शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का बयान: ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द पर बवाल या सच्चाई?
अरे भाई, क्या बात कर दी शंकराचार्य जी ने! देश के सबसे प्रभावशाली धर्मगुरुओं में से एक, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने ऐसा बयान दिया है जिसने सियासत की चूलें हिला दी हैं। असल में बात ये है कि उन्होंने मुंबई के उन दर्दनाक हमलों – 1993 और 2008 वाले – को याद दिलाते हुए सवाल किया है कि क्या “भगवा आतंकवाद” जैसे शब्द सच में कोई मायने रखते हैं? या फिर ये सिर्फ देश को बांटने की साजिश है? बात तो सही लगती है ना – आखिर आतंक का कोई धर्म थोड़े ही होता है!
पुराने ज़ख्मों को कुरेदती यादें
देखिए, मुंबई के वो काले दिन याद हैं ना आपको? 2008 में जब Lashkar-e-Taiba के आतंकियों ने ताज होटल और CST को निशाना बनाया था। 166 बेगुनाहों की जान गई थी। और उससे पहले 1993 के ब्लास्ट? अरे भगवान! 250 से ज़्यादा लोग… Dawood Ibrahim का नाम तो हर कोई जानता है। पर सवाल ये है कि इतने साल बाद भी क्या हम सच में इंसाफ दिला पाए हैं? या फिर नए-नए टैग लगाकर मामलों को उलझाया जा रहा है?
और हां, पिछले कुछ सालों से “भगवा आतंकवाद” शब्द किसी फैशन स्टेटमेंट की तरह इस्तेमाल हो रहा है। शंकराचार्य जी ने इसे सीधे-सीधे देश की एकता के लिए खतरा बताया है। सोचिए, क्या सच में ऐसा है?
सरकार पर सीधा निशाना: क्या सचमुच विफल रही प्रशासन?
अब शंकराचार्य जी ने जो बातें कही हैं, वो सुनने लायक हैं। उनका सीधा सवाल है – “क्या सरकार और पुलिस आतंकियों को पकड़ने में नाकाम रही है?” और देखिए न, ये “भगवा आतंकवाद” वाला टर्म कहीं हमें धर्म के नाम पर तो नहीं बांट रहा? एक तरफ तो हम सब ‘सबका साथ, सबका विकास’ की बात करते हैं, दूसरी तरफ ऐसे शब्दों से समाज में दरार पैदा हो रही है। क्या ये दोहरा खेल नहीं है?
राजनीति गरमाई: किसने क्या कहा?
अब तो मज़ा आ गया! BJP के कुछ नेताओं ने शंकराचार्य जी की बात को पूरी तरह सपोर्ट किया है। वहीं Congress वालों का कहना है कि आतंकवाद चाहे किसी भी रंग का हो, उसकी निंदा होनी चाहिए। सच कहूं तो दोनों ही पक्ष सही लगते हैं, है ना?
और भई, social media तो आग लगा रहा है! #भगवा_आतंकवाद और #सरकार_विफल ट्रेंड कर रहे हैं। कुछ लोग कह रहे हैं धर्म से आतंकवाद को जोड़ना गलत है, तो कुछ का कहना है कि सभी प्रकार के आतंकवाद को एक नज़र से देखना चाहिए। आपकी क्या राय है?
आगे क्या? क्या बदलेगा?
अब सवाल ये है कि इस सबके बाद क्या होगा? मेरे ख्याल से तो सरकार पर पुराने केस फिर से खोलने का दबाव बढ़ेगा। और अगले चुनावों को देखते हुए तो ये मुद्दा और भी गरमा सकता है। एक बात तो तय है – अब धर्मगुरुओं और नेताओं की ज़िम्मेदारी और बढ़ गई है।
अंत में: सवाल बड़ा, जवाब कौन देगा?
सच पूछो तो शंकराचार्य जी ने ऐसे सवाल उठाए हैं जिनसे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। ये सिर्फ एक शब्द की बहस नहीं है, बल्कि देश की सुरक्षा और एकता का सवाल है। असल में देखा जाए तो आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में एकता ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है। पर सवाल ये है कि क्या हम सच में एकजुट हो पाएंगे? या फिर नए-नए लेबल्स से बंटते रहेंगे?
क्या सोचते हैं आप? कमेंट में बताइएगा ज़रूर!
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Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com
