उत्तराखंड का मुवानी हादसा: जब 150 मीटर की खाई ने लील लीं 7 जिंदगियां
आज सुबह उत्तराखंड में जो हुआ, वो सुनकर रूह कांप जाए। रुद्रप्रयाग-केदारनाथ रूट पर चल रही एक टैक्सी अचानक 150 मीटर गहरी खाई में जा गिरी। सात लोगों की जान चली गई – और हैरानी की बात ये कि इनमें 3 महिलाएं और 2 बच्चे भी थे। सोचिए, सुबह-सुबह यात्रा पर निकले ये लोग कभी नहीं सोचते होंगे कि ये उनकी आखिरी सुबह होगी। दुर्घटना तब हुई जब टैक्सी उस संकरी पहाड़ी सड़क पर मुड़ रही थी। पता नहीं ड्राइवर से कोई गलती हुई या फिर वाहन ने ही साथ छोड़ दिया।
खतरनाक सड़कें: जानलेवा ‘नॉर्मल’ बन चुका है
असल में मुवानी का ये इलाका तो हमेशा से ही दुर्घटनाओं के लिए कुख्यात रहा है। केदारनाथ जाने वाला ये रास्ता देखने में जितना खूबसूरत है, उतना ही खतरनाक भी। स्थानीय लोग तो कहते हैं यहां हर साल ऐसे हादसे होते रहते हैं – मानो ये कोई नई बात ही न हो। लेकिन सवाल ये है कि आखिर कब तक? गार्डरेल न होना, सड़कों का संकरा होना, मोड़ों पर कोई चेतावनी न होना – ये सब तो जैसे मौत को न्यौता देने जैसा है। और सबसे हैरानी की बात? इन सबके बावजूद सुधार के नाम पर कुछ खास नहीं होता।
रेस्क्यू ऑपरेशन: जब जान बचाने की कोशिश भी नाकाफी हो
दुर्घटना की खबर मिलते ही पुलिस और एसडीआरएफ की टीमें मौके पर पहुंच गईं। लेकिन समस्या ये थी कि 150 मीटर नीचे गिरी टैक्सी तक पहुंचना ही कितना मुश्किल था। कई घंटों की मशक्कत के बाद जाकर सभी शव बाहर निकाले जा सके। अस्पताल पहुंचाए गए घायलों की हालत भी गंभीर बताई जा रही है। प्रारंभिक रिपोर्ट्स के मुताबिक वाहन के ब्रेक फेल होने से ये हादसा हुआ। पर सच्चाई क्या है? ये तो पूरी जांच के बाद ही पता चलेगा।
राजनीति और मुआवजे: क्या यही है समाधान?
p>हादसे के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 5-5 लाख के मुआवजे की घोषणा की है। लेकिन ईमानदारी से कहूं तो क्या पैसा किसी की जिंदगी की कीमत चुका सकता है? स्थानीय लोग तो सीधे सरकार पर लापरवाही का आरोप लगा रहे हैं। रमेश नाम के एक स्थानीय ने मुझसे कहा – “साल दर साल यही हाल रहता है। हादसा होता है, मुआवजा मिलता है, और फिर सब भूल जाते हैं।” यातायात विशेषज्ञ डॉ. रावत की सलाह तो साफ है – पहाड़ी सड़कों पर स्पीड लिमिट सख्ती से लागू करो। पर क्या कोई सुन रहा है?
क्या इस बार कुछ बदलेगा?
सरकार ने जांच समिति बना दी है। गार्डरेल लगाने और सड़क चौड़ीकरण की बातें हो रही हैं। पर मुझे याद है पिछले साल भी ऐसी ही कुछ घोषणाएं हुई थीं। सच तो ये है कि जब तक पहाड़ी सड़कों की बुनियादी समस्याएं नहीं सुलझेंगी, तब तक ऐसे हादसों का सिलसिला थमने वाला नहीं। एक तरफ तो हम उत्तराखंड को ‘देवभूमि’ कहते हैं, दूसरी तरफ यहां की सड़कें मौत के जाल बनी हुई हैं। क्या यही है हमारी प्राथमिकताएं?
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Source: NDTV Khabar – Latest | Secondary News Source: Pulsivic.com

