POTA कानून: क्या सच में ये सिर्फ राजनीति का खेल था?
अरे भाई, भारतीय राजनीति में POTA (Prevention of Terrorism Act) का मुद्दा फिर से गरमा गया है। और इस बार गृहमंत्री अमित शाह ने कांग्रेस को घेरने के लिए इसे बिल्कुल सही मौका समझा। लोकसभा में उनका भाषण सुनकर तो लगा जैसे 2004 का पूरा घटनाक्रम फिर से जीवंत हो उठा। पर सवाल यह है कि क्या सच में POTA का खात्मा सिर्फ राजनीतिक फायदे के लिए किया गया था? या फिर इसमें कुछ और ही बात थी?
POTA की कहानी: जब संसद पर हमले ने बदल दी कानून की दिशा
याद है ना वो 2001 का संसद हमला? उसके ठीक बाद अटल जी की सरकार ने POTA लाया था। असल में, ये कानून आतंकवाद से लड़ने के लिए एक तरह का ‘सुपरवेपन’ था। इसमें क्या-क्या खास था? चलिए समझते हैं:
– आतंकवादियों को 180 दिन तक बिना चार्जशीट के रोक सकते थे
– विशेष अदालतों में तेज सुनवाई
– संदिग्ध संगठनों पर आसानी से प्रतिबंध
पर यहां एक दिक्कत थी। कुछ मामलों में ये कानून ‘हथियार’ की जगह ‘दुरुपयोग का औजार’ बन गया। खासकर अल्पसंख्यकों के खिलाफ। और फिर 2004 में कांग्रेस ने इसे खत्म कर दिया। उनका तर्क? “इंसाफ के नाम पर नाइंसाफी हो रही थी।”
अमित शाह का वार: क्या सच में POTA के जाने से बढ़ा आतंकवाद?
अब अमित शाह जी ने तो लोकसभा में ऐसी बातें कहीं कि सुनकर कांग्रेस वालों के पसीने छूट गए होंगे। उनका सीधा आरोप – “26/11 जैसी घटना POTA खत्म करने का नतीजा थी।” थोड़ा कड़वा लगता है ना? पर क्या ये पूरी तरह सच है?
देखिए, एक तरफ तो शाह साहब का कहना है कि UAPA भी कमजोर नहीं है। पर दूसरी तरफ वो POTA के खात्मे को राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता बता रहे हैं। थोड़ा उलझन वाली बात है, है ना?
राजनीति का पेंच: कौन सही, कौन गलत?
अब यहां दोनों पक्षों के तर्क सुनिए:
भाजपा: “सुरक्षा पहले, बाकी बातें बाद में”
कांग्रेस: “कानून का दुरुपयोग नहीं चलेगा”
और बीच में फंसे हैं आम नागरिक। जो चाहते हैं कि न तो आतंकवादी खुले घूमें, न ही मासूमों को परेशान किया जाए। मुश्किल सवाल है ये।
2024 की राजनीति: क्या POTA बनेगा चुनावी मुद्दा?
अब तो ये लग रहा है कि 2024 के चुनावों में ये मुद्दा गरमा सकता है। भाजपा इसे ‘सुरक्षा बनाम वोट बैंक’ के रूप में पेश कर सकती है। वहीं विपक्ष UAPA को ही पर्याप्त बताएगा।
और हां, सुप्रीम कोर्ट में लंबित POTA के कुछ मामले भी अचानक से जीवित हो सकते हैं। राजनीति है भाई, कुछ भी हो सकता है!
अंत में एक सवाल – क्या हम कभी ऐसा कानून बना पाएंगे जो आतंकवाद से भी लड़े और निर्दोषों को भी सुरक्षा दे? सोचने वाली बात है… फिलहाल तो ये बहस ठंडी होती नहीं दिख रही।
POTA कानून… यह नाम सुनते ही कई सवाल दिमाग में आने लगते हैं। आखिर यह कानून इतना विवादास्पद क्यों रहा? और अचानक से यह मुद्दा फिर से चर्चा में कैसे आ गया? देखा जाए तो अमित शाह का कांग्रेस पर हालिया हमला सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी नहीं था – इसने एक पुराने घाव को फिर से हरा कर दिया।
असल में, POTA के बारे में बात करना सिर्फ एक कानून की चर्चा नहीं है। यह उस पूरे दौर की बात है जब देश की सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के बीच तनाव चरम पर था। ईमानदारी से कहूं तो, आज भी इस पर बहस होती है कि क्या यह कदम सही था या गलत।
लेकिन चलिए, इसे थोड़ा आसान भाषा में समझते हैं। यह आर्टिकल आपको POTA से जुड़े सभी पहलुओं – इतिहास, विवाद, और राजनीति – सब कुछ बताएगा। और हां, अंत तक बने रहिएगा, क्योंकि कुछ बातें आपको हैरान कर सकती हैं। पढ़ने के लिए शुक्रिया दोस्तों!
(Note: I’ve maintained the original HTML paragraph tags while completely rewriting the content in a more human, conversational style with rhetorical questions, casual connectors, and slight imperfections to mimic natural writing.)
Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com