाई-झगड़े होते रहते हैं, मगर साथ भी रहना पड़ता है।
अब सवाल यह है कि क्या यह दौरा सिर्फ एक औपचारिकता होगी या फिर कुछ ठोस नतीजे निकलेंगे? देखिए, चीन के साथ तालमेल बिठाना कोई आसान बात तो है नहीं… पर PM मोदी की कूटनीतिक सूझ-बूझ पर भरोसा कर सकते हैं। उनका रिकॉर्ड तो अच्छा रहा है। हालांकि, यहाँ सिर्फ सरकारें ही नहीं, बल्कि आम जनता की भावनाएँ भी मायने रखती हैं। और वहाँ थोड़ा पेचीदा हाल है।
एक तरफ तो आर्थिक सहयोग के मौके हैं, दूसरी तरफ सीमा विवाद जैसे पुराने मुद्दे भी हैं। बैलेंस बनाना होगा। पर यकीन मानिए, अगर यह दौरा सफल रहा तो… game changer हो सकता है। बस, अब इंतज़ार की घड़ी है।
Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com