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अमेरिकी रिपब्लिकन OECD को फंडिंग रोकने की तैयारी में – जानें पूरा मामला

अमेरिकी रिपब्लिकन OECD को फंडिंग रोकने की तैयारी में – क्या यह सही फैसला है?

अमेरिकी राजनीति में एक बार फिर तूफान आया हुआ है। और इस बार निशाने पर है OECD (Organisation for Economic Co-operation and Development)। सुनकर हैरानी होगी कि ट्रम्प के समर्थक रिपब्लिकन नेता इस अंतरराष्ट्रीय संगठन को फंडिंग देने से इनकार करने की पूरी तैयारी में हैं। पर सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों? असल में, यह सिर्फ पैसे का मामला नहीं है – यह तो अमेरिका की पूरी विदेश नीति में आ रहे बदलावों की एक कड़ी है। जैसे WHO से अलग हुए, पेरिस समझौते से किनारा किया, वैसे ही अब OECD की बारी आई लगती है।

पहले समझते हैं – OECD है क्या बला?

1961 में बना यह संगठन दुनिया भर की कर नीतियों को लेकर काम करता है। अच्छी बात है न? पर ट्रम्प प्रशासन को यह ‘अच्छा’ नहीं लगता। खासकर उनका Global Minimum Tax का प्रस्ताव तो जैसे अमेरिकी सरकार की आँखों में खटकता है। उनका तर्क? “हमारी कंपनियों को नुकसान होगा।” सच कहूँ तो, यह कोई नई बात नहीं – अमेरिका पहले भी अंतरराष्ट्रीय संगठनों से ऐसे ही पंगा लेता रहा है।

अब क्या चल रहा है असल में?

ताजा ड्रामा यह कि अमेरिकी सीनेट में रिपब्लिकन नेताओं ने OECD को फंडिंग रोकने का प्रस्ताव रख दिया है। और भई, यह कोई छोटी बात नहीं – अमेरिका तो इस संगठन का सबसे बड़ा दानदाता है! उनका कहना है, “हम वो संगठन क्यों फंड करें जो हमारे ही खिलाफ काम करे?” थोड़ा स्वार्थी लगता है, लेकिन अमेरिका फर्स्ट की नीति का यही तो असर है।

किसका क्या स्टैंड?

राजनीति तो हमेशा दो खेमों में बंटी रहती है। रिपब्लिकन तो इस फैसले पर तालियाँ बजा रहे हैं, वहीं डेमोक्रेट्स का कहना है कि यह अमेरिका की वैश्विक छवि के लिए ठीक नहीं। OECD की तरफ से अभी चुप्पी है, पर विशेषज्ञों की चिंता साफ दिख रही है। अगर अमेरिका ने पैसे देने बंद कर दिए, तो संगठन का कामकाज कैसे चलेगा? बड़ा सवाल है।

आगे क्या होगा?

अगर यह प्रस्ताव पास हो गया (जो कि होने की पूरी संभावना है), तो OECD को बजट काटना पड़ेगा। यूरोपीय देशों पर निर्भरता बढ़ेगी। और सबसे बड़ी बात – यह तो बस शुरुआत हो सकती है। कौन जाने, आगे अमेरिका और किन अंतरराष्ट्रीय संगठनों से रिश्ते तोड़े। एक तरफ तो यह अमेरिका का अपना फैसला है, लेकिन दूसरी तरफ इसके वैश्विक असर को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। देखना दिलचस्प होगा कि यह सब कहाँ जाकर रुकता है।

Source: Financial Times – Global Economy | Secondary News Source: Pulsivic.com

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