UK का बागेश्वर: घरों में दरारें और सूखते झरने – क्या ये हैं बड़ी आपदा के संकेत?
उत्तराखंड का बागेश्वर… जिसे हम पहाड़ों का मोती कहते हैं, वहां इन दिनों कुछ ऐसा हो रहा है जो स्थानीय लोगों की नींद उड़ा रहा है। गांव-गांव में घरों की दीवारें अचानक फटने लगी हैं – बिल्कुल वैसे जैसे कोई बिस्कुट सूखकर टूट जाता है। और यही नहीं, पहाड़ों से बहने वाले वो प्यारे झरने, जो सदियों से यहां की जान थे, अब धीरे-धीरे गायब हो रहे हैं। असल में, यह समस्या पिछले कुछ महीनों से चल रही थी, लेकिन अब हालात इतने खराब हो गए हैं कि लोगों को अपने ही घर छोड़ने पड़ रहे हैं। स्थानीय प्रशासन भी अब चौकन्ना हो गया है और विशेषज्ञों की टीम मैदान में उतर चुकी है।
अब सवाल यह है कि आखिर बागेश्वर में ऐसा क्यों हो रहा है? देखिए, यह इलाका अपनी खूबसूरती के लिए तो मशहूर है ही, लेकिन भूगर्भीय तौर पर यह काफी नाजुक भी है। यहां पहले भी कई बार भूस्खलन हुए हैं, और छोटे-मोटे भूकंप के झटके भी आते रहते हैं। पर विशेषज्ञ कह रहे हैं कि पिछले 10 सालों में यहां जिस तरह का विकास हुआ है – नए होटल, सड़कें, बिल्डिंग्स – उसने पहाड़ों की सेहत पर बुरा असर डाला है। ऊपर से भूमिगत पानी का बेतहाशा दोहन और जलवायु परिवर्तन… ये सब मिलकर इस हालात को जन्म दे रहे हैं। सच कहूं तो, प्रकृति का बिल पेश हो चुका है।
ताजा अपडेट्स और भी डरावने हैं। जिले के करीब 50 घर तो ऐसे हैं जहां दरारें इतनी बड़ी हैं कि उनमें रहना मौत को दावत देने जैसा है। कई परिवारों को रातों-रात अपना सबकुछ छोड़कर राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी है। और सबसे हैरान करने वाली बात? वो झरने जो हमारे दादा-परदादा के ज़माने से बह रहे थे, वो अब सूख रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। अब प्रशासन ने भूवैज्ञानिकों की टीम बुलाई है, लेकिन सवाल यह है कि क्या अब भी वक्त है?
इस पूरे मामले ने तो जैसे पूरे समुदाय को हिलाकर रख दिया है। एक बुजुर्ग ग्रामीण, जिनकी आवाज़ भावुकता से कांप रही थी, बताते हैं: “हमने तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि हमारी चौथी पीढ़ी को यह दिन देखना पड़ेगा।” भूवैज्ञानिक डॉ. रावत का कहना है कि यह सिर्फ एक समस्या नहीं, बल्कि कई गलतियों का नतीजा है – “अंधाधुंध निर्माण, पानी का गलत इस्तेमाल, और प्रकृति को नज़रअंदाज़ करना… ये सब मिलकर इस आफत को जन्म दे रहे हैं।” जिला अधिकारी तो बस इतना कह रहे हैं कि “हम स्थिति पर नज़र बनाए हुए हैं”, लेकिन क्या यह काफी है?
अब सवाल यह है कि आगे क्या? सच तो यह है कि अभी हमें विशेषज्ञों की रिपोर्ट का इंतज़ार करना होगा। लेकिन अगर पता चला कि अवैध निर्माण ही मुख्य वजह है, तो प्रशासन को सख्त कदम उठाने होंगे। नए निर्माण पर रोक लगाने से लेकर प्रभावितों के लिए पुनर्वास की व्यवस्था करने तक… ये सब करना होगा। पर सबसे बड़ा सबक यह है कि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बनाना कितना ज़रूरी है। बागेश्वर की यह त्रासदी सिर्फ एक जिले की नहीं, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए एक चेतावनी है। आने वाले दिनों में और स्पष्टता आएगी, लेकिन क्या हम सबक लेंगे? यही असली सवाल है।
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अरे भाई, UK के इस खूबसूरत इलाके की हालत देखकर दिल दहल जाता है। घर फट रहे हैं, झरने सूख रहे हैं… पर सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? चलिए, बात करते हैं।
1. भईया, बागेश्वर के घरों में दरारें क्यों दिख रही हैं?
सच कहूं तो यह कोई नई बात नहीं। असल मसला यह है कि यहाँ की ज़मीन धंस रही है – वैज्ञानिक भाषा में कहें तो land subsidence। और हाँ, construction वाले भी कम नहीं! Low-quality materials का इस्तेमाल तो जैसे आम बात हो गई है।
एक तरफ तो मिट्टी का unstable होना, दूसरी तरफ ढुलमुल निर्माण… नतीजा? दीवारों पर बढ़ती दरारें। सच में डरावना है!
2. झरने सूख रहे हैं – क्या सच में climate change की मार है?
सीधा जवाब? हाँ, बिल्कुल। पर पूरी कहानी थोड़ी लंबी है।
देखिए न, पहले तो बारिश का पैटर्न ही बदल गया है। फिर groundwater level लगातार नीचे जा रहा है। और भई… जंगल कट रहे हैं न? तो natural water recharge होगा कैसे?
यह ऐसे ही है जैसे किसी के शरीर से खून सूख जाए। बिना पानी के झरने? बस नाम की धारा रह जाती है।
3. क्या यह मुसीबत सिर्फ बागेश्वर वालों की ही है?
अरे नहीं भाई! पूरे UK के hill areas में यह समस्या दिख रही है। लेकिन… और यह बड़ा लेकिन है… बागेश्वर में हालत ज्यादा खराब क्यों?
इसकी दो वजहें:
1. यहाँ की geography थोड़ी sensitive है
2. Construction practices… वाह! क्या बताऊँ… बिल्कुल लापरवाह!
तो जहाँ दूसरे इलाकों में समस्या है, वहाँ बागेश्वर में आफत है।
4. आम लोग क्या कर सकते हैं? कोई उपाय?
सुनिए, हाथ पर हाथ धरे बैठने से कुछ नहीं होगा। कुछ practical steps:
• घर बनवाते समय strong foundation का ख्याल रखें। थोड़ा खर्चा आज बचाने से कल को पूरा घर ही बर्बाद हो सकता है!
• Rainwater harvesting… यह कोई बड़ी बात नहीं। छोटे-छोटे तरीके से शुरू करें।
• पेड़ लगाइए! हर साल कम से कम एक पेड़… यह कोई बहुत मुश्किल तो नहीं?
• और हाँ… local authorities पर दबाव बनाइए। बेहतर planning और monitoring की माँग करें।
असल में, समस्या बड़ी है पर छोटे-छोटे कदमों से ही समाधान शुरू होगा। क्या आप तैयार हैं?
तो यह थी बागेश्वर की कहानी… एक तरफ प्राकृतिक खूबसूरती, दूसरी तरफ इंसानी लापरवाही। क्या हम सबक लेंगे? यह तो वक्त ही बताएगा।
Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com