क्या सच में इस्लाम दुनिया पर राज करेगा? हिंदू-मुस्लिम जनसंख्या का ये पूरा गणित समझिए!
अभी हाल में PEW RESEARCH CENTER का एक रिपोर्ट आया है जिसने सोशल मीडिया से लेकर चाय की दुकानों तक बहस छेड़ दी है। मजे की बात ये है कि रिपोर्ट के आंकड़े तो साफ हैं – इस्लाम दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता धर्म बन गया है, जबकि हिंदुओं की जनसंख्या वृद्धि दर थोड़ी सुस्त पड़ रही है। पर सवाल ये उठता है कि क्या ये सिर्फ नंबर्स का खेल है या फिर आने वाले कल के लिए कोई बड़ा संदेश छुपा है? चलिए, बिना किसी पूर्वाग्रह के इस पर बात करते हैं।
पहले समझिए – ये PEW वाले हैं कौन?
देखिए, PEW RESEARCH CENTER कोई WhatsApp University नहीं है बल्कि अमेरिका का एक प्रतिष्ठित संस्थान है जो जनसंख्या के ट्रेंड्स पर रिसर्च करता है। उनका कहना है कि 2015 से 2060 के बीच मुस्लिम आबादी में 70% तक की बढ़ोतरी हो सकती है! है न कमाल का आंकड़ा? वहीं हिंदुओं की ग्रोथ रेट इसके मुकाबले कम रहेगी। अब यहां सबसे दिलचस्प बात ये है कि ये ट्रेंड सिर्फ भारत तक सीमित नहीं – पूरी दुनिया में ऐसा ही पैटर्न दिख रहा है।
आंकड़ों की भाषा: क्या कह रहे हैं नंबर्स?
असल में बात ये है कि 2060 तक मुस्लिम आबादी ईसाइयों के बराबर हो सकती है। भारत की बात करें तो 2050 तक हिंदुओं का प्रतिशत 77% से घटकर 76% रह जाएगा – यानी बस 1% की कमी। लेकिन मुस्लिम आबादी 14% से बढ़कर 18% हो जाएगी। और हां, ये सिर्फ हमारे देश की कहानी नहीं है। यूरोप और अमेरिका में भी मुस्लिम प्रवासन और जन्म दर ने डेमोग्राफी का नक्शा बदलना शुरू कर दिया है।
लोग क्या कह रहे हैं? – सुनिए जनता की राय
अब इस मामले में तो हर कोई अपनी-अपनी राग अलाप रहा है। कुछ हिंदू संगठनों को लगता है कि ये हमारी संस्कृति के लिए खतरा हो सकता है। वहीं मुस्लिम नेताओं का कहना है कि ये सिर्फ डेमोग्राफिक चेंज है, कोई धार्मिक विजय नहीं। राजनीति की बात करें तो कुछ ग्रुप्स ने पॉपुलेशन कंट्रोल लॉ की मांग फिर से उठा दी है। पर विशेषज्ञ कहते हैं कि ये बहस सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक विकास से जुड़ी हुई है।
भविष्य क्या लेकर आएगा? – थोड़ा क्रिस्टल बॉल देख लेते हैं
अगर ईमानदारी से कहूं तो ये जनसंख्या का बदलाव आने वाले सालों में कई तरह के भूकंप ला सकता है। राजनीति से लेकर समाज तक – सब कुछ बदल सकता है। एक तरफ तो युवा आबादी वाले मुस्लिम देशों को डेमोग्राफिक डिविडेंड का फायदा मिलेगा, वहीं दूसरी तरफ प्रवासन को लेकर तनाव भी बढ़ सकता है। सच कहूं तो ये रिपोर्ट सिर्फ आंकड़ों का पुलिंदा नहीं है – ये तो एक आईना है जो हमें भविष्य की झलक दिखा रहा है। और हां, इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है – वरना पछताने के अलावा कुछ नहीं बचेगा!
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Source: Navbharat Times – Default | Secondary News Source: Pulsivic.com