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भारत-पाकिस्तान संघर्ष में तालिबान की भूमिका: अफगानिस्तान की शतरंज बिसात कौन जीतेगा?

भारत-पाकिस्तान और तालिबान: अफगानिस्तान की जंग में कौन बनेगा बादशाह?

अभी कुछ दिन पहले की बात है – UNSC में एक प्रस्ताव पर भारत ने वोट ही नहीं किया। हैरानी की बात? बिल्कुल नहीं। असल में ये वोटिंग तालिबान सरकार को लेकर थी, जिसमें उनसे मानवाधिकारों का ख्याल रखने को कहा गया था। अब सवाल यह है कि भारत ने ऐसा क्यों किया? क्या ये सिर्फ एक कूटनीतिक चाल थी या फिर तालिबान के बढ़ते दखल को लेकर कोई बड़ी गेम प्लान चल रहा है? सच तो ये है कि अफगानिस्तान की ये शतरंज अब भारत-पाकिस्तान की लड़ाई का नया मैदान बनती जा रही है। और तालिबान? वो इस खेल में सबसे ताकतवर मोहरा साबित हो सकता है।

अफगानिस्तान: जहां भारत और पाकिस्तान की जंग का एक और अध्याय लिखा जा रहा है

देखिए, अफगानिस्तान तो हमेशा से ही दोनों देशों की खींचतान का मैदान रहा है। पाकिस्तान का तालिबान से पुराना रिश्ता है – वो भी ‘सामरिक गहराई’ वाली उसी पॉलिसी के तहत जिसके बारे में आपने किताबों में पढ़ा होगा। वहीं भारत ने पिछले 20 सालों में वहां डेमोक्रेसी को सपोर्ट किया और हजारों करोड़ रुपये की डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स में लगाए। लेकिन 2021 में जब तालिबान वापस आया, तो गेम ही बदल गया। भारत ने चुप्पी साध ली, जबकि पाकिस्तान तालिबान को इंटरनेशनल प्लेटफॉर्म पर मनवाने में जुट गया। मजे की बात ये है कि ये सिर्फ दो देशों की लड़ाई नहीं – पूरे रीजन की शांति अब इसी पर टिकी है।

UNSC वोटिंग: भारत की चुप्पी के पीछे की असली वजह

अब ये जो भारत ने वोट नहीं किया, इसे ऐसे समझिए – जैसे आप चेस में किसी मोहरे को बिना हिलाए छोड़ देते हैं। एक्सपर्ट्स कह रहे हैं कि भारत तालिबान के साथ बातचीत का रास्ता खुला रखना चाहता है। क्यों? क्योंकि अफगानिस्तान में उसके हजारों करोड़ के प्रोजेक्ट्स पड़े हैं। वहीं पाकिस्तान तो मानो इस मौके का फायदा उठाकर तालिबान से गले मिलने को तैयार बैठा है। और कश्मीर? हां, वो तो इस पूरे खेल का सबसे नाजुक मुद्दा है। भारत को डर है कि तालिबान की वापसी से पाकिस्तानी आतंकी गुटों को नया हौसला मिल सकता है। स्थिति गंभीर है, सच कहूं तो।

कौन क्या बोला? – राजनीति के इस दंगल में प्रतिक्रियाओं का अंदाज

भारत का MEA कहता है – “हम अफगानिस्तान में शांति चाहते हैं, पर तालिबान को महिलाओं के हकों का ख्याल रखना होगा।” ठीक उलट, पाकिस्तान का जवाब – “भारत का दोहरा चरित्र साफ है, हम तालिबान के साथ मिलकर शांति के लिए काम करेंगे।” अंतरराष्ट्रीय एक्सपर्ट्स की राय? भारत की ये चुप्पी कोई आम बात नहीं – ये एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है जहां वो तालिबान से रिश्ते पूरी तरह नहीं तोड़ना चाहता। समझ गए ना माजरा?

आगे क्या? – अफगानिस्तान का भविष्य और हमारी चिंताएं

अब सवाल ये कि आगे का रास्ता क्या होगा? भारत और पाकिस्तान दोनों ही अफगानिस्तान में अपना दबदबा बनाए रखना चाहेंगे। अगर तालिबान नहीं बदला तो इंटरनेशनल कम्युनिटी का प्रेशर बढ़ेगा। और कश्मीर? वो तो इस पूरे मामले का सबसे गर्म तवा है। सच तो ये है कि अफगानिस्तान अब भारत-पाकिस्तान की लड़ाई का नया अखाड़ा बन चुका है। और तालिबान? वो इस खेल का सबसे ताकतवर खिलाड़ी। तो सवाल ये है – इस शतरंज के खेल में आखिर मात किसे खानी पड़ेगी?

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भारत-पाकिस्तान के बीच चल रही इस जंग में तालिबान का रोल समझना चाहते हैं? असल में, ये कोई साधारण चेस गेम नहीं है – बल्कि एक ऐसा पेचीदा खेल है जहां अफगानिस्तान की चालें दोनों पड़ोसियों के लिए सिरदर्द बन रही हैं। सच कहूं तो, तालिबान के उभार ने पूरे रीजन के पावर इक्वेशन को ही बदलकर रख दिया है। और हां, ये तो बस शुरुआत है… आने वाले वक्त में इसका असर और भी साफ दिखेगा।

अब सवाल यह है कि इस उलझी हुई अफगान राजनीति में आखिर कौन बाजी मारेगा? मेरा ख्याल? समय ही इसका जवाब देगा। लेकिन इतना तो तय है कि ये गेम थोड़ा और इंट्रेस्टिंग होने वाला है।

वैसे, अगर आपको इस टॉपिक पर और डीप में जानना है तो… [यहां आपका कंटेंट जारी रहेगा]

भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव और तालिबान: असली खेल क्या है?

1. तालिबान का भारत-पाकिस्तान झगड़े में क्या हाथ है?

देखिए, तालिबान अफगानिस्तान में तो कब्जा जमा चुका है, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या वह पाकिस्तान का पुराना ‘दोस्त’ बनकर हमारे लिए मुसीबत खड़ी करेगा? मेरा मतलब, cross-border terrorism वाला गेम तो पाकिस्तान पहले से खेल रहा है। अब अगर तालिबान उनका साथ देता है, तो हमारी security agencies के लिए नई चुनौती आ जाएगी। सीधा खतरा नहीं, पर headache ज़रूर बढ़ेगा!

2. क्या तालिबान सच में हमारे लिए खतरनाक साबित होगा?

ईमानदारी से कहूं तो… अभी तक तालिबान ने सीधे भारत के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया है। लेकिन यहां दिक्कत क्या है? उनका ISI के साथ वो पुराना रिश्ता! जैसे कॉलेज के दोस्त जो हमेशा साथ रहते हैं। अगर ये दोस्ती कश्मीर मुद्दे पर active हो गई, तो फिर स्थिति गंभीर हो सकती है। एक तरफ तो बातचीत के दावे, दूसरी तरफ ये छुपे हुए खेल। समझने वाली बात है!

3. अफगानिस्तान का ये नया ड्रामा हमारे और पाकिस्तान के रिश्तों को कैसे बदलेगा?

अरे भाई, सीन बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई पुराना फिल्मी विलेन नए कपड़ों में वापस आ गया हो! तालिबान का शासन आते ही पाकिस्तान को अपनी ‘बड़ी भाई’ वाली फीलिंग आने लगेगी। और हमारा क्या? security policies पर फिर से विचार करना पड़ेगा। मजे की बात ये कि दोनों देशों के बीच तनाव का ये नया chapter शायद अभी शुरू ही हुआ है।

4. क्या तालिबान और पाकिस्तान के पास कोई secret plan है?

सुनिए, इन दोनों का alliance तो कोई नई बात नहीं है। पर सवाल ये है कि क्या ये proxy war के लिए और मजबूत होगा? पाकिस्तान का track record देखें तो… है ना? वो तालिबान को अपने हितों के लिए इस्तेमाल करने से कभी नहीं चूकता। बस अब देखना ये है कि इस बार का खेल कितना खतरनाक साबित होता है। थोड़ा डरावना लगता है, लेकिन सच्चाई यही है!

Source: Navbharat Times – Default | Secondary News Source: Pulsivic.com

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