ट्रंप सरकार ने UCLA को मिलने वाले 339 मिलियन डॉलर रोके – क्या ये सच में नागरिक अधिकारों का मामला है?
अमेरिकी शिक्षा जगत में हलचल मच गई है। ट्रंप प्रशासन ने UCLA को मिलने वाले मोटे research grants (करीब 2,500 करोड़ रुपये!) फ्रीज कर दिए हैं। कारण? विश्वविद्यालय पर नागरिक अधिकार उल्लंघन के गंभीर आरोप। अब सवाल यह है कि क्या ये सच में नियमों का उल्लंघन है या फिर राजनीति का एक नया खेल? क्योंकि देखा जाए तो ये फैसला सिर्फ UCLA के लिए ही नहीं, पूरे अमेरिकी एजुकेशन सिस्टम के लिए बड़ा झटका है।
UCLA का ग्रांट पर निर्भर होना – समस्या की जड़?
असल में बात ये है कि UCLA जैसे बड़े संस्थान अपने research के लिए सरकारी फंडिंग पर कितने निर्भर हैं। हैरान कर देने वाली बात ये कि यूनिवर्सिटी के कई medical और scientific projects पूरी तरह इन्हीं ग्रांट्स पर चलते हैं। लेकिन सवाल ये भी उठता है – क्या सरकार को इतनी बड़ी रकम रोकने से पहले और जांच नहीं करनी चाहिए थी? खासकर तब, जब UCLA प्रशासन इन आरोपों को बेबुनियाद बता रहा है।
वैसे मजे की बात ये है कि ये आरोप सिर्फ एडमिशन प्रक्रिया और research opportunities को लेकर हैं। मतलब, कुछ students को दूसरों के मुकाबले कम मौके मिले। पर क्या ये समस्या सिर्फ UCLA में है? ईमानदारी से कहूं तो पूरे अमेरिका के एजुकेशन सिस्टम में ये issue कहीं न कहीं मौजूद है।
जांच हुई या सीधा एक्शन?
यहां दिलचस्प बात ये है कि जांच के शुरुआती नतीजों के आधार पर ही ये कड़ा कदम उठाया गया। Federal grants फ्रीज करना कोई मामूली बात तो है नहीं। UCLA के कई projects अब ठप पड़ सकते हैं – खासकर वो जो medical research से जुड़े हैं। सोचिए, कैंसर या कोई और गंभीर बीमारी पर research अचानक रुक जाए तो? परेशानी की बात ये है कि विश्वविद्यालय के पास अब सिर्फ 30 दिन हैं अपना पक्ष रखने के लिए। Race against time, सचमुच।
किसने क्या कहा? प्रतिक्रियाओं का अजीब मेल
इस पूरे मामले में प्रतिक्रियाएं बड़ी दिलचस्प रही हैं। UCLA का कहना है कि ये “पूरी तरह राजनीतिक” फैसला है। वहीं ट्रंप प्रशासन के एक अधिकारी का साफ कहना है – “हम भेदभाव बर्दाश्त नहीं करेंगे।” पर सबसे ज्यादा दिलचस्प है students की प्रतिक्रिया। कुछ इसे academic freedom पर हमला मान रहे हैं, तो कुछ का कहना है कि UCLA को सबक मिलना चाहिए। Mixed reactions, बिल्कुल।
अब क्या? 3 संभावित परिणाम
आगे तीन ही रास्ते दिखते हैं:
1. UCLA कोर्ट जाएगा और शायद ग्रांट वापस मिल जाए
2. विश्वविद्यालय को private funding की तरफ मुड़ना पड़ेगा (जो आसान नहीं)
3. ये केस एक dangerous precedent बन जाएगा
सच कहूं तो तीसरा विकल्प सबसे डरावना है। कल्पना कीजिए, अगर सरकारें funding के जरिए universities पर दबाव बनाने लगें? Academic freedom तो फिर नाम की ही रह जाएगी। लेकिन फिलहाल तो UCLA के लिए ये 30 दिन ही सब कुछ हैं। देखते हैं, ये ड्रामा आगे किस मोड़ पर जाता है।
ट्रंप प्रशासन और UCLA ग्रांट विवाद – कुछ ज़रूरी सवाल और जवाब
1. ट्रंप प्रशासन ने UCLA को इतना बड़ा ग्रांट क्यों दिया? सच्चाई क्या है?
देखिए, असल में बात ये थी कि ट्रंप सरकार research और innovation को लेकर काफी serious थी। UCLA को ये $339 मिलियन का ग्रांट दिया गया था ताकि वो scientific studies और technological advancements में काम कर सके। पर सवाल ये उठता है कि क्या पैसा सही जगह पहुंचा? वो तो आगे की जांच बताएगी।
2. ग्रांट में हुए उल्लंघन – क्या है पूरा मामला?
अब यहां मज़ा आता है। आरोप तो गंभीर हैं – improper fund allocation से लेकर ethical guidelines की धज्जियां उड़ाने तक! कुछ reports कह रही हैं कि पैसा वहां नहीं गया जहां जाना चाहिए था। ये तो वैसा ही है जैसे बच्चों के लिए दिया खाना किसी और के पेट में चला जाए। है ना ग़लत?
3. UCLA के लिए इसका क्या मतलब हो सकता है? बड़ी मुसीबत?
ईमानदारी से कहूं तो हालात गंभीर हैं। अगर आरोप साबित हो गए तो…
– भारी-भरकम fine का सामना
– आने वाले सालों में government grants मिलने में दिक्कत
– और सबसे बड़ी बात – university की इज्ज़त पर दाग
लेकिन याद रखिए, अभी तो सिर्फ आरोप हैं। Final decision का इंतज़ार करना होगा।
4. मामला अभी चल रहा है या खत्म हो गया?
नहीं भई, अभी तो पार्टी शुरू ही हुई है! Investigations जारी हैं, legal battles चल रही हैं। UCLA ने आरोपों को challenge किया है। सच क्या है? वो तो समय ही बताएगा। फिलहाल तो popकॉर्न लेकर बैठिए, drama तो देखने को मिलेगा ही!
Source: NY Post – US News | Secondary News Source: Pulsivic.com