तवांग मठ: क्या चीन का ‘ड्रैगन’ दलाई लामा से डरता है?
अरुणाचल प्रदेश का तवांग मठ सिर्फ एक धार्मिक जगह नहीं, बल्कि एक राजनीतिक बम है जो कभी भी फट सकता है। सच कहूं तो, यहां की हवा में आध्यात्मिकता के साथ-साथ तनाव भी महसूस होता है। और अब चीन ने फिर से अपनी पुरानी रीटोरिक शुरू कर दी है – तवांग पर दावा! लेकिन सवाल यह है कि आखिर चीन को इस मठ से इतना डर क्यों लगता है? शायद दलाई लामा का प्रभाव, जो तिब्बती बौद्धों के लिए मसीहा से कम नहीं हैं।
तवांग मठ: जहां इतिहास और राजनीति की लकीरें टकराती हैं
इसे गाल्डन नामग्याल ल्हात्से भी कहते हैं – नाम तो बड़ा प्यारा है, मगर मामला बड़ा पेचीदा। 17वीं सदी में बना यह मठ आज भारत-चीन के बीच खींचतान का केंद्र बना हुआ है। चीन का दावा है कि यह तिब्बत का हिस्सा है, जबकि हमारा स्टैंड क्लियर है – तवांग हमारा है, पीरियड।
और फिर 1959 की वो घटना… जब दलाई लामा ने भारत में शरण ली। उस दिन से चीन की नींद हराम हो गई। उन्हें लगता है कि यह मठ तिब्बती आंदोलन का हब बन सकता है। पर सच तो यह है कि चीन खुद अपनी ही छाया से डर रहा है।
हालिया ड्रामा: चीन का नया झूठ, भारत का झटकेदार जवाब
कुछ दिन पहले चीन ने फिर वही पुराना रेकॉर्ड बजाया – “तवांग हमारा है!” भारत ने तुरंत जवाब दिया – “ड्रीम ऑन!” हमारी सेना ने तवांग में अपनी मौजूदगी बढ़ा दी है। और दलाई लामा का ताजा बयान तो चीन के लिए नमक छिड़कने जैसा था – “तिब्बत की आत्मा कभी गुलाम नहीं हो सकती।”
असल में देखा जाए तो चीन को डर है कि कहीं यह चिंगारी बड़ी आग न बन जाए। उनकी पॉलिसी साफ है – दबाओ, कुचलो, खत्म करो। लेकिन आत्माओं को कैसे दबाओगे भाई?
कौन क्या बोला: सबके अपने-अपने राग
भारत सरकार: “तवांग पर हमारा अधिकार, कोई डिस्कशन ही नहीं।” एकदम स्ट्रेटफॉरवर्ड।
चीन: “हमारा तिब्बत, हमारा तवांग।” बिना किसी हिस्टोरिकल प्रूफ के।
तिब्बती समुदाय: “हमारी संस्कृति, हमारा अधिकार।” सीधा और स्पष्ट।
एक्सपर्ट्स: “चीन बना रहा है प्रेशर, पर भारत नहीं झुकेगा।”
देखिए न, हर कोई अपनी-अपनी रागिनी अलाप रहा है। लेकिन सच्चाई यह है कि तवांग सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि संस्कृति और आस्था का प्रतीक है।
आगे क्या? एक गर्म सूप में तैरते सवाल
अब स्थिति बड़ी नाजुक है। अमेरिका जैसे देश भी इस पर नजर गड़ाए बैठे हैं। चीन अगर कोई गलत कदम उठाता है तो भारत पीछे नहीं हटेगा – यह तय है। और तिब्बती समुदाय? वे तो पहले से ही अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं।
असल में यह सिर्फ दो देशों का मामला नहीं रहा। यह तिब्बत के भविष्य का सवाल बन चुका है। क्या चीन समझ पाएगा कि आत्माओं को बंदूकों से नहीं दबाया जा सकता? वक्त बताएगा। पर एक बात तय है – तवांग मठ की चर्चा अभी लंबे समय तक जारी रहेगी।
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Source: Navbharat Times – Default | Secondary News Source: Pulsivic.com