“तुलसी मुंडा: अनपढ़ होकर भी हजारों को पढ़ाया, गांवों में शिक्षा की मशाल जलाई”

तुलसी मुंडा: अनपढ़ होकर भी हजारों को पढ़ाया, गांवों में शिक्षा की मशाल जलाई

आज जब हम शिक्षा के महत्व की बात करते हैं, तो तुलसी मुंडा का नाम एक ऐसी मिसाल बनकर उभरता है जिसने अपने संघर्ष और समर्पण से साबित किया कि शिक्षा सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि समाज को बदलने का सबसे बड़ा हथियार है। तुलसी मुंडा, जिनका आज जन्मदिन है, न केवल एक शिक्षाविद् हैं, बल्कि एक ऐसी प्रेरणा हैं जिन्होंने अपने जीवन की कठिनाइयों को पीछे छोड़ते हुए 20,000 से अधिक बच्चों को शिक्षित किया। पद्म श्री से सम्मानित तुलसी को बच्चे प्यार से “तुलसी आपा” कहकर बुलाते हैं। उनकी जिंदगी साहस, समर्पण और संघर्ष का जीवंत उदाहरण है।

तुलसी मुंडा का प्रारंभिक जीवन

तुलसी मुंडा का जन्म ओडिशा के एक छोटे से आदिवासी गाँव में हुआ था। उनका परिवार आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ा हुआ था, जहाँ शिक्षा को लेकर कोई खास जागरूकता नहीं थी। आदिवासी समाज में उस दौरान शिक्षा की स्थिति बेहद दयनीय थी, खासकर लड़कियों के लिए। तुलसी भी इसी व्यवस्था का शिकार हुईं और उन्हें कभी स्कूल जाने का मौका नहीं मिला। अनपढ़ होने का दर्द उनके मन में हमेशा रहा, लेकिन इसी दर्द ने उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।

वह चाहती थीं कि कोई और बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे। यही वजह थी कि उन्होंने खुद पढ़ने की कोशिश की और धीरे-धीरे अक्षर ज्ञान हासिल किया। उनका यह छोटा-सा प्रयास आगे चलकर एक बड़े आंदोलन में बदल गया।

शिक्षा के प्रति समर्पण और संघर्ष

तुलसी मुंडा ने जब देखा कि उनके गाँव के बच्चे भी शिक्षा से दूर हैं, तो उन्होंने उन्हें पढ़ाने का फैसला किया। बिना किसी संसाधन और सहायता के यह राह आसान नहीं थी। समाज में लोगों ने उनके इस कदम का विरोध भी किया, लेकिन तुलसी ने हार नहीं मानी। उन्होंने घर-घर जाकर बच्चों को इकट्ठा किया और उन्हें पढ़ाना शुरू किया। यहीं से “अक्षर आंदोलन” की नींव पड़ी, जिसका उद्देश्य था हर बच्चे तक शिक्षा की रोशनी पहुँचाना।

धीरे-धीरे उनकी मुहिम ने जोर पकड़ा और गाँव के लोग भी उनके साथ जुड़ने लगे। तुलसी ने न केवल बच्चों को पढ़ाया, बल्कि समुदाय को शिक्षा के महत्व के प्रति जागरूक भी किया। उनका यह संघर्ष एक ऐसी मिसाल बन गया जिसने पूरे देश का ध्यान खींचा।

तुलसी मुंडा का योगदान और उपलब्धियाँ

तुलसी मुंडा के अथक प्रयासों का नतीजा यह रहा कि उन्होंने 20,000 से अधिक बच्चों को शिक्षित किया, जिनमें ज्यादातर ग्रामीण और आदिवासी समुदाय के थे। उनके इस योगदान ने न केवल बच्चों के जीवन को बदला, बल्कि पूरे समाज को सशक्त बनाने का काम किया। शिक्षा के माध्यम से उन्होंने लोगों को आत्मनिर्भर बनने का रास्ता दिखाया।

उनके इस अद्वितीय योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 2001 में पद्म श्री से सम्मानित किया। आज वह न केवल ओडिशा, बल्कि पूरे देश में “तुलसी आपा” के नाम से जानी जाती हैं। उनकी इस पहचान ने यह साबित किया कि सच्ची लगन और मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती।

तुलसी मुंडा की विरासत और प्रेरणा

तुलसी मुंडा का जीवन आज के युवाओं के लिए एक बड़ा संदेश छोड़ता है। उनकी कहानी हमें याद दिलाती है कि शिक्षा की ताकत से समाज में बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं। उन्होंने निस्वार्थ भाव से काम किया और अपने दृढ़ संकल्प के बल पर असंभव को संभव बना दिया।

उनके जीवन से हमें यह सीख मिलती है कि छोटे-छोटे प्रयासों से भी बड़े बदलाव किए जा सकते हैं। आज जब शिक्षा का अधिकार हर बच्चे तक पहुँचाने की बात होती है, तो तुलसी मुंडा का नाम इसका प्रतीक बन जाता है। उनकी विरासत हमें यह याद दिलाती है कि शिक्षा के प्रसार की जिम्मेदारी हम सभी की है।

निष्कर्ष

तुलसी मुंडा का जीवन एक ऐसी मिसाल है जो हमें सिखाती है कि संघर्ष और सफलता का कोई विकल्प नहीं होता। उन्होंने अपने जीवन में जो कुछ भी हासिल किया, वह सिर्फ अपने दृढ़ विश्वास और मेहनत के बल पर किया। आज उनके जन्मदिन पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम भी शिक्षा को बढ़ावा देने में अपना योगदान देंगे। तुलसी मुंडा की यह कहानी हमेशा हमें प्रेरित करती रहेगी कि शिक्षा ही वह माध्यम है जो समाज को बदल सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

तुलसी मुंडा का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
तुलसी मुंडा का जन्म ओडिशा के एक आदिवासी गाँव में हुआ था। उनका जन्मदिन 15 दिसंबर को मनाया जाता है।

उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में क्या खास योगदान दिया?
तुलसी मुंडा ने “अक्षर आंदोलन” शुरू किया और 20,000 से अधिक बच्चों को शिक्षित किया, खासकर ग्रामीण और आदिवासी समुदाय के।

तुलसी मुंडा को पद्म श्री कब मिला?
उन्हें साल 2001 में भारत सरकार द्वारा पद्म श्री से सम्मानित किया गया था।

उनके द्वारा शुरू किए गए अक्षर आंदोलन का क्या उद्देश्य था?
अक्षर आंदोलन का उद्देश्य था गाँव-गाँव जाकर बच्चों को शिक्षित करना और समुदाय को शिक्षा के प्रति जागरूक बनाना।

यह भी पढ़ें:

तुलसी मुंडा की कहानी सिर्फ एक प्रेरणा नहीं, बल्कि एक सवाल भी खड़ा करती है – क्या शिक्षा के लिए डिग्री सच में सब कुछ है? देखा जाए तो उन्होंने तो बिना किसी फॉर्मल डिग्री के ही हजारों बच्चों की ज़िंदगियों में उजाला भर दिया। और सच कहूं तो, यही तो असली शिक्षा है न?

उनकी कहानी हमें बताती है कि समर्पण और जुनून के आगे कोई भी बाधा टिक नहीं पाती। एक तरफ तो हम डिग्रियों के पीछे भागते हैं, लेकिन दूसरी तरफ तुलसी जैसे लोग साबित कर देते हैं कि शिक्षा की असली ताकत किताबों में नहीं, दिल में होती है।

और सबसे खास बात? एक इंसान भी पूरे समाज को बदल सकता है। तुलसी मुंडा ने यह साबित कर दिखाया। उनका संघर्ष? एकदम फिल्मी सा लगता है, लेकिन सच्चा।

तो अब सवाल यह है कि क्या हम उनके सपनों को आगे बढ़ा पाएंगे? क्योंकि असल में, यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई है…

(Note: I’ve maintained the original HTML paragraph tag while completely rewriting the content in a more human, conversational style with rhetorical questions, sentence variety, and natural imperfections as per your instructions.)

Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com

More From Author

-10°C में नंगे पांव चढ़ाई, पेट में गोली और शहादत: कैप्टन नीकेझाकू की अदम्य गाथा

बालासोर की बेटी की दर्दनाक कहानी: यौन उत्पीड़न के खिलाफ लड़ाई हार गई जिंदगी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent Comments