सुप्रीम कोर्ट लोकतांत्रिक ताकतों पर ‘परमाणु मिसाइल’ क्यों नहीं दाग सकता? – उपराष्ट्रपति धनखड़ का बड़ा बयान
अरे भाई, भारतीय राजनीति में तो बम फट गया! उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने न सिर्फ इस्तीफा दिया, बल्कि सुप्रीम कोर्ट को लेकर ऐसा बयान दे मारा कि सबके होश उड़ गए। असल में बात ये है कि उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को लोकतांत्रिक संस्थाओं पर “परमाणु मिसाइल” चलाने का हक नहीं है। सच कहूं तो, ये सिर्फ एक इस्तीफा नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर एक सवालिया निशान है। और देखिए न, इसने न्यायपालिका और सरकार के बीच की तनातनी को फिर से सुर्खियों में ला दिया है। भ्रष्टाचार, NJAC जैसे मुद्दे फिर से चर्चे में हैं।
मामले की पृष्ठभूमि: कहानी कुछ और ही है
देखिए, धनखड़ साहब पिछले कुछ महीनों से ही न्यायपालिका की आजादी और संसद के अधिकारों को लेकर बहस छेड़ रहे थे। याद है न वो अधजली नोटों वाला मामला? उसे उठाकर उन्होंने न्यायपालिका की पारदर्शिता पर सीधा सवाल खड़ा कर दिया था। और NJAC को लेकर तो उनका स्टैंड क्लियर था – उनका मानना था कि सुप्रीम कोर्ट ने संसद के अधिकारों में दखल दिया। वैसे ये कोई नई बात नहीं, 2015 से ही ये टेंशन चल रही है। पर इस बार बात कुछ ज्यादा ही गरम हो गई लगती है।
धनखड़ का बयान: बम का बटन दबा दिया!
अब ये इस्तीफा और साथ में दिया गया बयान… बस धमाका कर दिया! धनखड़ ने सीधे-सीधे न्यायपालिका की “अतिक्रमणकारी भूमिका” को टारगेट किया। उनका कहना था कि सुप्रीम कोर्ट को दूसरे संवैधानिक संस्थानों के काम में बेवजह टांग अड़ाने का हक नहीं। और वो “परमाणु मिसाइल” वाली लाइन… अरे भई, ये तो राजनीति के हर कोने में गूंज गई! खास बात ये कि ये बयान किसी और ने नहीं, बल्कि उपराष्ट्रपति ने दिया, जो राज्यसभा का सभापति भी होता है। यानी सीधे संवैधानिक पद से दिया गया ऐसा बयान!
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं: किसने क्या कहा?
अब इस पर राजनीतिक दलों की क्या प्रतिक्रिया आई? सरकारी तौर पर तो कोई बयान नहीं आया, पर कुछ मंत्रियों ने निजी तौर पर इसे “बहादुराना” बताया। वहीं विपक्ष तो मानो आग बबूला हो गया – इसे “संवैधानिक संकट” बता रहा है। सबसे मजेदार बात? सुप्रीम कोर्ट की चुप्पी! कुछ लोग इसे संयम मान रहे हैं, तो कुछ का कहना है कि शायद कोई बड़ा जवाब आने वाला है।
आगे क्या होगा? कयासबाजी जारी
तो अब सवाल ये है कि आगे क्या? उपराष्ट्रपति पद के लिए नए चुनाव की बात चल रही है। पर असल मुद्दा तो ये है कि क्या ये पूरा मामला न्यायपालिका और सरकार के बीच तनाव को और बढ़ाएगा? कुछ एक्सपर्ट्स तो “संवैधानिक संकट” की बात कर रहे हैं। और हां, ये मामला आने वाले दिनों में संसद और कोर्ट के बीच ताकतों के खेल को नई दिशा दे सकता है। खासकर तब, जब पहले से ही रिश्ते में खटास हो।
निष्कर्ष: क्या ये सिर्फ शुरुआत है?
सच कहूं तो, धनखड़ का ये कदम सिर्फ एक इस्तीफा नहीं है। ये तो भारतीय लोकतंत्र में चल रही उस बड़ी लड़ाई का हिस्सा लगता है, जहां अलग-अलग संस्थाएं अपने-अपने अधिकारों को लेकर खींचतान कर रही हैं। अभी तो शायद सिर्फ शुरुआत है। आने वाले दिन बताएंगे कि ये विवाद और बढ़ता है या फिर सब मिल-बैठकर कोई रास्ता निकाल लेते हैं। पर एक बात तो तय है – राजनीति का ये मैच अभी और देर तक चलने वाला है!
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उपराष्ट्रपति धनखड़ का यह बयान… वाह, बात तो सही में गंभीर है! एक बार फिर यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि लोकतंत्र में संस्थाएं कैसे एक-दूसरे के साथ तालमेल बिठाएं। सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर तो जैसे नए सिरे से बहस शुरू हो गई है।
अब सवाल यह है कि – न्यायपालिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीच का यह रिश्ता कैसा हो? मेरा मानना है कि सम्मान और सहयोग… ये दो शब्द ही पूरी बात समेट लेते हैं। बिल्कुल वैसे ही जैसे किसी घर में सभी सदस्यों का अपना-अपना रोल होता है।
और इसी के साथ एक और बात याद आती है – संविधान ने हर संस्था को एक सीमा दी है। ईमानदारी से कहूं तो, यही सीमाएं हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत हैं। पर क्या हम इसे समझ पा रहे हैं? हालांकि…
(एक छोटी सी सोचने वाली बात छोड़ दी है – आपको क्या लगता है?)
सुप्रीम कोर्ट और लोकतंत्र की ताकतें – जानिए क्या है पूरा मामला
अरे भाई, आजकल तो सुप्रीम कोर्ट और राजनीतिक नेताओं के बीच की बहस गर्मा गई है न? जैसे कोई क्रिकेट मैच चल रहा हो! तो चलिए, इस पूरे विवाद को आसान भाषा में समझते हैं।
1. उपराष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट को ‘परमाणु मिसाइल’ कह दिया – मतलब क्या?
देखिए, यहां बात बस इतनी सी है कि धनखड़ जी ने एक तीखा रूपक (metaphor) इस्तेमाल किया। असल में वो कहना चाहते थे कि अदालत को संसद के कामकाज में बहुत ज्यादा नहीं घुसना चाहिए। वरना? वरना यह लोकतंत्र के लिए… ठीक वैसा ही हो जाता है जैसे कोई बच्चा बाप को ही सबक सिखाने लगे। समझे न?
2. सच में क्या सुप्रीम कोर्ट संसद के फैसलों को रोक सकता है?
हां बिल्कुल! संविधान के अनुच्छेद 13 और 32 के तहत तो ये उसका अधिकार भी है। पर यहां एक ‘लेकिन’ जरूर है – judicial review की अपनी सीमाएं होती हैं। मतलब? मतलब ये कि अदालत को भी अपनी ताकत का इस्तेमाल समझदारी से करना चाहिए। बिना सोचे-समझे तो कुछ भी नहीं कर सकता कोई, है न?
3. इस बयान से राजनीति पर क्या असर पड़ेगा?
असल में तो ये बयान judiciary और legislature के बीच चल रही छिपी हुई तनातनी को सामने ला दिया है। अब देखना ये है कि… क्या इससे दोनों संस्थाओं के बीच और तनाव बढ़ेगा? या फिर ये बहस एक स्वस्थ चर्चा में बदल जाएगी? मेरी निजी राय? दोनों ही संस्थाओं को एक-दूसरे का सम्मान करते हुए काम करना चाहिए। बस!
4. क्या यह ‘separation of powers’ के सिद्धांत के खिलाफ है?
नहीं यार, बिल्कुल उल्टा! धनखड़ जी तो बस यही कह रहे हैं कि हर संस्था को अपने-अपने घर का काम देखना चाहिए। जैसे कि… मान लीजिए आपके घर में अलग-अलग कमरे हैं न? बेडरूम, किचन, ड्राइंग रूम। अब अगर कोई किचन में जाकर बेडरूम का काम करने लगे तो? वैसा ही कुछ। हर संस्था का अपना दायरा होता है। सीधी सी बात है न?
तो ये थी आज की चर्चा। कैसा लगा? कमेंट में जरूर बताइएगा। और हां, अगर कुछ समझ में नहीं आया हो तो पूछ लीजिएगा – मैं हूं ना! 😊
Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com