फेड ने दी ढील, अमेरिकी बैंकों ने खोली जेब – अब शेयरधारकों को मिलेगा मोटा चेक!
अरे भई, क्या आपने सुना? अमेरिकी केंद्रीय बैंक (Federal Reserve) ने अपने सख्त रवैये में थोड़ी नरमी दिखाई है। और इसका फायदा? सीधा शेयरधारकों की जेब में जा रहा है! देखिए न, कैसे Wall Street के बड़े-बड़े बैंक अब dividends बढ़ाने और share buyback की बात कर रहे हैं। मतलब साफ है – जब बैंक खुश, तो निवेशकों की जेब भी भारी। पर सवाल यह है कि यह सब अचानक कैसे हो गया?
पीछे की कहानी: फेड का सख्त रवैया और अब ढील
देखिए, Federal Reserve हर साल एक तरह का ‘health check-up’ करता है अमेरिकी बैंकों का। सोचिए जैसे आपका सालाना मेडिकल चेकअप, लेकिन बैंकों के लिए! पिछले कुछ सालों में तो ये टेस्ट इतने कड़े थे कि बैंकों को shareholders को पैसा देना भी मुश्किल हो गया था। पर इस बार? फेड ने थोड़ी राहत दे दी। और बस… बैंकों ने तुरंत अपने पर्स खोल दिए। कहने का मतलब – जब ऊपर वाला रास्ता दिखाए, तो पैसा बहने लगता है न!
किसने क्या दिया? – बैंकों की ‘दिवाली’ लिस्ट
अब जरा देखिए किसने कितना उछाला:
• JPMorgan Chase: Dividend 5% बढ़ाकर $1.05 कर दिया। साथ ही $30 billion के share buyback की योजना। वाह!
• Bank of America: 9% की छलांग के साथ dividend $0.24 पर पहुंचा
• Goldman Sachs: $25 billion के share buyback का ऐलान
• Morgan Stanley: Dividend में 10% की जबरदस्त बढ़ोतरी
एक तरफ तो ये आंकड़े दिल खुश कर देने वाले हैं, पर दूसरी तरफ सोचिए – क्या ये बैंक इतने मजबूत हो गए हैं? या फिर फेड ने जरूरत से ज्यादा ढील दे दी?
बाजार की प्रतिक्रिया: खुशी के साथ सवाल भी
जाहिर है, investors तो मानो दिवाली मना रहे हैं। उनकी आय बढ़ेगी तो खुशी क्यों न हो? पर analysts की राय थोड़ी मिली-जुली है। कोई कह रहा है ये बैंकिंग सेक्टर के लिए गेम-चेंजर है, तो कोई याद दिला रहा है – “भई, अभी भी economic uncertainty तो है न!” कुछ experts की चिंता समझ भी आती है – अगर अर्थव्यवस्था में फिर से हलचल हुई, तो यही बैंक फंसेगे न?
आगे क्या? – गुब्बारे में हवा या सोने का अंडा?
असल में, सब कुछ अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर निर्भर करेगा। अगर सब शांत रहा, तो ये dividends और buyback जारी रहेंगे। पर… हमेशा एक पर होता है न? Inflation हो या recession, Federal Reserve फिर से सख्त हो सकता है। और हां, इसका असर सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा। Global markets, खासकर भारत जैसे देश जहां अमेरिकी बैंकों से जुड़ी कंपनियां हैं, उन पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। तो कुल मिलाकर? खुश होने की बात तो है, लेकिन आंखें खुली रखने की भी जरूरत है। आखिरकार, पैसा पेड़ पर तो नहीं उगता न!
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फेड का तनाव परीक्षण: क्या है ये पूरा ड्रामा?
देखिए, Federal Reserve यानी फेड अमेरिकी बैंकों को लेकर कुछ ऐसा करता है जैसे हमारे यहाँ राशन की दुकान पर आटे की गुणवत्ता चेक होती है। Stress tests में ये पता लगाया जाता है कि अगर अर्थव्यवस्था बुरी तरह धराशायी हो जाए (मान लीजिए 2008 जैसा संकट आ जाए), तो क्या ये बैंक अपने loans और investments को संभाल पाएंगे? असल में, ये एक तरह का financial टफ़ टेस्ट होता है।
अचानक बैंकों ने shareholders को पैसे बाँटने शुरू क्यों कर दिए?
अब यहाँ मजेदार बात ये है कि फेड ने इस बार थोड़ी ढील दे दी है। मतलब? मतलब ये कि बैंकों की हालत इतनी खराब नहीं है जितना वो दिखा रहे थे! तो अब ये मस्ती शुरू हुई – dividends और share buybacks की। एक तरफ तो ये shareholders के लिए अच्छी खबर है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि ये पैसा आखिर आता कहाँ से है? बैंकों के profits से, जो कि आपके और मेरे जैसे लोगों के ब्याज और fees से आता है। थोड़ा सोचने वाली बात है न?
आम निवेशकों के लिए इसका क्या मतलब?
अगर आपके पास इन बैंकों के shares हैं, तो बधाई हो! आपको कुछ extra पैसे मिलने वाले हैं। पर सच कहूँ तो ये कोई लॉटरी नहीं है। Share buybacks से शेयर की कीमत तो बढ़ सकती है, लेकिन याद रखिए – stock market एक ऐसा जानवर है जो कभी भी अचानक उछल सकता है। एकदम रिस्की। सच में।
क्या भारतीय बैंक भी इस तरह के टेस्ट से गुजरते हैं?
हाँ, लेकिन हमारा RBI अपना अंदाज़ अलग रखता है। आप इसे ऐसे समझिए – अमेरिका में जहाँ ये टेस्ट एक बड़ा मीडिया शो बन जाता है, वहीं भारत में RBI चुपचाप अपना काम करता रहता है। पर दोनों का मकसद एक ही है – ये जाँचना कि बैंक financial तूफ़ान झेल पाएंगे या नहीं। हालांकि, हमारे यहाँ के नियम थोड़े अलग होते हैं। Typical भारतीय स्टाइल – सख्त लेकिन शोर नहीं!
Source: Financial Times – Companies | Secondary News Source: Pulsivic.com